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नया भारतः देसी हुनर की उड़ान

छोटे शहरों के मूल्यों में पली-बढ़ रही डिजाइनरों की एक नई पौध पुराने दिनों के सौंदर्य को नए सिरे से रच रही है. यह नई जमात इतिहास को गहराई के साथ टटोलकर और अतीत की यादों को ताजा करके पेश कर रही अपनी नई स्टाइल

संदीप सहदेव संदीप सहदेव

राजधानी दिल्ली से करीब 200 किलोमीटर दूर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर सहारनपुर की संकरी गलियों में मोहम्मद मजहर कढ़ाईवालों के पारंपरिक कशीदे के काम में अपने अगले कलेक्शन के लिए नई प्रेरणा खोज रहे हैं. इस 29 साल के युवक ने लैक्मे फैशन वीक में दो बार अपने काम का प्रदर्शन किया है और उन्हें सबसे शानदार जेननेक्स्ट फैशन डिजाइनरों में से एक माना गया था. लेकिन वे सहारनपुर से ही काम करके संतुष्ट हैं और किसी बड़े शहर में जाकर बसने का उनका कोई इरादा नहीं है. वे अपने इरादे को वाजिब ठहराते हुए कहते हैं कि उन्हें अपनी डिजाइनों के लिए अफसाने और संदर्भ यहां मिल जाते हैं. वे किसी हाइ-प्रोफाइल करियर की स्थापित धारणाओं का प्रतिरोध करते हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि वे इस छोटे-से शहर को देश के फैशन नक्शे पर टांकने का माद्दा रखते हैं.

यह सब उस वक्त शुरू हुआ जब नौवीं कक्षा में पढ़ रहे मजहर ने स्कूल में अपने एक सीनियर के साथ मिलकर एक बुटीक स्थापित किया. उस सीनियर के पिता का भी एक बुटीक था. मजहर का पहला कलेक्शन धोबीघाट 2017 में आया. उसमें उनके शहर से जुड़ी यादों को उकेरा गया था. कपड़े धोने का काम करने वाली महिला सकीना बेगम उनके यहां लगातार आती थीं और कपड़ों पर छोटा-सा निशान बना देती थीं. लिहाजा मजहर के कलेक्शन के सफेद कपड़ों पर वे निशान थे जिन्हे सकीना और 30 अन्य महिलाओं ने एक डिजाइन सरीखा बनाने के लिए कपड़ों पर अंकित किया था. उनके अगले कलेक्शन में रफूगरों की कला यानी रफू के निशान का इस्तेमाल किया गया था. वे कहते हैं, "मेरी प्रेरणा भारतीय कारीगर हैं, खासकर वे जो परोक्ष रूप से फैशन उद्योग को अपना योगदान देते हैं, जैसे धोबी और रफूगर.''

सहारनपुर लकड़ी के हस्तशिल्प के लिए जाना जाता है और मजहर का परिवार भी उसी काम में लगा है. वे कहते हैं, "एक पारंपरिक मुसलमान परिवार से होने की वजह से मेरे लिए यह कहना आसान नहीं था कि मैं डिजाइनर बनना चाहता हूं.'' वे अपना लेबल राष्ट्रीय रोजगार कार्यक्रम के तहत चला रहे हैं और करीब 70 लोग उनके लिए काम कर रहे हैं. उनकी डिजाइन में छोटे शहर के जीवन और वहां के कारीगरों के तौर-तरीकों की झलक मिलती है.

राहुल मिश्र भी पेरिस फैशन वीक में प्रदर्शित अपने कलेक्शन में अपने गांव मलहौसी को याद करते हैं. उनकी डिजाइनों में भी पुरानी यादें अहम ताकत के रूप में उभरती हैं. उनका बचपन में कई चीजों से बड़ा गहन रिश्ता था—तकियों के गिलाफ, पर्दे, मेजपोश, दादी की धोती की सफेदी, छोटा-सा तालाब, ओस की बूंदें और उत्तर प्रदेश के उनके छोटे से गांव के बुनकरों और कसाइयों की लुंगियों के सफेद तथा नीले चौखाने—अब वे सब एक डिजाइनर के तौर पर उनकी कहानियों का हिस्सा हैं.

भारतीय फैशन को छोटे शहरों से आने वाले डिजाइनर आकार देते रहे हैं, पर उन्होंने दिल्ली-मुंबई को अपना बसेरा बना लिया है. मसलन, बिहार में जमालपुर के पास एक छोटी-सी जगह से आने वाले सामंत चौहान हों या फिर रॉ मैंगो के संजय गर्ग. पर डिजाइनरों की एक जमात ऐसी भी है जो छोटे शहरों में रहकर काम कर रही है और सोशल मीडिया तथा ई-कॉमर्स के जरिए अपने हुनर को दुनियाभर में पहुंचा रही है. मसलन, केरल के कोच्चि के 32 वर्षीय श्रीजीत जीवन कहते हैं कि वे "अनफैशनिंग'' की ओर बढ़ रहे हैं और धीमी गति से चलने वाली जिंदगी का आनंद ही उनके डिजाइन को प्रेरणा देता है. वे कहते हैं, "हम इतनी तेजी से भाग रहे हैं कि कभी-कभी तो हमारे पास बारिश की बूंदों और चिडिय़ों की चहचहाहट जैसी छोटी-छोटी चीजों के लिए भी वक्त नहीं होता.''

देश की फैशन राजधानी से दूर रहने का थोड़ा नुक्सान जरूर होता है, पर घर के एहसास की बात ही कुछ और होती है, ऐसी जगह काम करना जिसे आप जानते-समझते हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (एनआइडी) अहमदाबाद और ईएनएसएडी पेरिस से पढ़ चुके जीवन कहते हैं, "आज फैशन हर जगह है. वह सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं है. मेरी कहानियों में वैश्विक ग्राहकों के लिए स्थानीय खुशबू है.'' उन्होंने 2013 में अपना लेबल रौका शुरू किया. कुछ अन्य डिजाइनरों के साथ ओरिजिंस की शुरुआत कर उन्होंने केरल में बाढ़ प्रभावित बुनकरों को अपने पांवों पर खड़ा होने में मदद की है.

टिकाऊ फैशन और शिल्प अब इस उद्योग के नए सूत्र बनते जा रहे हैं. ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि डिजाइनर अपने अतीत के अनुभवों को टटोल रहे हैं और डिजाइन की नई शब्दावली तय कर रहे हैं. उसमें वे न सिर्फ अपनी सामाजिक चेतना को शामिल कर रहे हैं बल्कि स्थानीय कारीगरी और संदर्भों के साथ इनोवेटिव होने की जरूरत भी महसूस कर रहे हैं. मसलन, बिहार के सामाजिक उद्यमी और डिजाइनर प्रवीण चौहान ने अपने मूल स्थान के पास बोधगया में एक सामाजिक उपक्रम शुरू किया है मातृ—मदर्ली-लग्जरी-आर्टिस्ट्री. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट) में पढ़ चुके प्रवीण महाबोधि मंदिर से फूलों का कचरा इकट्ठा करते हैं और उन्हें कैथी विलियम्स के साथ मिलकर प्राकृतिक डाइ में बदल देते हैं.

कैथी ऑस्ट्रेलियाई हैं और एक सस्टेनेबल लेबल "बिकॉज ऑफ नेचर'' की संस्थापक हैं. इन दोनों ने मिलकर हैप्पी हैंड्स प्रोजेक्ट स्थापित किया है. प्रवीण कहते हैं, "कारीगरों ने ही हमारी कला और संस्कृति को जिंदा रखा है. इन कारीगरों ने मुझे रचनात्मकता के अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया है. अब दूसरे देशों के कई लोग पारंपरिक भारतीय वस्त्र और हस्तशिल्प का अध्ययन करने के लिए मुझसे संपर्क करते हैं.''

हैप्पी हैंड्स प्रोजेक्ट बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति, मातृ और बिकॉज ऑफ नेचर की संयुक्त पहल है. इसका मकसद खादी पर प्राकृतिक डाइ के इस्तेमाल के जरिए लोगों को टिकाऊ रोजगार उपलब्ध कराना और कारीगरों के कौशल को बढ़ावा देना है. जब प्रवीण ने निक्रट मंग दाखिला लिया तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया था कि वे इतना पैसा खर्च करके दर्जी का काम सीख रहे हैं. लेकिन उनके कॉन्ट्रैक्टर पिता ने हर स्थिति में उनका साथ दिया. आज प्रवीण को खादी को फिर से लोकप्रिय करने का श्रेय दिया जाता है.

48 वर्षीया विजयलक्ष्मी नचियार "कच्छी'' परिवार में पैदा हुई थीं, लिहाजा उन्हें कम उम्र में ही कशीदाकारी और कपड़े की दुनिया में उतरना पड़ा. उनके परिवार ने पीढिय़ों से कपड़ों का व्यापार किया है. उन्होंने मुंबई के एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय से टेक्सटाइल्स और क्लॉदिंग में स्नातक किया. शादी के बाद वे कोयंबतूर के बाहरी इलाके पोल्लाची में बस गईं. पोलाची एक कृषि क्षेत्र है और वहां कॉटन साडिय़ों की बुनाई की लंबी परंपरा रही है. उनके पति ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिये 2005 में इकोलॉजिकल कपास की खेती शुरू की. साल 2008 में नचियार ने एक हैंडलूम स्टूडियो स्थापित किया और 2009 में इथिकस की सह-संस्थापक बन गईं. वे बताती हैं, "इथिकस में मैं जो कुछ भी कर पा रही हूं, वह इस वजह से कि मैं छोटे शहर से हूं. किसी बड़े शहर में यह कर पाना नामुमकिन हो जाता. यहां मेरे पास अपनी प्रोडक्शन सुविधा है और स्थानीय कारीगर भी काम कर रहे हैं.''

जब उन्होंने इथिकस की शुरुआत की थी तो हैंडलूम ब्रान्ड बहुत कम थे और चुनौतियां बहुत ज्यादा. वे बताती हैं कि लोग सिल्क के लिए ऊंची कीमत देने को तैयार थे पर अच्छे कॉटन के लिए नहीं. टेक्सटाइल एक्सचेंज ने उनके उपक्रम को दुनियाभर में उन कुछ चुनिंदा ब्रान्ड में आंक रखा है जो सौ फीसदी टिकाऊ कच्चा माल इस्तेमाल करते हैं और उत्पादन में भी सस्टेनेबल तरीकों को अपनाते हैं. साल 2012 में टेक्सटाइल्स एक्सचेंज ने उन्हें "फ्यूचर शेपर'' अवार्ड और 2017 में राउंड टेबल ऑफ इंडिया ने उन्हें "प्राइड ऑफ तमिलनाडु'' अवार्ड दिया.

नौशाद अली की कहानी भी ऐसी ही है. 33 वर्षीय अली कहते हैं, "मेरे पिता कपड़ा व्यापारी थे. देश के कोने-कोने से आए कपड़ों के बंडल हमारे घर में भरे रहते थे और मैं उनकी टैगिंग करने में अपने पिता की मदद करता था. कपड़ों और फैशन से मेरी पहचान वहीं से हुई.'' उन्हें इस बात का भरोसा नहीं था कि उन्हें डिजाइनर के तौर स्वीकार कर लिया जाएगा, इसलिए जब उन्होंने पुदुच्चेरी में अपने लेबल की शुरुआत की तो खुद को पांच साल का वक्त दिया.

अली कहते हैं, "हम अलग तरह से एक सस्टेनेबल लेबल बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. दुनिया के दूसरे सबसे प्रदूषणकारी उद्योग, फैशन का हिस्सा होने के कारण मैं अपने फैसले सावधानी से लेना चाहता हूं, कच्चे माल के चयन से लेकर यह तय करने तक कि उससे क्या बनाना है. मैं धीमे फैशन में यकीन करता हूं, उन चीजों को बनाने में जो लंबे वक्त तक बनी रहें और सार्थक हों.'' अली वेल्लूर में पैदा हुए थे और माता-पिता के पुदुच्चेरी में जाकर बसने से पहले वे चेन्नै और बेंगलूरू में भी रहे.

अली ने 2014 में ऑरोविले में स्टूडियो लियाम स्थापित किया ताकि वे भारतीय कारीगरों की महारत को समझकर उसे समकालीन फैशन में ढाल सकें. फैशन की उनकी परिभाषा है—कोई जल्दबाजी नहीं, कोई सीजन नहीं, कुछ है तो सिर्फ समय और प्रतिबद्धता. अपना लेबल शुरू करने के तीन साल बाद 2017 में, उन्हें प्रतिष्ठित ग्रेजिया यंग सस्टेनेबल डिजाइनर अवार्ड मिला. 2018 में उन्हें लंदन कॉलेज ऑफ फैशन और समरसेट हाउस के सहयोग से आयोजित लंदन फैशन वीक, 2019 में पहली आइएफएस में देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया.

वहीं, 39 वर्षीया पंकजा सेठी के पिता सीआरपीएफ में चीफ मेडिकल ऑफिसर थे, लिहाजा उनका बचपन ईटानगर से लेकर चेन्नै तक, कई अलग-अलग जगहों पर बीता. वे बोटेनिकल साइंस में स्नातक हैं और निफ्ट से भी पढ़ चुकी हैं. कुछ एक्सपोर्ट हाउसेज के साथ काम करने के बाद उन्हें उनके एक पूर्व शिक्षक ने झारखंड की लोक कला और कथानकों को ड्राक्रट करने में मदद देने का आग्रह किया. यहीं से स्थानीय टेक्सटाइल्स में उनके काम की शुरुआत हुई. वे फिर से ओडिशा जाकर बस गईं ताकि आदिवासी बुनकरों के साथ काम कर सकें.

वे कहती हैं कि कपड़े तैयार करने के लिए कारीगरों के पंजीकरण का काम आसान नहीं था क्योंकि उनमें से कुछ बड़े उत्पादन के जाल में फंस चुके थे. वहीं ज्यादातर समकालीन धारणाओं पर काम नहीं करना चाहते थे क्योंकि उन्हें डर था कि वे ज्यादा चलेंगी नहीं. वे बताती हैं, "भुवनेश्वर में स्थित होने के कारण मुझे अब ऐसी जगह पर रहने के फायदे महसूस हो रहे हैं जो मेट्रो शहरों की तुलना में प्रदूषण से मुक्त है और जहां कम ट्रैफिक है. इसके अलावा मैं बुनकरों और आदिवासियों के भी करीब हूं जो स्थानीय कपड़े और शिल्प तैयार करते हैं. मुझे अब वैश्विक स्तर पर स्थानीय परंपराओं का महत्व समझ आ रहा है.''

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