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सत्ता प्रतिष्ठान

अपने दम पर लगातार दो लोकसभा चुनावों में बड़ी जीत का रास्ता तय किया; चुनाव को राष्ट्रपति शैली में तब्दील कर दिया; उम्मीदवार महत्वहीन हो गए और देश के 543 निर्वाचन क्षेत्रों में मोदी ही अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह सरीखे हो गए.

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

वर्ष 2019 की शुरुआत राजनैतिक परिदृश्य में नए वादे के साथ हुई. पिछले वर्ष के आखिरी महीने में, देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने हिंदी पट्टी के तीन महत्वपूर्ण राज्यों—राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सत्ता भाजपा से छीन ली. इससे अचानक लोकसभा की जंग के मोर्चे खुल गए. कुछ असंभव से गठजोड़ों के बल पर विपक्षी पार्टियों का एक ढीलाढाला मोर्चा नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा को पटखनी देने की संभावना जगाने लगा.

लेकिन ये सपने मई में धूल फांकने लगे और फिर साबित हुआ कि प्रधानमंत्री मोदी ही देश में सबसे ताकतवर हैं. उन्हें इतना जबरदस्त जन-समर्थन मिला जैसा इंदिरा गांधी के दौर के बाद देश के किसी भी दूसरे नेता को हासिल नहीं हुआ. उनकी यह लोकप्रियता उनके खासमखास अमित शाह के चुनाव प्रबंधन कौशल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गहरे संगठनात्मक नेटवर्क के साथ मिलकर केंद्र और 13 राज्यों में लगभग अजेय राजनैतिक मशीनरी तैयार कर चुकी है.

विरोधियों को तहस-नहस कर देने वाली यह विध्वंसक मशीनरी न सिर्फ देश की सबसे पुरानी पार्टी को पांच साल में दो बार धूल चाटने पर मजबूर कर चुकी है, बल्कि इसने कई व्यन्न्ति या परिवार नियंत्रित क्षेत्रीय दलों के आधार की भी चूलें हिला दी हैं. सपा, बसपा, तृणमूल इसकी मिसाल हैं. दिलचस्प यह है कि इस निष्ठुर और सर्वव्यापी राजनैतिक ढांचे में विरासत की हैसियत खोटे सिक्के जैसी हो गई है. अपरंपरागत विकल्पों पर दांव लगाने के भाजपा के तौर-तरीके ने कई आश्चर्यजनक ताकतवर शख्सियतों को आगे ला दिया है, जैसे योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडऩवीस, निर्मला सीतारमण से लेकर प्रकाश जावडेकर तक. हालांकि ताकतवर शख्सियतों की इस फेहरिस्त में विविधता की बहुत गुंजाइश नहीं है, हर किसी का बस एक ही रंग है—केसरिया.

68 वर्षीय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनेताओं की फेहरिस्त में शीर्ष पर काबिज हैं.

सर्वोच्च

क्योंकि वे देश के निर्विवाद नेता हैं, जन-धारणा में उनके मुकाबले देश में कोई दूसरा नेता नहीं है; उन्हें बेदाग छवि वाले मजबूत, मुखर और बेधड़क फैसले लेने वाले प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया गया है

क्योंकि उन्होंने अपने दम पर लगातार दो लोकसभा चुनावों में बड़ी जीत का रास्ता तय किया; चुनाव को राष्ट्रपति शैली में तब्दील कर दिया; उम्मीदवार महत्वहीन हो गए और देश के 543 निर्वाचन क्षेत्रों में मोदी ही अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह सरीखे हो गए

क्योंकि उनके राजकाज का मॉडल—विकास और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर गहरे प्रश्नचिन्हों के बावजूद—सरकारी योजनाओं के लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए पारदर्शी तकनीक के इस्तेमाल के साथ गरीबी मिटाने का असरदार तरीका साबित हुआ

क्योंकि अपनी चतुर, साहसिक और विवेकपूर्ण कूटनीति के बूते उन्होंने भारत को दुनिया में ऊंचे पायदान पर पहुंचाया

बात पते की

''प्रधानमंत्री महज सड़कों के नाम बदलकर देश का भाग्य

नहीं बदल सकता''

—मुगल सम्राटों के नाम पर रखे दिल्ली की सड़कों के नामों को बदलने की कुछ लोगों की मांग पर.

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