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अनजाने नायकः बस महिलाओं के भरोसे

''वंचित महिलाओं को अपने पैसे के सही उपयोग के तरीके सीखने की जरूरत थी.'' बरुआ ने असम के तीन जिलों में वंचित समुदाय की 43,000 महिलाओं को बैकिंग सुविधाएं दीं और आसान कर्ज भी

नीलोत्पल बरूआ नीलोत्पल बरूआ

फरवरी 1990 की बात है. राज्य के स्वामित्व वाले एक सहकारी बैंक में काम करने वाली लखिमी बरुआ को एक लेख के जरिए सूरत के एक ऐसे कोऑपरेटिव बैंक की जानकारी मिली जिसे पूरी तरह से महिलाएं चलाती थीं. यह जानने के बाद बरुआ को अपने एक वर्षों पुराने सपने को साकार करने की राह दिखने लगी.

अपनी नौकरी के दौरान वे बहुत-सी वंचित महिलाओं से मिली थीं जिनमें से ज्यादातर अनपढ़ थीं और जो उनसे बैंक प्रक्रियाओं के साथ-साथ ऐसी निजी परेशानियों पर भी बातें करती थीं जिन्हें वे पुरुष कर्मचारियों के साथ साझा नहीं कर सकती थीं. वे कहती हैं, ''एक परित्यक्त महिला को यह नहीं पता था कि फॉर्म भरते समय पति के स्थान पर क्या लिखना है. इन महिलाओं को अपने पैसे के सही उपयोग के तरीके सीखने की जरूरत थी.''

हालांकि इनमें से कई महिलाएं छोटे-मोटे काम करके कुछ कमाई कर तो रही थीं लेकिन वित्तीय साक्षरता नहीं होने के कारण अक्सर परिवार के सदस्य या फिर बिचौलिये उनका शोषण करते थे. बरुआ भी 1983 से दक्षिण सरबाईबांधा सहकारी समिति में सक्रिय रही थीं, जो चायबागान मजदूरों के बीच शिक्षा, परित्यक्त महिलाओं को कानूनी मदद, विवाह परामर्श, परिवार नियोजन के बारे में जागरूकता फैलाने और यहां तक कि सड़क और पानी जैसे स्थानीय मुद्दों के लिए काम करती थी. बरुआ यह बात बखूबी जानती थीं कि वंचित महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए एक आंदोलन की जरूरत है.

उस लेख को पढऩे के दो सप्ताह के भीतर बरुआ ने रिजर्व बैंक को लिखा और आठ साल की कागजी कार्रवाई के बाद आखिरकार 1998 में बैंक शुरू करने की अनुमति मिल गई. 8,45,000 रु. की पूंजी और 1,500 शेयरधारकों, जिनमें से 90 फीसद गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले परिवारों से थीं, के साथ शुरू हुए इस बैंक की कार्यशील पूंजी आज 14 करोड़ रु. है. 43,000 ग्राहकों के साथ इस बैंक की जोरहाट, गोलाघाट और शिवसागर, तीन जिलों में चार शाखाएं हैं. बैंक के 75 फीसद ग्राहकों के अनपढ़ होने के बावजूद इसका एनपीए कुल दिए गए ऋण के 4 फीसद से भी कम है.

बरुआ का मानना है कि बैंक का काम केवल महिलाओं को खाता खोलने या ऋण लेने में मदद करना नहीं है, बैंक के 21 कर्मचारियों को ग्राहकों को अपने पैसे के सही उपयोग करने, सरकारी योजनाओं के लाभ उठाने और कानूनी अधिकारों के उपयोग के बारे में शिक्षित करने की भी ट्रेनिंग दी गई है.

बरुआ कहती हैं, ''मुझे नहीं पता कि सरकार इस तरह के बैंकों से 30 फीसद आयकर क्यों वसूलती है? हालांकि हम कई सरकारी कल्याणकारी योजनाएं चलाते हैं फिर भी राज्य सरकार हमारे माध्यम से कोई भी लेन-देन नहीं करती है.'' शायद यह बैंक को राजनेताओं से दूर रखने के उनके संकल्प की कीमत हो. वे कहती हैं, ''पता नहीं कब बैंक को मिलने वाला राजनैतिक संरक्षण, राजनैतिक हस्तक्षेप बन जाए. इसलिए दूरी ही बेहतर है''

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