scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 29/- रुपये में

कचरे से हजारों करोड़

1995 में उन्होंने आंचल से शादी की, जो जयपुर के तिलक नगर में ज्यादातर विशाल घरों को खुद अपनी बनाई कला और शिल्प की चीजों से सजाने-संवारने का काम करती हैं.

X
रजत अग्रवाल
रजत अग्रवाल

36वीं वर्षगांठः दिग्गज कारोबारी

रजत अग्रवाल, 55 वर्ष,

जयपुर, राजस्थान
कंपनीः ग्रैविटा इंडिया लिमिटेड
कुल संपत्तिः 1,800 करोड़ रु .

कहां करते हैं निवेश
मुनाफे को वे कंपनी की क्षमता बढ़ाने के अलावा एल्युमिनियम, कागज, तांबा और प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग तथा लीथियम आयन बैट्रियां बनाने के नए उद्यमों में लगाते हैं

सरकारी अस्पताल में डॉक्टर पिता महावीर प्रसाद और सलीके वाली गृहिणी मां माला के घर जन्मे रजत अग्रवाल ने 1989 में जयपुर के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. ज्यादातर पढ़ाई उन्होंने हिंदी माध्यम से और वह भी सरकारी स्कूलों से की थी. वे मेधावी और लगनशील छात्र थे.

सरकारी अस्पताल में होने की वजह से पिता का बार-बार राजस्थान के अलग-अलग जिलों में तबादला होता रहता था. अंत में वे जयपुर में आकर बस गए, जहां वे स्वास्थ्य निदेशक थे. पिता को इस तरह से एक शहर से दूसरे शहर में डोलते देख परिवार की और रजत की यही राय बनी कि सरकारी नौकरी खोजने की बजाए अपना कोई कारोबार स्थापित किया जाए.

उसी उधेड़बुन में पहला उद्यम यह था कि उन्होंने जयपुर के बाहरी छोर पर एक लाख रुपए में 35 बीघा खेती लायक जमीन खरीदी. पूसा इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों से बात करने के बाद उन्होंने उच्च गुणवत्ता वाले बीज मंगाए और आधुनिक कृषि तकनीक के साथ खेती में हाथ आजमाना शुरू किया. जैसे नतीजे की उम्मीद थी, वैसा ही हुआ. फसल बहुत उम्दा हुई जिसकी कमाई से उन्होंने होल्स्टीन नस्ल की दस गाएं भी खरीद लीं.

ठीक उसी वक्त उन्होंने लार्सन ऐंड टुब्रो का स्टॉकिस्ट बनकर उद्योग जगत में कदम रखा और ट्रेनों को रोके बगैर पटरियों पर पहियों के बर्न होने की तुरत-फुरत मरम्मत का ठेका हासिल कर लिया. 1995 में उन्होंने आंचल से शादी की, जो जयपुर के तिलक नगर में ज्यादातर विशाल घरों को खुद अपनी बनाई कला और शिल्प की चीजों से सजाने-संवारने का काम करती हैं.

भारत में शीशे की कमी को देखते हुए, रजत ने इसके फौरन बाद शीशे का रीसाइक्लिंग संयंत्र स्थापित किया. मगर उस दौरान सरकारी नीतियां बदलीं और आयात पर पाबंदी लग गई, लिहाजा उन्होंने इसकी बजाए शीशा आधारित रसायन बनाने शुरू किए. नीतियां एक बार फिर बदलीं और उनके लिए उत्पादन बेहद महंगा हो गया. इसका नतीजा यह हुआ कि यह उभरता करोड़पति देखते-देखते दिवालिया हो गया.

थक-हारकर रजत 1999 में सिंगापुर चले गए और कबाड़ का व्यापार करने वाली कंपनी में नौकरी कर ली. वहां से वे मलेशिया की कंपनियों को कंसल्टेंसी सेवाएं भी देते थे. इसके बाद उन्होंने पड़ोसी देश श्रीलंका में पार्टनरशिप में रीसाइक्लिंग संयंत्र लगाया. 2004 में उन्होंने इस उपक्रम में से अपनी हिस्सेदारी बेचकर मुनाफा कमाया, अपने कर्ज चुकाए और कुछ हिस्सा पूर्वी अफ्रीकी देश इथियोपिया में निवेश किया.

2006 आते-आते उनकी कंपनी ग्रैविटा दिवालिएपन से बाहर आ गई. उसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. अपने कारोबार को और कई गुना बढ़ाने के साथ वे उसे अफ्रीका, पूर्वी यूरोप और मध्य तथा उत्तर अमेरिका के दूसरे देशों में खूब फैलाते रहे.

ग्रैविटा के पास दुनिया के सबसे बड़े रीसाइक्लिंग संयंत्रों में से एक है. 1.25 लाख टन की क्षमता के साथ इसका संयंत्र आधा दर्जन शीर्ष संयंत्रों में शुमार है, जबकि हिंदुस्तान जिंक की उत्पादन क्षमता 1.85 लाख टन है. 2010 में रजत अपनी कंपनी का पब्लिक इश्यू लेकर आए, जो ओवरसब्सक्राइब हुआ.

रजत अपने कारोबार से हासिल मुनाफे की रकम को कंपनी की ही क्षमता बढ़ाने के अलावा एल्युमिनियम, कागज, तांबा, प्लास्टिक और लीथियम आयन बैटरियों की रीसाइक्लिंग के नए उद्यमों में निवेश करते हैं.

रजत से जुड़े कुछ तथ्यों को आप विचित्र किंतु सत्य की तरह पढ़ सकते हैं. मसलन, उनके 2,664 कर्मचारियों में से 13 उनके बैच के सहपाठी हैं. इसके अलावा उनकी इतनी बड़ी कंपनी में उनका कोई भी रिश्ते-नातेदार काम नहीं करता. उनका पहला प्यार सफर करना है.

खेलों में भी उनकी गहरी दिलचस्पी है, इसीलिए अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप मुकाबलों में आप उन्हें अक्सर परिवार के लोगों और दफ्तर के कुछ साथियों के साथ देख सकते हैं. उनकी 21 साल की बेटी आरवी बोस्टन में पढ़ रही है, तो बेटा कृश 11 साल का है और छठी में पढ़ रहा है.

ताउम्र कड़ी मेहनत करने के बाद उन्हें अब दिन मंव तीन घंटे काम करना होता है जिसमें वे मॉनिटरिंग करते या रणनीतिक टीम बनाने के काम करते हैं. बाकी का ज्यादातर समय सामाजिक मेलजोल में बिताते हैं. खुद खिलाड़ी रजत के पास आठ कारें हैं और उन्हें फॉर्चूनर एसयूवी से कच्चे रास्तों का सफर तय करना अच्छा लगता है.

वे उस दौर को याद करते हैं जब दिवालिया होने के दौरान कुछ लोग ताने मारते हुए कहते कि उन्होंने अपने पिता का कमाया सब कुछ बर्बाद कर दिया. दरअसल, उस बीच उन्हें कर्ज के लिए गिरवी रखा अपना पैतृक मकान बेचना पड़ा था. तब वे अकेले में छुप-छुपकर रोया करते थे.

जिंदगी के अपने फलसफे का खुलासा करते हुए वे कहते हैं, ''मैंने अपना क्लास बनाए रखा, परिवार को सुख-सुविधाएं दीं, भले ही हमें बच्चों को जन्म देना कुछ वक्त के लिए टालना पड़ा हो. अब हम अपने साधनों से शान की जिंदगी जीते हैं.’’ दोपहर का खाना वे अक्सर अपने कर्मचारियों और अफसरों के साथ खाते हैं, जिनको उन्होंने ऐट पार वैल्यू पर शेयर दिए हुए हैं ताकि कंपनी के अच्छे कामकाज को लेकर उनका मनोबल बना रहे. 

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें