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अजय कुमार सिंह: बदल दी बुजुर्गों की तकदीर

उन्होंने झारखंड में बुजुर्गों की जिंदगी बदल दी है, अब उन्हें घर बैठे ही पेंशन मिल जाती है. उनके इन प्रयासों को 2013 में यूनाइटेड नेशन पब्लिस सर्विस अवार्ड से नवाजा गया है.

जब 1995 बैच के आइएएस अधिकारी अजय कुमार सिंह अप्रैल 2007 में देश की कोयला राजधानी कहे जाने वाले धनबाद के डिप्टी कमिश्नर बनकर आए, तो उनके सामने चुनौतियों का अंबार था. झरिया कोल फील्ड विशाल गड्ढे जैसा दिखता था. बारूद से भरे पीपे की तरह जो धधकती आग पर रखा हो. सामान्य हालात में गांववाले वर्षों पहले ही जान बचाने के लिए अपना सबकुछ छोड़कर कहीं चले गए होते, लेकिन जिंदगी चलाने के लिए वहां रहने को मजबूर थे. वहां 53,000 परिवारों में से अधिकांश के लिए कोयला जमा करना और उसे बाजार में बेचना ही जीविका का एकमात्र जरिया था. सरकार ने कई बार उन्हें वहां से कहीं और बसाने की कोशिश की लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया.

किसी अन्य अधिकारी के लिए उन्हें कहीं और बसाने के काम में सारा समय निकल जाता. अजय सिंह के लिए भी यह आसान नहीं था. उन्होंने उन लोगों के लिए कुछ अन्य समस्याओं पर भी ध्यान दिया. उन्होंने वृद्ध पेंशनभोगियों की समस्याओं को गौर से सुना. आम तौर पर बहुत से अधिकारी उनकी उपेक्षा करते रहे हैं. कंप्यूटर साइंस में बी.टेक की डिग्री रखने वाले अजय के सामने पेंशनभोगियों की शिकायतों का अंबार लगता जा रहा था. वे जब भी इन गांवों का दौरा करते तो लोग पेंशन संबंधी शिकायतें लेकर उनके पास आते और अपनी परेशानियां बताते थे. अजय कहते हैं, “पेंशनभोगी वृद्ध लोग हमारे समाज में शायद सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं. ज्यादातर मामलों में उनके बच्चे कहीं बाहर रह रहे होते हैं और वे अपने बूढ़े माता-पिता पर ध्यान नहीं देते हैं. इसलिए पेंशनभोगियों को खुद ही अपना ख्याल रखना पड़ता है.”

अजय ने पेंशन व्यवस्था का जब गहराई से अध्ययन किया, तो वे हैरान रह गए. उन्होंने पाया कि पेंशन की डिलीवरी में बिल्कुल भी पारदर्शिता नहीं थी, जबकि जिले में 376 कर्मचारी इस विभाग से जुड़े थे. पेंशन की रकम पेंशनभोगी तक पहुंचने से पहले 11 स्तरों और 32 प्रक्रियाओं से गुजरती थी. इस पूरी कसरत में 51 दिन लग जाते थे. साथ ही पेंशन डिलीवरी सिस्टम में पारदर्शिता न होने से भ्रष्टाचार भी काफी था. इस पर निगरानी रखना लगभग असंभव था, क्योंकि सारे रिकॉर्ड हाथ से लिखे जाते थे. पूरी प्रक्रिया में बहुत देर लगती थी. सबसे बड़ी समस्या नए पेंशनभोगी को पेंशन मंजूर होने में होती थी क्योंकि उनके बारे में किसी तरह की कोई सूचना ही मौजूद नहीं होती थी.

अजय ने इस समस्या से निबटने के लिए नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआइसी) और सॉफ्टवेयर विशेषज्ञों का सहयोग लिया ताकि कोई नया सिस्टम बनाया जा सके. यह बहुत मुश्किल काम था क्योंकि सरकार के डिलीवरी सिस्टम में किसी तरह का बदलाव करने के लिए विभिन्न स्तरों पर मंजूरी लेने की जरूरत थी. लेकिन अजय ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने एक नया सिस्टम तैयार करने में कामयाबी हासिल कर ली. उन्होंने इस नए सिस्टम को “स्वावलंबन” नाम दिया. इलेक्ट्रॉनिक रूप से चलने वाले इस सिस्टम में पेंशन की रकम राज्य के मुख्यालय से सीधे स्थानीय कोष में आ जाती, जहां से वह निर्धारित बैंकों में पहुंच जाती. उसके बाद बैंक पेंशनभोगी के खाते में पैसे डाल देते. इस तरह राज्य के मुख्यालय से पेंशनभोगी तक पैसा पहुंचने में मात्र सात दिन ही लगते.

नए सिस्टम में पेंशन की प्रक्रिया के 11 स्तरों की जगह महज छह स्तर ही रह गए थे. इसमें पेपर का कहीं भी इस्तेमाल नहीं होता है. नया सिस्टम तैयार हो जाने के बाद अजय ने नए और पुराने दोनों सिस्टम्स का तुलनात्मक अध्ययन करके इसे सरकार की मंजूरी के लिए भेज दिया. जैसी उम्मीद थी, सरकार ने इसे मंजूर कर लिया. अब इसे पूरे झारखंड में लागू कर दिया गया है.

अजय की कोशिशों से झारखंड में पेंशनभोगियों को भारी राहत मिल गई है. अब उन्हें घर बैठे ही अपनी पेंशन आसानी से मिल रही है. अजय मानते हैं कि उन्हें अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि की वजह से नई योजनाएं बनाने में मदद मिलती है. आइआइटी-दिल्ली से इंजीनियर अजय ने फिजिक्स और मैथामेटिक्स में यूपीएससी की परीक्षा पास की थी. झारखंड को अजय सिंह के कार्यक्रम “स्वावलंबन” की वजह से 2013 का प्रतिष्ठित यूनाइटेड नेशन पब्लिक सर्विस पुरस्कार मिला. राज्य सरकार ने भी इस पुरस्कार के असली हकदार अजय को इसे लेने के लिए भेजा.

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