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नवाजुद्दीन सिद्दीकीः खुद से कहा था कि योग्यता साबित करूंगा...

...उन बच्चों और रिश्तेदारों के लिए जो मेरा मजाक बनाते थे, मेरी बातों पर भरोसा नहीं करते थे’’

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अदा किशोर वय में नवाजुद्दीन फोटो स्टूडियो में फोटो खिंचवाते
अदा किशोर वय में नवाजुद्दीन फोटो स्टूडियो में फोटो खिंचवाते

नवाजुद्दीन सिद्दीकी, 46 वर्ष

अपने दबे हुए रंग और चेहरे-मोहरे के बारे में हमउम्र बच्चों और रिश्तेदारों की तानाकशी के साथ ही अपने पिता की आर्थिक मुश्किलों ने इस अभिनेता को कुछ 'खास’ करने के लिए प्रेरित किया. अब कई हिट फिल्मों के बाद, उसने अपना लक्ष्य पा लिया है

बड़े होते हुए नवाजुद्दीन सिद्दीकी को मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना कस्बे में थोड़ा अजीब समझा जाता था. जब ज्यादातर लोग रविवार को टेलीविजन पर आने वाली फिल्में देखना पसंद करते थे तो उसकी रुचि शनिवार को प्रसारित होने वाले 'कला’ सिनेमा में होती थी. पंकज कपूर और शबाना आजमी की एक डॉक्टर की मौत जैसी फिल्मों ने उस पर गहरा असर डाला था. सिद्दीकी कहते हैं, ''मुझे इस फिल्म को देखना और यह तय करना याद है कि मैं चाहे जिस क्षेत्र में रहूं, मैं कुछ नया करूंगा और जानने की ललक बनाए रखूंगा.’’

हालांकि, दबे हुए रंग की वजह से दूसरे बच्चों की तरफ से ‘‘कल्लू’’ या ‘‘कालिया’’  नाम से चिढ़ाए जाने वाले इस शख्स के मन में अभिनय जैसा कोई खयाल नहीं था. वे कहते हैं, ‘‘मुझे लगता था कि मैं बहुत अच्छा नहीं हूं... कि मुझमें कुछ कमी है.’’ रिश्तेदार भी बहुत नरमदिल नहीं थे. वे उस समय को याद करते हुए बताते हैं कि जब वह बीसेक साल के थे तो उनकी चाची ने पूछा था कि वे जिंदगी में क्या करने की सोच रहे हैं.

इसके जवाब में उन्होंने बताया था कि वे ‘‘अभिनय’’ करना चाहते हैं. ''इस पर उन्होंने मेरी मां से कहा कि हर मां को लगता है कि उसका बच्चा सबसे सुंदर है. मैं यह नहीं कह रही कि तुम्हारा बेटा बदसूरत है, लेकिन वह सुंदर भी नहीं है.’’

इन बातों से सिद्दीकी के भीतर कुछ ‘‘खास’’ करने की आग ही लगती थी. वे कहते हैं, ‘‘मैं खुद से कहता कि मैं कुछ अलग करके अपनी काबिलियत साबित करूंगा.’’ 

लेकिन किसी ऐसे रास्ते पर चलना, जिस पर घर का कोई न चला हो, कोई आसान बात नहीं थी. सिद्दीकी कहते हैं, ''पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांस्कृतिक गतिविधियां न के बराबर हैं.’’ एक जमींदार के बेटे और आठ भाई-बहनों में सबसे बड़े, सिद्दीकी को पता था कि पिता के नक्शेकदम पर चलना कोई विकल्प नहीं था.

सिद्दीकी याद करते हैं, ''जब वे काम से लौटकर नहाने जाते थे, तो मैं चुपके से उनके कुर्ते से एक-दो रुपए चुरा लेता था. लगभग दो साल बाद मुझे एहसास हुआ कि वे जो पैसे लाते थे वे घट रहे हैं. एक दिन उसकी जेब में सिर्फ दो नोट थे. इस बात ने मुझे हिला दिया.’’ इस घटना से नवाज को पता चल गया कि जमींदार होने के बावजूद परिवार आर्थिक रूप से मुश्किल में था.

उन्होंने अंतत: बुढ़ाना छोड़ा और हरिद्वार जाकर स्नातक की पढ़ाई पूरी की, फिर नौकरी की तलाश में दिल्ली चले आए. रंगमंच उनका तारणहार था. वे कहते हैं, ''मुझे लगता था कि शायद मैं इस माध्यम से खुद को व्यक्त कर पाता हूं.’’ आगे बताते हैं, ''मैं इस पर फिदा था, लेकिन दर्शकों के सामने बोलने की चुनौती से मैं डरता भी था.’’ उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में आवेदन किया और परीक्षा में चुन लिए गए.

इसके कुछ साल बाद, सिद्दीकी को फिर से नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ी—इस बार मुंबई में फिल्मों के लिए. शुरुआत में उन्हें कुछ पलक झपकने भर की लंबाई वाली भूमिकाएं मिलीं, जैसे—शूल (1999) में वेटर के रूप में और मुन्ना भाई एमबीबीएस (2003) में पॉकेटमार. आखिरकार उन्हें पहचाना गया अनुराग कश्यप निर्देशित फिल्म ब्लैक फ्राइडे और आमिर खान की बनाई पीपली [लाइव] से. कश्यप ने इस अभिनेता को गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट -2 में पहली बार प्रमुख भूमिका दी.

उस दौर के दो दशक बाद अब प्रशंसित स्वतंत्र नाटकों (कहानी, द लंचबॉक्स) और व्यावसायिक रूप से सफल रही फिल्मों (बजरंगी भाईजान, किक) के साथ आगे बढ़ते हुए सिद्दीकी एनएसडी से आए अपने पूर्ववर्तियों—कपूर, नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी की ही तरह बॉलीवुड में नायक की धारणा को विस्तार दे रहे हैं. वे कहते हैं, ''कहानी जो भी हो, मैं तो विभिन्न मनोदशाओं को खंगालना चाहता हूं...किसी व्यक्ति और उसके विचारों को जानना चुनौतीपूर्ण तो है, लेकिन बहुत संतुष्टिदायक भी है.’’ और, अपने पात्रों के दिमाग को पढऩे की सिद्दीकी की यह यात्रा जारी है.

 

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