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नई संसकृति-नए नायकः विज्ञान और व्यंग्य की केमिस्ट्री

किताब परमाणु की छांव में को यूपी हिंदी संस्थान का के.एन. भाल पुरस्कार, किताब जनहित में जारी को हिंदी संस्थान का डॉ. रांगेय राघव पुरस्कार मिला. द लंपट गंज, पंच प्रपंच पुस्तकों ने भी प्रसिद्धि बटोरी है.

पंकज प्रसून पंकज प्रसून

तमिलनाडु के तिरुनेवेली जिले में स्थापित हो रहे 'कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट' का 2014 में जमकर विरोध हो रहा था. इस दौरान सरकार ने लखनऊ के सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडीआरआइ) में तकनीकी अधिकारी के रूप में कार्यरत एक युवा कवि पंकज प्रसून को कविताओं के माध्यम से लोगों में जागरूकता फैलाने का जिम्मा सौंपा. पंकज ने परमाणु की छांव में शीर्षक से एक किताब लिखी जिसमें हास्य-व्यंग्य के जरिए परमाणु ऊर्जा के महत्व को लोगों के सामने रखा गया. यह किताब विश्व में परमाणु ऊर्जा पर किसी भी भाषा में लिखी गई पहली काव्य पुस्तक बनी और इसे एशिया बुक ऑफ रिकाडर्स में भी जगह मिली. सीडीआरआइ की लैब में दवाओं पर शोध कर रहे पंकज प्रसून हास्य-व्यंग्य के जरिए विज्ञान को आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने में जुटे हैं.

रायबरेली के बैसवारा इलाके में सहजौरा गांव के वैद्य कमलेश शुक्ल के पुत्र पंकज शुक्ल का कवि पंकज प्रसून बनने तक का सफर काफी रोचक है. पंकज बचपन से ही डायरी में कविताएं लिखा करते थे. 1997 में जब वे कक्षा नौ में थे तब पिता को पंकज के कविता लिखने की जानकारी हुई. उसी वर्ष जून में अपने गांव सहजौरा में पंकज ने पहली बार कवि सम्मेलन में शिरकत की. लोगों को पंकज की रचना इस कदर भाई कि उन्होंने पंकज को मालाओं से लाद दिया.

इसके बाद उनके पिता ने उन्हें 'प्रसून' नाम दिया और वे पंकज प्रसून कहलाने लगे. वर्ष 2000 में पंकज ने लखनऊ के कान्यकुब्ज कॉलेज में बीएससी में एडमिशन लिया. उसी वर्ष उन्होंने लखनऊ के विश्वेश्वरैया सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रसिद्ध हास्य कवि के.पी. सक्सेना को सुना. यहीं से पंकज को हास्य-व्यंग्य कविताएं लिखने की प्रेरणा मिली. पंकज बताते हैं, ''मैंने हास्य कवि के.पी. सक्सेना, गोपाल चतुर्वेदी जैसे कवियों की संगत में रहकर हास्य-व्यंग्य लेखन की विधा को समझा.''

लखनऊ में पहली बार 2004 में लखनऊ महोत्सव आयोजन समिति ने एक परीक्षा के जरिए तीन युवा कवियों को 'युवा कवि सम्मेलन' में हिस्सा लेने के लिए चुना. इसमें व्यंग्य की श्रेणी में पंकज चुने गए. युवा कवि सम्मेलन में पंकज ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं का ध्यान खींचा. यहीं से उनकी बड़े आयोजनों में शिरकत करने की शुरुआत हुई. वर्ष 2004 में पंकज लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए कर रहे थे. इस दौरान विश्वविद्यालय के छात्रों का एक दल कानपुर आइआइटी के वार्षिक समारोह 'अंतराग्नि' में शिरकत करने गया था. इस दल को कुल छह पुरस्कार मिले जिनमें पांच अकेले पंकज ने जीते थे.

इसके बाद से पंकज सेलेब्रिटी बन गए. देश भर के सभी बड़े संस्थान वार्षिक समारोह में पंकज को बुलाने लगे. आज देश का कोई ऐसा नामचीन संस्थान नहीं है जहां के कार्यक्रमों उन्होंने अपनी रचनाएं न सुनाई हों. नवंबर, 2016 को नोटबंदी के बाद पंकज ने हास्य कविता के माध्यम से बैंक की लाइन में लगे प्रसिद्ध कवियों-शायरों की मन:स्थिति को बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत किया. इस हास्य कविता ने देश भर में वाहवाही बटोरी. फरवरी, 2017 में लाल किले में हुए कवि सम्मेलन की शुरुआत पंकज ने अपनी रचना पढ़कर की.

व्यंग्य के जरिए विज्ञान को समझाने की पंकज की इस अनोखी कला को विज्ञान प्रगति पत्रिका ने लगातार अपने संपादकीय में जगह दी. 2018 में लखनऊ में हुई विज्ञान कांग्रेस में पंकज ने पहली बार विज्ञान कविता लेखन पर एक कार्यशाला का आयोजन किया. इस साल सितंबर महीने में लखनऊ में पंकज ने पहली बार विज्ञान कवि सम्मेलन आयोजित करके एक नए प्रयोग को मूर्त रूप दिया.

संघर्ष

गरीब परिवार से आने के कारण कविता लेखन और इसके लिए जरूरी अध्ययन के लिए संसाधनों का न होना

टर्निंग पॉइंट

वर्ष 2017 में लाल किला में आयोजित कवि सम्मेलन में हिस्सा लेना

उपलब्धि

किताब परमाणु की छांव में को यूपी हिंदी संस्थान का के.एन. भाल पुरस्कार, किताब जनहित में जारी को हिंदी संस्थान का डॉ. रांगेय राघव पुरस्कार मिला. द लंपट गंज, पंच प्रपंच पुस्तकों ने भी प्रसिद्धि बटोरी है

सफलता के सूत्र

जो मिल गया उसे मुकद्दर समझ लिया, जो खो गया उसे भुलाता चला गया

सफलता के कारक

विज्ञान को कविता के जरिए लोकप्रिय बनाना, आम बोलचाल की भाषा में मौजूं विषय पर हास्य-व्यंग्य

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