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दानों से बुना तराना

अपने लोगों का पेट भरने को संघर्षरत एक कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का आत्मनिर्भर बनना और फिर ज्यादा पैदा करने की स्थिति तक पहुंचना. इसमें कई बार पीछे हटने और कई अहम पड़ाव पार करने की कहानी छिपी है.

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हाथों से मड़ाई : साठ के दशक में खलिहान में काम करते किसान हाथों से मड़ाई : साठ के दशक में खलिहान में काम करते किसान

आजादी @75 अर्थव्यवस्था : खेती

हाल के वर्षों में कृषि मामलों पर निगाह रखने वाले कई वैश्विक संगठनों ने भारत को केला, आम, अमरूद, पपीता, नींबू जैसे ताजा फलों के साथ-साथ भिंडी और बैगन जैसी सब्जियों तथा चने जैसी दालों के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया है.

इन संगठनों ने मिर्च और अदरक जैसे अहम मसालों के साथ-साथ जूट, कपास जैसी रेशेदार फसलों और सरसों तथा अरंडी जैसे तिलहनों के अलावा बाजरे की पैदावार में भारत की तरक्की को रेखांकित किया है.

अब भारत गेहूं और चावल के साथ ही पशुधन और कुक्कुट के भी सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है. देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 17-19 प्रतिशत है, हालांकि हम अभी भी मात्र लगभग 50 अरब डॉलर मूल्य की उपज का निर्यात करते हैं.

साठ के दशक के मध्य में लगातार सूखे और भारत-पाक युद्ध के असर से हिले देश ने तब हरित क्रांति की ओर कदम बढ़ाया ताकि अधिक वैज्ञानिक तरीकों, ज्यादा उपज वाले बीजों और खादों का उपयोग करते हुए देश की आबादी का पेट भरने के लिए गेहूं और चावल ज्यादा पैदा किया जा सके.

नब्बे का दशक आते-आते भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए खोल दी और एक नव-मध्यम वर्ग के उदय के साथ ही ऊंची कीमत वाली फसलों की मांग बढ़ी. यह नया वर्ग अधिक उपभोग करने के साथ ज्यादा प्रोसेस्ड फूड की भी तलाश कर रहा था.

सो, उस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी निवेश हुआ. निजी उद्यमियों और किसानों के बीच विश्वास की कमी के कारण किसान अपनी उपज मंडियों में बेचने को मजबूर हैं. कॉर्पोरेट्स के किसानों पर हावी होने के अंदेशों ने कृषि में सुधारों को रोक दिया है.

नरेंद्र मोदी सरकार ने नए कृषि कानूनों के साथ प्रतिबंधों को कम करने की कोशिश की लेकिन इसे बड़े पैमाने पर विरोध का सामना करना पड़ा और इसे वापस लेना पड़ा. सरकार अब सहकारी समितियों और किसान-उत्पादक संगठनों का एक बेहतर जाल बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिसमें प्राकृतिक खेती और किसानों की मदद के लिए सूक्ष्म वित्तपोषण योजनाएं शामिल हैं.

मील के पत्थर
1947 भारत में 'अधिक अन्न उपजाओ’ अभियान के जारी रहने के बावजूद देश बंगाल के अकाल, द्वितीय विश्व युद्ध की मार और ओडिशा में आए एक बड़े तूफान की चोट भी झेल रहा था. देश के यही कोई 82 प्रतिशत पुरुषों के खेतीबाड़ी में ही लगे होने के बावजूद देश में केवल 50 मीट्रिक टन अनाज पैदा हो रहा था

1950 का दशक एकीकृत पैदावार कार्यक्रम के माध्यम से भोजन वाली और नकदी फसलों की सप्लाइ पर ध्यान देना शुरू किया गया

1968 भारत-पाकिस्तान युद्ध के साथ ही 1965-66 में पड़े भीषण सूखे ने भारत को अपने पहले बड़े कृषि सुधार कार्यक्रम की ओर कदम बढ़ाने के लिए बाध्य किया. हरित क्रांति से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अनाज की पैदावार में खासी बढ़ोतरी हुई

1991 उदारीकरण के बाद नव-मध्यम वर्ग के बीच खपत में वृद्धि हुई. फलों, डेयरी, मछली, मांस और सब्जि यों की मांग बढऩे से 'ऊंचे फसल मूल्य’ वाली खेती की ओर ध्यान केंद्रित हुआ

1986 पीत क्रांति के माध्यम से मूंगफली, सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल जैसी तिलहनी फसलों की पैदावार को बढ़ावा दिया गया. 10 वर्षों में भारत में तिलहन की पैदावर 12 मीट्रिक टन से दोगुनी होकर 24 मीट्रिक टन तक पहुंच गई

1985 भारत में नीली क्रांति की शुरुआत करते हुए मत्स्य उद्योग को बाकायदा एक परिभाषित संरचना में लाया गया. मत्स्य पालन और जलीय कृषि का आज भारत के सकल घरेलू उत्पाद और कृषि सकल घरेलू उत्पाद में क्रमश: 1 और 5 प्रतिशत का योगदान है

1970 ऑपरेशन फ्लड के माध्यम से भारत में दूध की पैदावार को तेज किया गया. अमूल ब्रांड के तहत चल रहे अभियान को बड़े पैमाने पर ले जाने के लिए गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड का गठन किया गया

2000  किसानों को लाभ पहुंचाने को आइटीसी ने अपनी तरह की पहली कॉर्पोरेट डिजिटल पहल ई-चौपाल शुरू की

2002  भारत ने जीन संवर्धित (जीएम) फसल बीटी कपास उगाने की अनुमति दी

2003 बाजारों के आधुनिकीकरण का रास्ता बनाते हुए मॉडल एपीएमसी कानून पारित. किसान और स्थानीय अधिकारी बाजार खोल सकते हैं; खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात को बढ़ावा मिला

2009 पर्यावरण मंत्रालय ने जीएम खाद्य पदार्थों की व्यावसायिक खेती रोकी

2022 प्राकृतिक और जैविक खेती पर ध्यान केंद्रित करते हुए सहकारी समितियों, किसान-उत्पादक संगठनों और विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्थाओं को प्रोत्साहन

2021 सरकार पीछे हटी, नए कृषि कानून वापस लिए गए

2020 तीन कृषि कानून पास कर कृषि उपज बाजार खोलने की अनुमति. इसमें किसानों-व्यापारियों के बीच उपज का स्टॉक रखने और बेचने संबंधी लचीली व्यवस्था थी. किसान संघों का विद्रोह; उन्हें अंदेशा था कि बड़े उद्योग छोटे किसानों को निगल जाएंगे

2019 महामारी की चपेट में आने से ठीक पहले कृषि क्षेत्र ने कुल भारतीय श्रमिकों के 50 फीसद से ज्यादा को रोजगार देते हुए देश के सकल घरेलू उत्पाद में 17 फीसद का योगदान दिया. दो साल बाद यह 19.9 फीसद हो गया

2012 मल्टीब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश खुला; चौतरफा विरोध के बाद इस पर रोक लगा दी गई.

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