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विशेषांकः कॉलेज में मैं समझ नहीं पाता था कि टीचर क्या कह रहे हैं...

मेरा मानना है कि जो कुछ भी मेरे रास्ते में आता है, मैं जो कुछ भी करता हूं, वह सब भगवान की योजना का हिस्सा है. अगर मेरे सामने चुनौती आई है तो मैं उसे पार करने के लिए ही बना हूं

विजय शेखर शर्मा विजय शेखर शर्मा

योर लिप्स मूव, बट आइ कांट हियर व्हाट यू आर सेइंग...'' मशहूर रॉक बैंड पिंक फ्लॉइड ने जब कंफर्टेब्ली नम्ब रिलीज किया, तब उन्हें शायद अंदाजा भी नहीं होगा कि उनका गीत भारत के छोटे-से कस्बों के 15 वर्षीय किशोरों के दिलों के तार छेड़ देगा. 15 साल के इन किशोरों में विजय शेखर शर्मा भी थे, जो भारत के सबसे युवा अरबपतियों में से एक हैं और जिन्होंने नकदी के साथ देश के रिश्ते को आमूलचूल बदल दिया है. शर्मा इस गीत का जिक्र दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई के बारे में बताने के लिए करते हैं, जब वे क्लास में अगली कतार में बैठते थे और शिक्षक को भौचक ताकते रहते थे, क्योंकि वे उस भाषा में पढ़ा रहे होते हैं जो हिंदी माध्यम से पढ़कर आए शर्मा के लिए नई थी.

वे अलीगढ़ के नजदीक एक कस्बे हरदुआगंज में पले-बढ़े और उनके पिता स्कूल में शिक्षक और मां गृहणी थीं. वे बताते हैं कि हिंदी माध्यम के स्कूल से आने की वजह से उन्हें दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (डीसीई, अब दिल्ली टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी) की अपनी इंजीनियरिंग की कक्षाओं में भाषा की अड़चन से जूझना पड़ता था. यह दिक्कत क्लास से बाहर भी आती. दिल्ली नए आने वाले तपे-तपाए युवाओं को भी भयभीत कर सकती है. ऐसे में उन लोगों की चुनौती की कल्पना कीजिए जो भारत के उन छोटे शहरों और कस्बों से यहां आते हैं, जहां अंग्रेजी दूसरी या तीसरी भाषा होती है. वे कहते हैं कि उन्होंने जो मुश्किलें झेलीं—बेचैनी, निर्वासित होने की भावना, दोस्तों का न होना और नौकरी हासिल करने की फिक्र—उनकी वजह से उनमें कुछ ऐसा बनाने की गहरी इच्छा पैदा हुई जो उन्हें मकसद भी दे सके और दूसरों के लिए नौकरियों का सृजन भी कर सके.

शर्मा कहते हैं, ''इंजीनियर बनने वाला अपने स्कूल का मैं दूसरा लड़का था. पहला 1964 में बना था. मैं अपने को दूसरों के मुकाबले कमतर समझता था—मुझे यहां नहीं होना चाहिए था. स्कूल में मैंने लाइब्रेरी में बहुत सारी किताबें पढ़ीं; मैंने भारत के गौरव के बारे में बहुत पढ़ा लेकिन यह भी लगा कि यह गौरव अतीत में था.'' वे पूरी विनम्रता से कहते हैं कि उनके मन में यह विचार आता कि 'यह गौरव वापस लाने' के लिए वे क्या कर सकते हैं.

शर्मा टेक्नोलॉजी से जुड़े ऐसे आंत्रप्रेन्योर हैं जो अपनी जिंदगी और काम में गहराई से दार्शनिक की तरह दिखाई देते हैं. वे कहते हैं, ''मैं मानता हूं कि जो कुछ भी मेरी राह में आता है, जो कुछ भी मैं करता हूं, वह ईश्वर की योजना है. अगर (मेरे सामने) कोई चुनौती है तो मैं उसके समाधान का माध्यम हूं. जो कुछ भी मेरी राह में आता है वह मेरे लिए अपना उद्देश्य पूरा करने का औजार या संसाधन है.'' हालांकि उनके पैर अब भी मजबूती से जमीन पर टिके हैं, लेकिन यह पूछने पर कि क्या उन्हें हमेशा यकीन था कि वे मशहूर आंत्रप्रेन्योर होंगे, वे कहते हैं, ''आज मुझे अपना यहां होना सपने की तरह लगता है.''

वे कहते हैं कि अजनबी की तरह दिल्ली में जी गई जिंदगी उनके लिए निर्णायक मोड़ था. भाषा की रुकावट इतनी बड़ी चुनौती थी कि डीसीई में दाखिला दिलाने वाली प्रतियोगिता परीक्षा में कामयाब होने वाला अपने स्कूल का अकेला छात्र होने के बावजूद, वे जल्द ही अगली कतार का होनहार छात्र होने से पीछे हटकर ऐसे शख्स बन गए जो अपना ज्यादातर वक्त लाइब्रेरी या कंप्यूटर लैब में बिताता था. वे कहते हैं, ''मुझे समझ ही नहीं आता कि टीचर क्या (कह रहे) थे. मैंने अपने संगी-साथियों के साथ कभी एक महसूस नहीं किया. मैं उनकी भाषा या बोल समझ नहीं पाता था. मैं अपनी क्लास में नाकाम लेकिन लैब में हीरो था.'' वे बताते हैं कि इसके चलते भविष्य को लेकर डर पैदा हो गए—''फिक्र होने लगी कि मुझे नौकरी मिलेगी या नहीं. कहां मैं स्कूल टॉपर हुआ करता था और कहां विषयों में फेल होने लगा, क्योंकि मैं यह भाषा समझ नहीं पा रहा था.''

इधर शर्मा के मन में चिंताएं थीं, उधर सिलिकन वैली की कहानियां—उन आंत्रप्रेन्योर की कहानियां जिन्होंने कॉलेज की डिग्री के बगैर खासा नाम और धन कमाया था—उन्हें प्रेरित करने लगीं. खुद अपना कारोबार शुरू करने के विचार मन में आने लगे. कॉलेज में पढ़ते समय ही उन्होंने 'सिलिकन वैली से प्रेरित होकर 'हॉस्टल ऐली (पगडंडी)' बनाने का फैसला' किया. शर्मा और उनके दोस्तों ने हॉस्टल से ही एक कंपनी शुरू की और उसका नाम एक्सएस कोर रखा. उनके बिजनेस कार्ड पर उनके हॉस्टल का पता और डीसीई के कंप्यूटर सेंटर का फोन नंबर था.

हालांकि आगे चलकर शर्मा को कैंपस में सबसे ज्यादा तनख्वाह की नौकरी मिली, लेकिन वे कहते हैं कि तब तक उन्हें एहसास हो चुका था कि यह उनके ज्यादा बड़े लक्ष्य तक पहुंचने की सीढ़ी भर होगी. वे कहते हैं, ''यह नौकरी स्वीकार करते हुए मेरे मन में साफ था कि मुझे बस इतना सीखना है कि कंपनी कैसे चलाई जाती है, मसलन यह समझना कि कौन-कौन-से डिपार्टमेंट होते हैं वगैरह.

मैंने तीन अलग-अलग कंपनियों में काम किया और कारोबार चलाने के तमाम पहलू सीखे.'' वे कहते हैं कि इंडिया टुडे में उनके काम ने उन्हें कारोबार के कई सारे अलग-अलग हिस्सों को एक इकाई में जोड़ना सिखाया.

उन्होंने पेटीएम की स्थापना की जो उसके बाद से बढ़ते-बढ़ते 16 अरब डॉलर (1.2 लाख करोड़ रुपए) की विशाल कंपनी बन गई है. इस डिजिटल भुगतान फर्म का मुख्यालय नोएडा में है और हुरुन यूनिकॉर्न लिस्ट 2020 में यह 13वीं पायदान पर है. भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के डेटा के मुताबिक, यह अस्वीकृत लेनदेन दर सरीखे टेक्नोलॉजी से जुड़े मानदंडों पर बड़े बैंकों को लगातार पीछे छोड़ती रही है. इन कामयाबियों के बावजूद शर्मा कहीं ज्यादा बड़े और बेहतर काम करते रहने की ऊर्जा से भरे हैं ताकि भारत को दुनिया के नक्शे पर स्थापित कर सकें.

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