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ई-वाहनों का उस्ताद

समस्याओं का समाधान हमारा लक्ष्य है. विभिन्न जगहों पर फैक्टरियों की बदौलत हम पूरे देश में अपनी सेवाएं मुहैया कराने की योजना बना रहे हैं. हम दुनियाभर में इलेक्ट्रिक वेहिकल आपूर्ति करने की तैयारी कर रहे हैं

चंद्रदीप कुमार चंद्रदीप कुमार

मंगलापुरी (दिल्ली) की एक पतली गली में मकान नंबर 124 को देखने से यह पता नहीं लगता कि यहां नवाचार (इनोवेशन) की बड़ी इबारत लिखी गई है. न ही यहां मौजूद 25 साल के युवा राघव हांडा को देखकर यह पता चलता है कि उनकी उंगलियां मोबाइल पर किसी गेम में नहीं, बल्कि हजारों लोगों की रोजी-रोटी में पडऩे वाली अड़चनों को खेल-खेल में दूर करने में लगी हैं. यह कहानी खिलौनों से शुरू होकर ई-रिक्शा तक पहुंचने वाली कंपनी ओके प्ले की है जो अभी मीलों और चलने के रास्ते बना रही है और समस्या से समाधान के बीच के फासले में तलाश रही है व्यवसाय.

खिलौने बनाने वाली ब्रिटिश कंपनी ओके प्ले को राजन के पिता राजन हांडा ने 1989 में खरीदा था. 1992 तक कंपनी सिर्फ खिलौने के व्यवसाय तक रही. 1992 के अंत में कंपनी ने प्लास्टिक के क्षेत्र में काम शुरू किया. कंपनी ने गुणवत्ता वाले प्लास्टिक प्रोडक्ट का निर्माण शुरू किया और ट्रक तथा वाहन बनाने वाली कंपनियों को स्पेयर पाट्र्स की आपूर्ति शुरू की. फौरी तौर पर पहला नवाचार प्लास्टिक का फ्यूल टैंक बनाना था. यह प्रयोग सफल रहा.

लेकिन दूसरे उद्यमियों की तरह राघव के परिवार की भी लंबी कहानी है. उनके दादा-परदादा लाहौर में रहते थे और विभाजन के बाद भारत आ गए. उनके दादा हिमाचल में जज थे. उनके पिता राजन ने पंजाब विश्वविद्यालय से इंजीनीयरिंग की पढ़ाई की. फिर आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए. वहां से आने के बाद यहां अपना काम शुरू किया और खिलौने बनाने वाली कंपनी ओके प्ले को खरीदा और इतिहास रच डाला.

राजन हांडा कंपनी के प्रमुख हैं. राघव और उनके जुड़वां भाई ऋषभ उसी में अलग-अलग महत्वपूर्ण क्षेत्रों की जिम्मेदारी निभाते हैं. राघव ऑपरेशंस और न्यू प्रोडक्ट डेवलपमेंट और ऋषभ सेल्स तथा मार्केटिंग का काम देखते हैं. दोनों को परिवार के साथ वक्त बिताने का मौका कम ही मिलता है पर मिलने पर बड़ी बहन नंदना और दूसरे सदस्यों से जरूर मिलते हैं.

राघव पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनी कंपनी में इंटर्नशिप के दौरान एक तरफ काम सीखते थे तो दूसरी तरफ समस्या और समाधान के बीच के फासले को व्यावसायिक अवसर के रूप में बदलने की सोचा करते थे. यही सोच वह टर्निंग पॉइंट साबित हुई जिसने उन्हें प्लास्टिक का ई-रिक्शा ''राजा" बनाने को प्रेरित किया. इसे 2015 में लॉन्च किया गया था.

राजा रिक्शा (ई-रिक्शा) के पीछे सोच यह थी कि रिक्शा पर एक इनसान दूसरे इनसान को खींचने से बचे. राघव कहते हैं, ''लेकिन यह मौलिक सोच हमारी नहीं है. रिक्शा खरीदने से लेकर चलाने तक की जो दिक्कत है, उसे कैसे दूर किया जाए, इसका पैकेज हमने तैयार किया." रिक्शा जब तक चल रहा है तभी तक कमाई होती है. कमाई रुकने पर रिक्शा खरीदने वाले किस्त समय पर नहीं दे पाएंगे. लेकिन दिक्कत यही नहीं है. 1,16,000 रु. का एक रिक्शा खरीदने के लिए बैंक में क्या कागजात चाहिए, गारंटर कौन होगा, जैसी कई समस्याएं हैं. राघव इसका भी समाधान लेकर आए हैं. उनकी कंपनी रिक्शा खरीदने वाले को नॉन बैंकिंग फाइनेंस सर्विस (एनबीएफसी) से लोन दिलाती है. इस तरह से गारंटर भी वही होती है.

राघव कहते हैं, ''हमने एक सेंट्रलाइज्ड मॉनिटरिंग यूनिट तैयार की है. जो रिक्शा हमारे शो रूम से निकलता है वह जीपीएस से जुड़ा रहता है. रिक्शा कहां चल रहा है या रुका है, यह पता चलता है. रिक्शे में खराबी का पता चलते ही हम तुरंत बाइक पर मेकेनिक को रिक्शा तक भेजते हैं." इसे सर्विस ऑन बाइक कहते हैं.

राजा रिक्शा की एक खास बात यह भी है कि पर्यावरण के लिहाज से यह अनुकूल है. चूंकि पूरा रिक्शा ही प्लास्टिक से बना है इसलिए इसे पेंट करने की जरूरत नहीं होती. इस कारण रिक्शे की वजह से प्रदूषण की आशंका खत्म हो जाती है. चूंकि इस रिक्शा में मेटल का प्रयोग नाम मात्र का है इसलिए जंग भी नहीं लगती और रिक्शे की आयु 10 साल से अधिक होती है.

चूंकि भारत ने 2030 तक पूरी तरह इलेक्ट्रिक कार का लक्ष्य बना रखा है, लिहाजा कंपनी इसी दिशा में काम कर रही है. राजा ई-रिक्शा के अलावा कंपनी के अन्य उत्पादों में ई-वेंडिंग कार्ट, ई-मोबाइल शॉप, ई-लोडर, ई-गार्बेज कलेक्टर, ई-स्कूल बस और ई-स्कूटर हैं. ई-रिक्शे का वजन 320 किलो है और यह 700 किलो वजन ढो सकता है. इसकी अधिकतम स्पीड 24 किमी प्रति घंटा है और बैटरी एक बार पूरी तरह चार्ज हो जाए तो 80 किमी तक चलती है. यह कंपनी हर साल 20,000 ज्यादा वाहन तैयार कर सकती है."

ओके प्ले की फैक्टरियां अभी अहमदनगर (महाराष्ट्र), सूरत (गुजरात), सोहना (हरियाणा), कुरुक्षेत्र (हरियाणा), रानीपेट (तमिलनाडु), कोलकाता (पश्चिम बंगाल) गुवहाटी (असम) में हैं. चार और फैक्टरी लगने वाली हैं. प्रत्येक फैक्टरी में हर महीने 2,000 रिक्शा बनाने की क्षमता है.

ओके प्ले जल्द ही प्लास्टिक ऑटो लाने की तैयारी में है. यह ऑटो 50 किलोमीटर की स्पीड से चल सकता है. राघव का मानना है कि यह एक क्रांतिकारी बदलाव होगा. मेटल के ऑटो के मुकाबले प्लास्टिक के ऑटो न सिर्फ वजन में हल्के होंगे बल्कि इसकी आयु भी लंबी होगी. इसमें जंग लगने, पेंट कराने या टूट-फूट की मरम्मत कराने की जरूरत नहीं होगी. वे कहते हैं, ''हम ज्वाइंटलेस बॉडी वाला ऑटो बनाने की सोच रहे हैं."

जमाने की जरूरतों के मुताबिक बदलने और नवाचार से समस्याओं के समाधान की बदौलत राघव ओके प्ले वेहिकल्स को कई पुरानी कंपनियों को टक्कर देने के लिए तैयार कर रहे हैं.

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