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विशेषांकः मेरी 2001 में इंग्लैंड की जीत अहम थी...

...क्योंकि इसने मुझे यह साबित करने में मदद की कि ताकत और दमखम की जरूरत वाले आधुनिक बैमिंटन में भी भारतीय जीत सकते हैं’’

पुलेला गोपीचंद पुलेला गोपीचंद

जिंदगी का निर्णायक पल

पुलेला गोपीचंद, 47 वर्ष 


अब भारत की बैडमिंटन टीम के राष्ट्रीय कोच, गोपीचंद की कोशिशों से साइना नेहवाल को 2012 के लंदन ओलंपिक में कांस्य और पी.वी. सिंधु को 2016 के रियो गेम्स में रजत जीतने में मदद मिली. उन्हीं की बदौलत खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण लेने के लिए अब विदेश जाने की जरूरत नहीं है बल्कि वे हमारे अपने परिवेश से उभर रहे हैं

वर्ष 1999 की जून में पुलेला गोपीचंद ने जब अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय, मलेशियाई ओपन चैंपियनशिप में हिस्सा लिया, वे महज 17 वर्ष के थे. वे भारतीय टीम के सबसे कम उम्र के सदस्य थे. गोपीचंद कहते हैं, ''हम सब पहले ही दौर में हार चुके थे. उस रात जब हम खाने के लिए बैठे तो हम चीन, डेनमार्क, जापान और इंडोनेशिया वालों के बेहतरीन हुनर की तारीफ कर रहे थे और हर कोई सोचता था कि हम बेहतर नहीं कर सकते.

मैंने कहा कि बस हम थोड़ा-सा ठान लें तो हमारे लिए भी मौका है, लेकिन दूसरों ने मुझे अपरिपक्व कहकर खारिज कर दिया. मगर मेरे भीतर का बच्चा हमेशा मानता था कि हम कर सकते हैं.’’

आगे की राह में कई कड़वे सबक मिले. खिलाड़ी के तौर पर अपने शुरुआती वर्षों में उन्हें अकेले सफर करना पड़ता, क्योंकि भारत से कोई और क्वालिफाइ ही नहीं होता था. ''मेरे साथ दो-दो हाथ करने वाला कोई साथी नहीं होता. एक बार तो मैं टूर्नामेंट के बाद इस उम्मीद में ठहर गया कि इंडोनेशिया की राष्ट्रीय टीम के साथ सीखने का मौका मिलेगा.

मुझे यह जानकर मायूसी हुई कि प्रकाश (पादुकोण) सर (ऑल इंग्लैंड ओपन चैंपियनशिप जीतने वाले पहले भारतीय) के वहां प्रशिक्षण लेने और उन्हें हराने के बाद किसी भी दूसरे शख्स को इजाजत नहीं दी गई थी. डेनमार्कवासियों के साथ ऐसे ही तजुर्बे के बाद मुझे एहसास हुआ कि इसका जवाब बाहर जाकर प्रशिक्षण लेना नहीं है. हमें अपने दम पर सब करना होगा.’’ 

बुनियादी ढांचे यानी मॉडर्न कोर्ट, क्वालिटी शटल और ट्रेनर की तकलीफदेह कमी ने चीजों को मुश्किल बना दिया. वे कहते हैं, ‘‘एक वक्त था जब भीड़ मेरी गलतियों पर हंसती. दिल को ठेस लगती. स्टेडियम में मैं अकेला भारतीय था और इससे मेरे निजी और राष्ट्रीय स्वाभिमान को ठेस लगती.’’ इन अनुभवों ने उन्हें अपनी अकादमी शुरू करने के लिए प्रेरित किया.

वर्ष 2001 की ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप में उनकी जीत निर्णायक मोड़ साबित हुई. गोपीचंद कहते हैं, ‘‘मेरे लिए जीतना अहम था, यह साबित करने के लिए कि आधुनिक बैडमिंटन के जमाने में, जहां ताकत और दमखम की बहुत अहमियत है, भारतीय भी जीत सकते हैं. जीत के बगैर मैं कोचिंग प्लेटफॉर्म नहीं बना सकता था और अपने छात्रों समेत तमाम लोगों को यह नहीं दिखा सकता था कि हम क्या पा सकते हैं.

1980, जब प्रकाश सर ने ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीती थी, और 2000 के बीच बैडमिंटन के साथ हमारा नाता ही करीब-करीब टूट गया था.’’ इस जीत ने उन्हें अकादमी बनाने के लिए सरकारी मदद के साथ-साथ प्रायोजक हासिल करने में भी मदद की.

उसके बाद हर ओलंपिक ने अगली सीढ़ी चढऩे की पायदान का काम किया. यह 2008 के बीजिंग ओलंपिक से शुरू हुआ जिसमें साइना नेहवाल के प्रदर्शन (क्वार्टर फाइनल तक पहुंचना) ने बैडमिंटन को उस वक्त चर्चा में ला दिया जब यह खेल भारत की प्राथमिकता सूची में नहीं था.

2012 के लंदन ओलंपिक में साइना नेहवाल के कांस्य और 2016 के रियो ओलिंपिक में पी.वी. सिंधु के रजत पदक की बदौलत इस खेल पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा. गोपीचंद कहते हैं, ‘‘इसके लिए बहुत कड़ी मेहनत और त्याग करने पड़े, लेकिन मुझे अच्छा लगा क्योंकि खेल के प्रति मैं जुनूनी था. इसका मतलब अपने परिवार के लिए त्याग भी था.’’

आगे का रास्ता कैसा नजर आता है? वे कहते हैं, ''कुछ वक्त तो हम सिर्फ हैदराबाद के ही खिलाड़ी तैयार कर रहे थे. अब हम देश भर से प्रतिभाओं को उभरते देख रहे हैं. जरूरी यह है कि हम व्यवस्था को इस तरह आसान और कारगर बनाएं कि वह कोच और खिलाड़ी तथा उनके लिए जरूरी हर चीज दे सके. खेलों के घरेलू ढांचे को भी इस तरह ढालने की जरूरत है.’’ फिलहाल तो तमाम नजरें 2021 के टोक्यो ओलंपिक से पहले सिहधु पर हैं.

‘‘मेरे लिए जीतना अहम था, यह साबित करने के लिए कि आधुनिक बैडमिंटन के जमाने में, जहां ताकत और दमखम की बहुत अहमियत है, भारतीय भी जीत सकते हैं. जीत के बगैर मैं कोचिंग प्लेटफॉर्म नहीं बना सकता था’’

अकेला सारथी
गोपीचंद बताते हैं कि एक वक्त ऐसा था जब स्टेडियम में भीड़ उनकी गलतियों पर हंसती और वे अकेला भारतीय होते थे. इससे स्वाभिमान को ठेस लगती थी

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