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भविष्य की कल्पनाः सेहत का बिल

प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा से लेकर अस्पताल में भर्ती होने तक, मजबूत स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधारों की आवश्यकता

इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे

के. श्रीनाथ रेड्डी

भारत ऐसे निर्णायक दशक में कदम रख रहा है जो 2030 तक टिकाऊ विकास लक्ष्यों या एसडीजी (2015 में संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों के अपनाए गए एसडीजी) को हासिल करने के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण होने वाला है और इसके रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती स्वास्थ्य लक्ष्य (एसडीजी3) है. इसमें स्वास्थ्य को लेकर भविष्य की सोच और हर उम्र के लोगों के लिए अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं जैसे कई लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं जो स्वास्थ्य के लगभग सभी क्षेत्रों को शामिल करते हैं.  इन्हें  हासिल करने के लिए भारत को क्या करना चाहिए?

सहस्राब्दी विकास लक्ष्य या मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (एमडीजी) के तहत तय किए गए मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लक्ष्य को लेकर हमारी निरंतर प्रतिबद्धता रही है. हम मातृ मृत्यु अनुपात (प्रति 1,00,000 जीवित जन्म पर 70) और पांच वर्ष से कम की आयु में मृत्यु दर (प्रति 10,000 जीवित जन्म पर 25) के लक्ष्य तक पहुंचने की राह पर ठीक जा रहे हैं, लेकिन नवजात मृत्यु दर लक्ष्य (10,000 प्रति जीवित जन्म पर 12) को प्राप्त करने के लिए मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली की आवश्यकता है. महिलाओं और बच्चों में उच्च स्तर के कुपोषण (शरीर का कम वजन, एनीमिया और ठिगनापन) को दूर करने और कई सामाजिक निर्धारकों (गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, आजीविका और लिंग समानता) के क्षेत्र में काम करने के साथ ही घर, आंगनबाड़ी केंद्र और स्कूल स्तर पर बेहतर पोषण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है. बच्चों में अतिरिक्त वजन और मोटापे के बढ़ते ज्वार को नियंत्रित करने के लिए बाल और वयस्क पोषण कार्यक्रमों को शुरू करने की आवश्यकता है.

इन सबके बीच संक्रामक रोगों से लड़ने का लक्ष्य भी है. 2025 तक तपेदिक (टीबी) को खत्म करने का हमारा लक्ष्य तभी पूरा हो सकेगा अगर हम दवा प्रतिरोध से जूझते हुए, तपेदिक के मामलों का शुरुआत में ही पता लगाने, उपचार कवरेज को बढ़ाने और उसे जारी रखने से जुड़ी कई बड़ी खाइयों को तेजी से पाटने की क्षमता दर्शाते हैं. मलेरिया के साथ डेंगू और चिकनगुनिया के पांव पसारने का खतरा बढ़ता जा रहा है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन से गर्मी बढ़ी है जो मच्छर वेक्टर के बढऩे और दूर-दूर तक फैलने के लिए आदर्श स्थितियां बनाता है. एचआइवी-एड्स पर अब तक तो प्रभावी प्रतिक्रिया देखी गई है, लेकिन नीति-निर्माताओं के ढुलमुल रवैये और इस कार्यक्रम के लिए वित्तपोषण में कमी के कारण एचआइवी के उच्च जोखिम वाले आबादी समूहों और उन युवाओं के बीच फैलने का खतरा हो सकता है जो इस महामारी के आतंक के थमने के बाद के दौर में बड़े हुए हैं. संक्रामक रोगों से व्यापक रूप से रक्षा के लिए सुरक्षित पेयजल, बेहतर स्वच्छता, पोषण, बाल टीकाकरण का व्यापक कवरेज, वेक्टर नियंत्रण, गहन रोग निगरानी, रोगों और संपर्क का पता लगाने की बेहतर तकनीक, प्रभावी उपचार और फॉलोअप की आवश्यकता है.

गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) से मौतों की संख्या में और वृद्धि होगी और हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह, श्वसन तथा गुर्दे की बीमारियों के कारण मध्य-आयु में मृत्यु और विकलांगता की समस्या में भी इजाफा होगा. एनसीडी के कारण समयपूर्व मृत्यु दर में वर्ष 2030 तक एक-तिहाई कमी लाने का का लक्ष्य कठिन चुनौती है.

स्वास्थ्य प्रणालियों को लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में देखभाल और प्रौद्योगिकी-गहन तीव्र देखभाल के लिए तैयार रहना पड़ेगा, लेकिन विकृत आधुनिकता से जन्मे रोगों के लिए उपचार से ज्यादा रोकथाम पर काम करने की जरूरत है. संतुलित आहार को बढ़ावा देने वाली खाद्य व कृषि प्रणालियां और सुरक्षित तथा आनंददायक शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले शहरी डिजाइन के जरिए स्वास्थ्य को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, और प्रभावी विनियमन के माध्यम से तंबाकू, शराब तथा अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के नुक्सान को रोका जाना चाहिए. वायु प्रदूषण को कम करना होगा और सड़क सुरक्षा में सुधार करना होगा. और चूंकि जलवायु परिवर्तन प्रतिकूल प्रभावों को बढ़ाता जा रहा है, हमें स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा प्रदान करने के लिए जलवायु-अनुकूल स्वास्थ्य सेवाएं और जलवायु-सुसंगत कृषि तकनीक का निर्माण करने की आवश्यकता है.

स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या और कुशल कार्यबल की कमी से स्वास्थ्य सेवा वितरण बाधित है. कई ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा ने भरोसेमंद गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान नहीं की हैं, जबकि शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा में देर से ही सही, तेजी तो आई है, लेकिन वह संसाधनों की कमी से जूझ रही है. हालांकि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन ने प्राथमिक देखभाल के कुछ तत्वों को प्रोत्साहन प्रदान किया, लेकिन यह पैकेज अधूरा रहा. 2018 में शुरू किए गए आयुष्मान भारत का एक घटक व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा है, जो घर के पास के स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से व्यापक बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने का वादा करता है और कुशल गैर-चिकित्सक मध्य-स्तर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को तैनात करके डॉक्टरों की कमी को दूर करने का लक्ष्य रखता है. अगले दशक में भारत को सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से लेकर विशेषज्ञ डॉक्टरों तक सभी श्रेणियों में कार्यबल के विस्तार में निवेश करना होगा.

सौभाग्य से प्रौद्योगिकी इन कुछ चुनौतियों को पार करने में भारत की सहायता करेगी. रोग निदान उपकरणों और हैंड हेल्ड टैबलेट्स में प्रदान की गई निर्णय समर्थन प्रणाली ने हिमाचल प्रदेश में सहायक नर्स दाइयों को मधुमेह और उच्च रक्तचाप को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में सक्षम बनाया है. स्थानीय रूप से विकसित मॉल्यकुलर जांच प्रणाली ट्रूनैट से तपेदिक की जांच को आसान और अधिक सटीक बनाने की संभावना है. भारत दवाइयों और टीका निर्माण में पहले से ही मजबूत स्थिति में है, उसे वैश्विक बाजार में और बड़ी हिस्सेदारी हासिल होगी. नवाचार और निवेश से उभरती सस्ती स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियां, भारतीय उद्यमिता की पहचान बनेंगी.

अगर भारत की आबादी के बड़े वर्ग के लिए ये सुविधाएं उसकी पहुंच के बाहर ही रह जाएं तो तकनीकी नवाचार और कार्यबल विस्तार की सारी उपलब्धियां बेमानी साबित होंगी. बड़े राष्ट्रीय सर्वेक्षणों की रिपोर्ट है कि 7 प्रतिशत भारतीय, स्वास्थ्य सेवाओं को अपनी पहुंच से बहुत दूर की चीज मानते हैं. पिछले दो दशकों में कई ऐसी स्वास्थ्य योजनाएं शुरू हुई हैं जिसका वित्तपोषण सरकार करती है. प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना उनमें से कई की जगह ले रही है. सरकार ने इस योजना के तहत लाभार्थियों की संख्या (50 करोड़ भारतीय) और स्वास्थ्य कवरेज (सालाना 5,00,000 रुपए प्रति परिवार) का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है और यह योजना कम आय वाले परिवारों के उन चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच को सक्षम बनाएगी जिसके लिए अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत होती है. हालांकि, भारत के कई हिस्सों में आपूर्ति पक्ष की खाई को पाटने की आवश्यकता है.

अगले दशक में भारत को बेहतर प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली विकसित करनी चाहिए जो अच्छी तरह से काम कर रहे जिला अस्पतालों से जुड़ी हो. जहां निजी क्षेत्र को सार्वभौमिक कवरेज के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में भाग लेने को तैयार करने की जरूरत है वहीं मेडिकल कॉलेज अस्पतालों की क्षमता को बढ़ाना होगा. ऐसी एकल-भुगतानकर्ता प्रणाली विकसित करनी होगी जो सभी भारतीयों को कवर करे, देश भर में पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करे और लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं का खर्चा उठाने से जुड़ी सुरक्षा प्रदान करे. इन उपायों के लिए सरकार द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक खर्च को मौजूदा स्तर से कहीं अधिक रखना होगा. स्वास्थ्य क्षेत्र पर सार्वजविक खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मात्र 1-1.2 प्रतिशत ही रहा है. इस दशक के अंत तक केंद्रीय और राज्यों के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए खर्च को मौजूदा स्तर के तिगुने तक पहुंचाना होगा जिसमें दो-तिहाई आवंटन प्राथमिक स्वास्थ्य के लिए होना चाहिए.

हमें स्वास्थ्य अनुसंधान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणाली और एल्गोरिद्म विकसित के लिए पूरे देश के आंकड़ों का इस्तेमाल करना होगा तभी यह पूरे देश के लिए प्रासंगिक हो सकेगा. अनुसंधान के दायरे का विस्तार आण्विक जीव विज्ञान से लेकर स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों तक, व्यक्तिगत से लेकर आबादी स्तर तक रोगों की भविष्यवाणी और रोकथाम तक होना चाहिए. लंबे समय से उपेक्षित स्वास्थ्य नीति और सिस्टम अनुसंधान को बायोमेडिकल और नैदानिक अनुसंधान के साथ एक प्रमुख स्थान दिए जाने की जरूरत है. अर्जित ज्ञान का प्रभावी रूप से कार्यान्वयन होना चाहिए ताकि स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार के प्रभाव और अवसरों की बराबरी के रूप में इसकी झलक मिले.

के श्रीनाथ रेड्डी पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट और मेक इन इंडिया: रीचिंग अ बिलियन प्लस पुस्तक के लेखक हैं

(यहां व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं)

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