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विशेषांकः मैं हृदय रोगियों की मदद न कर पाने से हताश था...

...इसलिए मैंने विदेश जाकर ट्रेनिंग लेने का संकल्प लिया और नया कौशल लेकर वापस लौटा’’

नरेश त्रेहन नरेश त्रेहन

जिंदगी का निर्णायक पल
नरेश त्रेहन, 74 वर्ष 


देश में विश्व स्तरीय कार्डिएक केयर सुविधाओं वाला अस्पताल खोलने की आकांक्षा लिए अमेरिका में प्रशिक्षित यह सर्जन 1988 में भारत लौटा. एस्कॉर्ट्स और मेदांता जैसे विश्वस्तरीय अस्पताल समूह खड़े करने के साथ उन्होंने अब तक दिल के 50,000 कामयाब ऑपरेशन भी किए हैं


सन् 1967 में लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान डॉ. नरेश त्रेहन खुद को असहाय पाने के उन पलों को याद करते हैं जब उन्होंने कई रोगियों को हृदय रोगों का समुचित इलाज न मिलने से मरते देखा. सो, स्नातक के तुरंत बाद हृदय की सर्जरी में विशिष्टता हासिल करने को उन्होंने अमेरिका के फिलाडेल्फिया स्थित थॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी में आवेदन किया.

डॉ. त्रेहन बताते हैं, ''उन दिनों, अधिकांश भारतीयों को हृदय के उपचार के लिए विदेश जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. मैंने तय कर लिया कि जल्द से जल्द विदेश जाकर नए कौशल सीखूंगा और फिर भारत लौट आऊंगा.’’

इस फैसले ने उनका करियर बदल दिया. वे याद करते हैं, ''मैं न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी अस्पताल के तत्कालीन चेयरमैन डॉ. फ्रैंक स्पेंसर से प्रशिक्षण लेना चाहता था. उनके अधीन प्रशिक्षण लेने की चाहत रखने वालों का आलम यह था कि उसके लिए आमतौर पर पांच साल की प्रतीक्षा सूची थी. फिलाडेल्फिया में मुझे बताया गया कि डॉ. स्पेंसर विदेशी छात्रों से बातचीत नहीं करते इसलिए मैंने व्यक्तिगत रूप से अपनी महत्वाकांक्षाओं और कौशल को बताते हुए उन्हें पत्र लिखने का फैसला किया.

उन्होंने मुझे जवाबी पत्र लिखा और कहा कि यह सच नहीं कि मैं विदेशियों को अपनी टीम में शामिल करने पर विचार नहीं करता और उन्होंने मुझे साक्षात्कार के लिए आने को कहा. कुल 32 लोग थे, जिनमें से चार ही चीफ रेजिडेंट बनते और उनमें से भी केवल एक या दो ही कार्डिएक सर्जन बन सकते थे. मैंने कड़ी मेहनत की और अपनी जगह बना ही ली.’’ वे 1977 में एनवाइयू संकाय में शामिल हुए और भारत लौटने तक वहीं बने रहे.

डॉ. त्रेहन बताते हैं, ''हृदय की कामयाब सर्जरी के बाद नतीजे तो ऑपरेशन थिएटर में ही दिखने लगते हैं. जितने ज्यादा मरीजों की मैंने जान बचाई, भारत लौटने की इच्छा उतनी ही बढ़ती गई.’’ पर सही संस्थान खोजने में उन्हें सालों लग गए. वे बताते हैं, ''मैं भारत का सिस्टम जानता था. मुझे पता था कि एक ऐसे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आगे बढऩा जो कि हृदय सर्जरी जितना ही नया था, कई बाधाओं को आमंत्रित करेगा.’’ 1980 के दशक की शुरुआत में भारत जाने का विचार एकदम स्पष्ट हो गया.

वे याद करते हैं कि एस्कॉट्र्स के चेयरमैन एच.पी. नंदा एनवाइयू आए थे. उनसे उनकी मुलाकात हुई और ''हमने मिलकर कार्डिएक सर्जरी और उपचार को समर्पित एक अस्पताल खोलने का फैसला किया. मैं देश में दिल के ऑपरेशन का पूरा सिस्टम लाना चाहता था और भारत को इसमें आत्मनिर्भर बनाना चाहता था.’’ आखिर 1987 में डॉ. त्रेहन भारत लौट आए. 

डॉ. त्रेहन को देश के सर्वश्रेष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञों में से एक बनने में कई साल लगे. 1987 से 2007 तक उन्होंने एस्कॉट्र्स की परिकल्पना, उसका निर्माण और प्रबंधन सब कुछ खुद किया. वे याद करते हैं, ''किसी मरीज का ऑपरेशन करने के बाद बगल वाले बिस्तर पर ही सो जाता था क्योंकि वहां बहुत काम करने को बाकी रहता था. शुरुआत में लोग मेरा मजाक उड़ाते और कहते, ‘‘नरेश अपने दम पर क्या करेगा?’’ पर उन्होंने तय कर रखा था कि नकारात्मक बातों पर एकदम ध्यान नहीं देना है बल्कि अपने प्रदर्शन से उन्हें गलत साबित करना है.

आज डॉ. त्रेहन 50,000 से अधिक सफल ओपन हार्ट सर्जरी कर चुके हैं. चिकित्सा क्षेत्र में दशकों की सफलता और उनके मरीजों के रूप में मशहूर हस्तियों, राजनेताओं और नौकरशाहों की लंबी सूची होने के बावजूद वे काम और करियर के प्रति एक जमीनी नजरिया रखते हैं. वे कहते हैं, ''चिकित्सा प्रशिक्षण के दौरान ही मैंने सीखा कि कैसे खुद को संयत रखना है, यह गुमान नहीं पालना है कि मैं औरों से बड़ा हूं.’’

2009 में उन्होंने एक बार फिर से दायरा बढ़ाने का फैसला किया और गुडग़ांव में अपना अस्पताल मेदांता शुरू करने के बाद दिल्ली, लखनऊ, रांची और कोलकाता समेत कई अन्य शहरों तक उसका विस्तार किया. डॉ. त्रेहन बताते हैं, ‘‘अनुसंधान सबसे अहम पहलू है, भारत में एक ऐसा अस्पताल होना चाहिए जो इस मामले में विदेशों के अस्पतालों की बराबरी का हो.

हम चिकित्सा में उम्दा कर रहे थे पर अनुसंधान में पिछड़ रहे थे. दोनों को साथ लाने के विचार से मेदांता शुरू हुआ.’’ अब उनकी एक मेडिकल कॉलेज शुरू करने की योजना है जो मेदांता से जुड़ा होगा.

''चिकित्सा के क्षेत्र में तरक्की के लिहाज से हम बढिय़ा काम कर रहे थे लेकिन शोध-अनुसंधान के स्तर पर पिछड़ रहे थे. मेदांता के पीछे सोच यही थी कि इन दोनों पहलुओं को एक साथ जोड़ा जा सके’’

—सोनाली आचार्जी

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