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नया भारतः समझदारी की सीख

1977 में जब गोरखपुर के जाटों ने वाल्मीकियों का बहिष्कार किया तो स्वयं जाट कृष्ण स्वरूप ने ऐसा करने से मना कर दिया. वे वाल्मीकि परिवारों से घुलने-मिलने लगे और उन्हें अपने खेतों में जानवर चराने के लिए कहा. एक साल बाद 1978 में वाल्मीकियों और जाटों ने उन्हें गोरखपुर का सरपंच चुन लिया.

कुछ बात चले गोरखपुर गांव में साथी ग्रामीणों के साथ चर्चा करते कॉमरेड गोरखपुरिया कुछ बात चले गोरखपुर गांव में साथी ग्रामीणों के साथ चर्चा करते कॉमरेड गोरखपुरिया

'कॉमरेड' कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया  72 वर्ष, सामाजिक कार्यकर्ता, गोरखपुर गांव, हरियाणा

उनकी मां ने कृष्ण स्वरूप को बताया था कि 1947 के बंटवारे के समय वे आठ महीने के थे. हालांकि स्कूली रिकॉर्ड के मुताबिक अब वे 72 के हैं. प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी कृष्ण स्वरूप बातचीत में बहुत सरल इनसान हैं. उनके पास आजादी के बाद के इतिहास की कहानियों का जैसे पूरा खजाना है. वे जब पांच साल के थे तो एक स्थानीय आर्य समाजी नेता मास्टर मादूराम गोरखपुर गांव में उनके पिता के घर आए थे.

वे बताते हैं कि मादूराम ने जिस तरह से अंधविश्वास और मूर्ति पूजा के विरोध में निर्भीक तरीके से अपने विचार व्यक्त किए, उससे वे बहुत प्रभावित हुए थे. ''उसके बाद से मैंने कभी भी किसी मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे में कदम नहीं रखा.'' वे अब अपना पूरा समय लोगों को शिक्षित करने में व्यतीत करते हैं, जिनमें स्कूली बच्चे, कॉलेज के छात्र, कर्मचारी संघ, किसानों का समूह और स्थानीय खाप पंचायतें शामिल हैं. सभी लोग उनकी क्रांतिकारी बातें ध्यान से सुनते हैं.

1970 के दशक के शुरू में एमए के दौरान छात्र राजनीति में कदम रखने वाले स्वरूप बताते हैं कि 1973 में हिसार के जाट कॉलेज से उनका नाम काट दिया गया था क्योंकि उन्होंने अध्यापकों की राज्यव्यापी हड़ताल का समर्थन करने का फैसला किया था.

छात्र राजनीति के अनुभवों ने उन्हें वामपंथ की तरफ मोड़ दिया. वे माकपा के कार्ड होल्डर बन गए पर 2008 के बाद उन्होंने खुद को राजनीति से अलग कर लिया. लेकिन आज भी लोग उन्हें सम्मान से 'कॉमरेड कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया' के नाम से बुलाते हैं. गोरखपुर में उन्होंने कॉमरेड पृथ्वी सिंह यादगार समिति (एक स्थानीय वामपंथी नेता को श्रद्धांजलि) का नेतृत्व किया था. गांव के किनारे इस समिति का एक भवन है जहां लोगों का जमघट लगा रहता है.

यह उन कई जगहों में से एक है जहां वे गांव और आसपास के युवाओं से चर्चाएं करते हैं और उन्हें अपने साथ जोडऩे का प्रयास करते हैं. उनकी चर्चाओं में खेलकूद, वृक्षारोपण, ऑर्गेनिक और शून्य बजट की खेती से लेकर विज्ञान और शिक्षा में हो रही प्रगति जैसे विषय शामिल होते हैं. उनका सेंटर स्पोट्र्स अकादमी के तौर पर भी काम करता है जहां से इस साल 7 लड़के राष्ट्रीय वॉलीबाल में हिस्सा लेने गए. इसके अलावा यहां एक कोचिंग सेंटर भी चलता है जहां लड़के और लड़कियां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. स्वरूप गोरखपुर के सेंटर में समय देने के बाद बचे हुए समय में कर्मचारी संघों, छात्रों और किसानों को भी संबोधित करते हैं.

लेकिन कॉमरेड केवल उपदेशक भर नहीं हैं. उनके चार में से दो बच्चों ने उनके कहने पर अंतरजातीय विवाह किए हैं. मैट्रिक तक पढ़ी उनकी बेटी ने उनके प्रयासों से ग्रेजुएट की पढ़ाई पूरी की और एक स्थानीय स्कूल में अध्यापिका बन गईं. वे जब चंडीगढ़ में अपनी पोतियों से मिलने जाते हैं तो उनके चेहरे की खुशी साफ नजर आती है.

—असित जॉली

दूसरा पहलूः 1977 में जब गोरखपुर के जाटों ने वाल्मीकियों का बहिष्कार किया तो स्वयं जाट कृष्ण स्वरूप ने ऐसा करने से मना कर दिया. वे वाल्मीकि परिवारों से घुलने-मिलने लगे और उन्हें अपने खेतों में जानवर चराने के लिए कहा. एक साल बाद 1978 में वाल्मीकियों और जाटों ने उन्हें गोरखपुर का सरपंच चुन लिया.

''वे हम सभी को प्रेरित करते रहते हैं. उनकी वजह से ही हमारे जैसे लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हुआ है.''

बलबीर सिंह, गोरखपुर के कॉमरेड पृथ्वी सिंह यादगार समिति के एक पदाधिकारी, जिसे कृष्ण स्वरूप ने 2008 में स्थापित किया था.

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