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विशेषांकः भौतिक वस्तुओं से नहीं, प्रेम से आता है सच्चा आनंद

मैं सत्यनिष्ठ, न्यायपूर्ण और अन्य-केंद्रित होने की कोशिश करता हूं. पर मैं उम्मीद करूं कि हर कोई मेरे बारे में अच्छी भावनाएं रखेगा तो खुद को धोखा दे रहा होऊंगा.

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ओस्वाल्ड कार्डिनल ग्रेसियस 
ओस्वाल्ड कार्डिनल ग्रेसियस 

खुशी की गुरु वाणी

ओस्वाल्ड कार्डिनल ग्रेसियस

हर कोई प्रसन्नता की तलाश में है. इसकी तलाश हम दूसरों के लिए, अपने लिए और अपने प्रियजनों के लिए करते हैं. लेकिन क्या दुनिया कभी पूरी तरह खुश हो सकती है? मैं हमेशा उम्मीद करता था कि जैसे-जैसे हम दर्शन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और संचार में और अधिक उन्नत होते जाएंगे, और प्रगति करेंगे, दुनिया में पहले से अधिक शांति, आनंद और प्रसन्नता होगी. लेकिन दुनिया पर एक नजर डालने से पता चलता है कि ऐसा नहीं हुआ.

आज की दुनिया की तुलना एक या दो दशक पहले की दुनिया से करें. पहले से ज्यादा नहीं, तो आज भी उतने ही तरह के छोटे-बड़े संघर्ष मौजूद हैं. युद्ध जारी हैं, और आतंकवाद तथा भूख भी. और फिलहाल हम एक महामारी से रूबरू हैं. तो फिर कोई प्रसन्नता की खोज कैसे करे? और क्या हम कभी भी संपूर्ण प्रसन्नता हासिल कर सकते हैं?

और खुशी है क्या? हम अलग-अलग हिस्सों में बांट सकते हैं—सत्य, न्याय, एकता, और इन सभी का सामंजस्य. इसका परिणाम शांति होना चाहिए—एक गहरी शांति जो तभी आती है जब इन सभी तत्वों में पूर्ण सामंजस्य हो. क्या यह सचमुच प्राप्त हो सकती है?

जिस शांति की हम तलाश करते हैं, वह बहुत हद तक हमारे संबंधों पर निर्भर करती है—ईश्वर से संबंध, दूसरों से संबंध और स्वयं अपने साथ संबंध. मेरा विश्वास एक व्यक्तिगत ईश्वर में है; अगर मैं परमेश्वर की प्रार्थना करूं, उसकी बात सुनूं और उसकी आज्ञाओं का पालन करूं, उससे मुझे और भी शांति मिलेगी. अगर मेरा प्रिय-अप्रिय दोनों तरह के लोगों से स्वस्थ संबंध है और अपने रिश्तों को मैं न्यायोचित बनाए रखूं, तो मैं अपने आप के साथ शांति से रहूंगा.

प्रसन्नता के लिए दूसरों को केंद्र में रखकर व्यवहार करना होगा. मैं यथासंभव अधिक से अधिक भौतिक वस्तुएं प्राप्त कर सकता हूं, पर यदि भौतिकवाद मेरी प्राथमिकता है तो मेरी इच्छाओं की कोई सीमा न होगी. प्रसन्नता तो प्रेम और दूसरों पर केंद्रित व्यवहार से आती है. 
क्या कोई कभी पूरी तरह से सुखी हो सकता है? मैं सत्यनिष्ठ, न्यायपूर्ण और अन्य-केंद्रित होने की कोशिश करता हूं. पर मैं उम्मीद करूं कि हर कोई मेरे बारे में अच्छी भावनाएं रखेगा तो खुद को धोखा दे रहा होऊंगा.

पूर्ण प्रसन्नता या सुख का कोई सूत्र नहीं है. सूत्र खोज पाना संभव भी नहीं. यीशु मसीह ने हमें आठ धन्य वचन दिए, ''धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं; धन्य हैं वे जो शोक करते हैं; धन्य हैं जो चुप हैं; धन्य हैं वे जो धर्माचरण के लिए भूख-प्यास सहते हैं; धन्य हैं दयालु; धन्य हैं वे जिनके हृदय पवित्र हैं; शांतिदूत धन्य हैं; धन्य हैं वे जिन्हें धर्माचरण के लिए सताया जाता है.’’

क्या कोई कह सकता है कि वह इसे पूरी तरह से जीवन में उतारने में सक्षम है? यह एक ऐसा लक्ष्य है जिसके लिए हमें प्रयासरत रहना चाहिए पर यह प्राप्त होगा मृत्यु के बाद ही—जब हम शाश्वत आनंद में होते हैं.

प्रार्थना हमें शांति की अनुभूति देती है. ऐसा ही ध्यान और चिंतन से होता है. हमें लगता है कि भगवान हमारे सामने उपस्थित है. कुछ मनीषियों ने तो परमेश्वर की उपस्थिति की संवेदी भावनाओं का अनुभव भी किया है. लेकिन यह सब अस्थायी भाव हैं, क्योंकि हर किसी को मर्त्यलोक में वापस आना होता है.

पूर्ण सुख केवल ईश्वर से मिलन में ही संभव है. पृथ्वी पर रहते हुए लोग बाधाओं को दूर करते हुए और दूसरों के साथ संबंधों पर काम करते हुए यथासंभव खुश रहने की कोशिश करते हैं. अब हमने इसमें एक और तत्व जोड़ा है, ''प्रकृति के साथ हमारा संबंध. यह स्वत: ही स्वयं के साथ और अंतत: ईश्वर के साथ एक बेहतर संबंध में परिणत होगा.’’

प्रसन्नता क्या है और इसे कैसे प्राप्त किया जाता है, ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर हम जीवन भर खोजने की कोशिश करते रहेंगे. इस तरह से विचार करने के बाद ये प्रश्न निश्चित रूप से मेरे दिमाग पर छाए रहेंगे.

ओस्वाल्ड कार्डिनल ग्रेसियस 
बॉम्बे आर्कबिशप और कैथलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं.

खुशी का मंत्र
''प्रार्थना से हमारे भीतर शांति का भाव आता है.ध्यान और अंतर्चिंतन भी यही काम करता है. हम अपने को ईश्वर के सान्निध्य में पाते हैं’’.

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