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विशेषांकः मुझे गणित दे दिया गया था...

...लेकिन मैंने ‌प्रिंसिपल से कहा कि अगर वे मुझे तमिल साहित्य, जो मेरा जुनून था, नहीं पढऩे देंगे तो मैं कॉलेज छोड़ दूंगा’’

पेरुमल मुरुगन पेरुमल मुरुगन

पेरुमल मुरुगन, 55 वर्ष
 

तमिल लेखक और विद्वान मुरुगन अब तक 10 उपन्यास लिख चुके हैं और अनूदित साहित्य में अमेरिकी नेशनल बुक अवार्ड के लिए दो बार नामित किए जा चुके हैं

नंदू सुंदरम

हमारी जिंदगी में जब किसी अप्रत्याशित चीज का असर पड़ता है तो वह क्षण कभी-कभी महत्वपूर्ण मोड़ साबित होता है. हमारे समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को उतना सम्मान नहीं है जितना कि होना चाहिए. तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन कहते हैं, ''मैं शिक्षित होना चाहता था और इसी तमन्ना ने मुझे मेरी जिंदगी में इस मुकाम तक पहुंचाया है.’’ मुरुगन को कई पुरस्कार और उपलब्धियां हासिल हो चुकी हैं और वे अनूदित साहित्य में अमेरिकी नेशनल बुक अवार्ड के लिए दो बार नामित किए जा चुके हैं.

मुरुगन के शहर में उनके खानदान के 30 परिवार हैं. सभी में वे पहले शख्स थे जिन्होंने बारहवीं की पढ़ाई पूरी की. उनसे पहले की पीढ़ी में किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन वे पढऩे और लिखने में सक्षम हो पाएंगे. अगर कोई हस्ताक्षर करना जानता था तो वह भी उपलब्धि मानी जाती थी. यह तमिलनाडु के दिवंगत मुख्मंयत्री के. कामराज (1954-63) की योजनाओं की देन है कि मुरुगन की बहनें प्राथमिक स्कूलों तक पहुंच सकीं और हस्ताक्षर करना सीख लिया. उनके भाई हाइस्कूल तक पहुंच सके, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी. वे इस बात को लेकर डरे हुए थे कि वे स्कूल की दसवीं की परीक्षाओं में फेल हो जाएंगे.

मुरुगन किसानों के परिवार से ताल्लुक रखते हैं और उनके कई भाइयों ने खेती से जुड़ा काम चुना. उनमें से कुछ ट्रक चलाने के काम से जुड़ गए और 'क्लीनर’ और ड्राइवर बन गए. तमिलनाडु के नामक्कल जिले में स्थित उनके गृहनगर तिरुचेंगोडे में ट्रक चलाना लोकप्रिय पेशा है. वे याद करते हैं, ''यह बहुत बड़ी बात थी कि मैंने बारहवीं की पढ़ाई पूरी की. उस समय भी मैं कविताएं लिखता था और शिक्षक उन्हें अंतर-स्कूल प्रतियोगिताओं में भेजते थे. मेरे शिक्षकों और सहपाठियों ने मेरा उपनाम कवि रख दिया था.’’

फूस और गोबर की गंध के साथ ही उनके घर में जल्द ही किताबों की खुशबू ने भी जगह बना ली. ये किताबें सड़क किनारे के विक्रेताओं और पलानी मुरुगन मंदिर परिसर में स्थित किताबों की दुकानों से ली गई थीं. स्थानीय पुस्तकालय से भी किराये पर उन्होंने किताबें ली थीं. किताबें, खासकर कविताएं, उनकी स्थायी साथी थीं.

मुरुगन ने बारहवीं की फाइनल परीक्षा में अच्छे अंक हासिल किए. उनके सभी शिक्षक चाहते थे कि वे आगे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने जाएं. मुरुगन बताते हैं, ''केवल मेरे तमिल शिक्षक, जिन्होंने मेरी सारी कविताएं पढ़ी थीं और मुझे प्रतियोगिताओं में भेजा था, ने एक शब्द नहीं बोला. वे सोचते थे कि कविताएं लिखना पागलपन है. एक नजरिए से यह सही भी है. लेकिन उन्होंने कहा कि किसी एक ‌बिंदु पर इस पागलपन से बाहर निकलना होता है. उन्होंने भी मुझे इंजीनियरिंग की तरफ जाने को प्रेरित किया.’’

मुरुगन तमिल साहित्य पढऩा चाहते थे. उनका परिवार उन्हें कॉलेज भेजना चाहता था, लेकिन नहीं चाहता था कि वे शहर छोड़ें और अतिरिक्त खर्च का भार परिवार पर पड़े. मुरुगन कहते हैं, ''ऐसा लग रहा था मानो सैकड़ों हाथ एक साथ जुड़ गए हैं और मुझे किसी चीज में धकेलना चाहते हैं.’’

मुरुगन दुविधा में थे और उनके एक बड़े भाई, जो अभी भी इस 55 वर्षीय लेखक को 'कन्नू’ कहकर पुकारते हैं (छोटे बच्चों को प्यार से 'कन्नू’ कहा जाता है), ने उन्हें तीन कॉलेजों का आवेदन पत्र दिया. मुरुगन के लिए खुशी की बात थी कि उनमें से एक कॉलेज में तमिल साहित्य में डिग्री कोर्स उपलब्ध था. वे कहते हैं, ''मैंने सिर्फ उसी कोर्स के लिए आवेदन किया और दाखिले का कॉल लेटर मिलने के बाद उस कॉलेज में गया.’’

वहां के तमिल विभाग में प्रोफेसरों ने उन्हें ऐसे देखा मानो कोई भेड़ झुंड से बिछड़कर गलत जगह पर आ गया है. कॉलेज के प्रिंसिपल, जो खुद के गणित विद्वान थे, ने मुरुगन के अंक देखे और उन्हें गणित चुनने के लिए जोर दिया. तमिल विषय चुनना कमतर माना जाता था. उसे सिर्फ वही चुनते थे जिनके पास और कोई विकल्प नहीं होता था. मुरुगन को यकीन नहीं था कि वे इस कोर्स से भविष्य में कुछ हासिल कर पाएंगे, लेकिन मन में तमिल पढऩे की ही तमन्ना थी.

कॉलेज लगातार कोशिश कर रहा था कि मुरुगन कोई अन्य कोर्स चुनें. दाखिले के आखिरी दिन प्रिंसिपल मुरुगन से मिले और बताया कि उन्हें गणित कोर्स में स्थानांतरित कर दिया गया है. यह बताते हुए मुरुगन हंस पड़ते हैं, ''मैंने प्रिंसिपल को कहा कि अगर आप मुझे तमिल पढऩे देंगे तो मैं यहां रहूंगा, वरना मैं कॉलेज छोड़ दूंगा.’’ इससे खिन्न प्रिंसिपल ने उन्हें 'दफा हो जाने’ को कहा. थोड़ी संतुष्टि के साथ मुरुगन कहते हैं, ''पर मैं गुम नहीं हुआ, और यह सिर्फ इस वजह से कि मैंने वही पढ़ा जो मैं चाहता था. मेरी सारी खुशियों की मुख्य वजह साहित्य में मेरी यह शिक्षा है.’’


''केवल मेरे तमिल शिक्षक, जिन्होंने मेरी सारी कविताएं पढ़ी थीं, ने भी इंजीनियरिंग लेने को कहा. वे सोचते थे कि कविताएं लिखना पागलपन है. एक नजरिए से यह सही भी है’’

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