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''मां के दायित्व के चलते नौकरी छोड़ ही चुकी थी...

...पर मेरे मेंटर ने मुझे लखनऊ में रुके और डटे रहने के लिए मना लिया"

प्रेरक मुंबई में अपने एसबीआइ के दिनों में अरुंधति भट्टाचार्य प्रेरक मुंबई में अपने एसबीआइ के दिनों में अरुंधति भट्टाचार्य

जिंदगी का निर्णायक पल

अरुंधति भट्टाचार्य, 64 वर्ष
प्रोबेशनरी अफसर से भारतीय स्टेट बैंक की पहली महिला चेयरपर्सन बनने तक, इस सरकारी बैंक को संकट के सबसे बुरे समय में उन्होंने नेतृत्व प्रदान किया

भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) की पहली महिला चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य को इस बैंक को अपने बदतर दौर से बाहर निकालने का गौरव हासिल है. डूबते कर्जों का बढ़ता अंबार, नीचे गिरते मुनाफे और बड़े धन्नासेठों की धोखाधडिय़ों ने लोगों का भरोसा खत्म होने का अपूर्व खतरा पैदा कर दिया था. 

ऐसे वक्त में जब बैंकरों को शक की नजर से देखा जाता था, भट्टाचार्य ने लोगों में भरोसा जगाया. हालांकि, उनका बैंकिंग करियर बहुत कुछ हालात की वजह से शुरू हुआ था. 1976 में एसबीआइ की प्रोबेशनरी ऑफिसर की अखिल भारतीय परीक्षा में कामयाबी हासिल करने वाली भट्टाचार्य कहती हैं, ''मेरे पिता भारतीय इस्पात प्राधिकरण से रिटायर हुए थे और उन्हें पेंशन भी नहीं मिलती थी, इसलिए मैं तेजी से आत्मनिर्भर बनना चाहती थी.’’

भट्टाचार्य ने 1977 में एसबीआइ में काम करना शुरू किया और धीरे-धीरे तरक्की की सीढिय़ां चढ़ती गईं. मगर 2006 में उन्होंने पाया कि वे एक दोराहे पर खड़ी थीं. मां तो वे बन ही चुकी थीं और उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी संभालने के लिए लखनऊ में तैनात कर दिया गया. तब किसी बड़े शहर में अपनी बेटी की बेहतर स्कूलिंग के लिए वे नौकरी छोडऩे तक की बात सोच चुकी थीं. वे कहती हैं, ''मेरे मेंटर ने सलाह दी कि मैं सारी संभावनाएं खत्म होने से पहले छोडऩे के बारे में न सोचूं. छोडऩा आसान है—और आसान विकल्प नहीं अपनाना चाहिए.’’

भट्टाचार्य याद करती हैं कि चुनौती की एक और स्थिति 2005 में आई जब उन्हें नई परियोजनाओं का महाप्रबंधक नियुक्त कर दिया गया. इस ओहदे पर तैनाती का मकसद जाहिरा तौर पर उन्हें नाकाम करना था. वे मानती हैं, ''किसी ने सोचा नहीं था कि मैं प्रोजेक्ट में कामयाब हो सकूंगी मगर यह काफी खुशियां देने वाला निकला. इसने मुझे सिखाया भी और संतोष भी दिया. झटकों को उलटने के तरीके हमेशा होते ही हैं.’’

भिलाई में अपने होश संभालने के वर्षों में भट्टाचार्य की मां और उनकी एक रिश्तेदार सबसे बड़ी प्रेरणा हुआ करती थीं. इलाज और देखभाल न मिलने की वजह से पड़ोस में एक मौत हो जाने के बाद उनकी मां ने होम्योपैथ बनने की पढ़ाई करते हुए कई रातें बिताईं ताकि समुदाय की मदद कर सकें. वे बताती हैं, ''वे क्लिनिक चलाती थीं और (2009 में) दुनिया छोडऩे से तीन महीने पहले तक दवाइयों के नुस्खे लिखती रहीं. मैंने उनसे सीखा कि जब कोई स्थिति आन पड़े तो कुछ करो! हाथ पर हाथ धरकर बैठने का कोई मतलब नहीं.’’

सरकारी बैंक में चार दशकों से ज्यादा वक्त बिताने के बाद, 2020 की शुरुआत में भट्टाचार्य सॉफ्टवेयर फर्म सेल्सफोर्स के साथ जुड़ गईं और स्टार्ट-अप से प्रेरित संस्कृति में युवा टीम के साथ नए काम करना सीख रही हैं. वे हंसते हुए कहती हैं, ''आइटी सेक्टर बिल्कुल अलग है. मुझे कई सीखी हुई चीजें भूलनी और नई चीजें सीखनी पड़ीं. कई बार बेवकूफ दिखाई देने का जोखिम उठाकर भी मैं ढेरों सवाल पूछती हूं.’’

भट्टाचार्य ने अपने भीतर के सरकारी बैंकर को पक्के तौर पर पीछे छोड़ दिया है और नई ऊर्जा के साथ आइटी की दुनिया को गले लगा रही हैं. यहां तक कि उन्होंने जरूरी शब्दावली भी सीख ली है. ''जीएफजी.’’ पूछने पर कि इसका क्या मतलब है, वे मुस्कराते हुए कहती हैं, ''गो फॉर ग्रोथ.’’ 

''मैंने अपनी मां से सीखा कि जब कोई स्थिति आन पड़े तो कुछ करो. हाथ पर हाथ धरकर बैठने का कोई मतलब नहीं’’

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