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भविष्य की कल्पनाः हकीकत स्वीकार करें तभी बदलेंगे हालात

2000 के पहले दशक में वैश्वीकरण ने भारत का भाग्य तय किया, लेकिन अब वक्त है कि आर्थिक वृद्धि के नए स्रोत ढूंढे जाएं

इलस्ट्रेशनः राज वर्मा इलस्ट्रेशनः राज वर्मा

जहांगीर अज़ीज़

लगभग दो साल पहले, इसी पत्रिका के नए साल पर केंद्रित अंक में हमने लिखा था कि देश के तत्कालीन आर्थिक संकट के बारे में प्रचलित अफसाने में समस्या यह है कि उसका वास्तविकता से कोई लेनादेना नहीं है, इसलिए ऐसी राय पर आधारित नीतियों का सफल होना संभव नहीं है. 2017 के अंतिम महीनों में जब विश्व अर्थव्यवस्था 2010 से लेकर तब तक की सबसे तेज वृद्धि दर दर्ज कर रही थी, तब भारत पिछड़ रहा था. उस समय विश्लेषकों, बाजार और सरकार के बीच अघोषित सहमति जैसी थी कि वृद्धि दर में गिरावट की वजह गलत समय पर किए गए फैसले थे. नोटबंदी, जीएसटी पर अमल और बैंकों में डूबत कर्जों के दुर्भाग्यपूर्ण और असमय मेलजोल ने अस्थायी रूप से घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं को तहस-नहस कर दिया लेकिन समय के साथ ये विपरीत स्थितियां दूर हो जाएंगी और देश वृद्धि की राह पर लौट जाएगा.

हालांकि उस अफसाने में इस बात पर कतई गौर नहीं किया गया कि नीतिगत बदलावों और डूबत कर्जों से निस्संदेह सब कुछ उथल-पुथल हो गया था और उसका पूरा असर तो अब जाकर दिख रहा है, लेकिन इनसे गिरावट नहीं हो सकती थी. नोटबंदी से एक तिमाही पहले और जीएसटी लागू होने के एक साल पहले से ही देश की वृद्धि दर नीचे खिसक रही थी. हालांकि डूबत कर्ज 2016 में सुर्खियों में छाए, लेकिन अनुपात से बहुत ज्यादा कर्ज देने के कारण बैंकों की कर्ज देने की ताकत 2014 से ही घटने लगी थी. इससे भी ज्यादा समझ में न आने वाला तर्क यह था कि कॉर्पोरेट क्षेत्र के गिरते निवेश से अर्थव्यवस्था को झटके लग रहे थे.

सच है कि कॉर्पोरेट निवेश अब वैश्विक वित्तीय संकट के पहले के दौर वाले सकल घरेलू उत्पाद के 17 प्रतिशत स्तर पर नहीं हो रहा है, लेकिन यह सकल घरेलू उत्पाद के 11-12 प्रतिशत की अच्छी दर पर बरकरार है. हालांकि, यह गिरावट 2010 से ही शुरू हो चुकी थी और तब से कॉर्पोरेट निवेश मौजूदा स्तरों पर स्थिर है. इसकी बजाए, बीते कुछ वर्षों में निजी आवास और लघु तथा मध्यम इकाइयों में निवेश में लगातार गिरावट आई है. पिछले सात वर्षों में इन क्षेत्रों में निवेश जीडीपी के 15 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत से नीचे आ गया. यह इस बात का खुला संकेत है कि कुल निवेश में कमी का कारण कार्पोरेट मुनाफे में कमी के कारण कॉर्पोरेट निवेश का कमजोर पडऩा नहीं है, बल्कि यह आय और मांग में गिरावट के कारण है.

उसके बाद क्या हुआ? हालात और खराब हुए हैं. आसान मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों से पर्याप्त मदद के बावजूद विकास दर पिछले छह वर्षों में सबसे निचले स्तर पर आ गई है, जबकि रिजर्व बैंक तथा सरकार की ओर से पूंजी तथा नकदी समर्थन तथा दिवालिया मामलों के लिए देश की पहली अदालत की स्थापना के बावजूद बैंकों में डूबत कर्जों की समस्या गैर-बैंकिंग क्षेत्र तक पहुंच गई है. ज्यादा बड़ी समस्या यह है कि दो साल पहले तो इन्फ्रास्ट्रक्चर और बिजली कंपनियों की बैलेंस शीट बुरी तरह से गड़बड़ाई हुई थी जो उन्हें कर्ज देने वाले बैंकों की बिगड़ती वित्तीय स्थिति में भी दिख रही थी, लेकिन अब यह समस्या गैर-बैंकिंग वित्तीय और आवास कंपनियों में भी फैल गई है. आम मध्यवर्गीय परिवार की बैलेंस शीट अभी भी ठीक दिख रही है, लेकिन व्यक्तिगत कर्ज 2015 में जीडीपी के 19 प्रतिशत से बढ़कर फिलहाल 27 प्रतिशत से अधिक हो गया है. इससे बैंकों और गैर-बैंकिंग संस्थाओं दोनों में डूबत कर्जों में इजाफे की आशंका है क्योंकि वृद्धि दर और आमदनी दोनों टूट रही है.

तो, गलती कहां हुई? गलती समस्या की पहचान में हुई है. प्रचलित गलत धारणा के विपरीत, भारत लंबे समय से वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रति खुला रहा है, और है. विश्लेषकों और नीति निर्माताओं के बीच अघोषित सहमति रही है कि 2003 से 2008 के बीच हुई बहु-प्रचारित तेज वृद्धि कॉर्पोरेट निवेशों में नाटकीय वृद्धि से संचालित थी. 1990 के अंत में कॉर्पोरेट ढांचे के पुनर्गठन के बाद 1991-92 के उदारीकरण ने 2008 तक जीडीपी के 5-6 प्रतिशत तक रहने वाले कॉर्पोरेट निवेशों को 2000 वाले दशक के आरंभिक वर्षों से 2008 तक जीडीपी के 17 प्रतिशत तक पहुंचा दिया था. निवेश में वृद्धि से बहुत-सी उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन हुआ. भारत में शॉपिंग मॉलों की बाढ़ आ जाने के बावजूद, आम धारणा के उलट इन उत्पादों का उपयोग भारतीयों ने नहीं, विदेशियों ने किया.

इस अवधि में निर्यात में प्रति वर्ष 18 प्रतिशत की आश्चर्यजनक वृद्धि हुई. दूसरी ओर, निजी खपत, अर्थव्यवस्था की विकास दर से नीचे रहते हुए मात्र छह प्रतिशत की दर से बढ़ी जिसके कारण जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी 63 प्रतिशत से गिरकर 56 प्रतिशत रह गई. इस बात को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखें तो पिछले कुछ वर्षों में गिरावट के बाद भी, भारत के जीडीपी में निर्यात का हिस्सा 20 प्रतिशत है जो इंडोनेशिया के बराबर और ब्राजील से दुगुना है. वास्तव में, निर्यात में वृद्धि और गिरावट भारत के घरेलू निवेशों के उतार-चढ़ावों को दर्शाती है.

अन्य उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं की तरह, वैश्वीकरण के बदलावों ने 2000 के पहले दशक की शुरुआत से काफी हद तक भारत के भाग्य का भी निर्धारण किया है. 2001 में डब्ल्यूटीओ में चीन के प्रवेश और 2000 के पहले दशक में आपूर्ति शृंखलाओं के तेज विस्तार के बाद वैश्विक व्यापार का विस्तार तेज गति से हुआ. लेकिन 2010 के बाद से, वैश्विक व्यापार में कमी आई है और इसके वैश्विक वित्तीय संकट से पहले वाली दरों पर लौटने की संभावना नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले एक दशक में किसी भी वस्तु में नई प्रौद्योगिकी के न आने से आपूर्ति शृंखलाओं का विस्तार रुक गया है और भूमंडलीकरण के खिलाफ बढ़ती राजनैतिक प्रतिक्रियाओं के कारण विकसित बाजारों में व्यापार बाधाएं बढ़ी हैं.

नतीजतन, भारत को भी अन्य उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं की तरह, वास्तविकता का सामना करना होगा कि वह अब विकास के लिए केवल वैश्विक व्यापार पर निर्भर नहीं रह सकता. इसकी बजाए उसे विकास के नए स्रोत खोजने की जरूरत है और यह प्रक्रिया वास्तविकता को पहचानने और स्वीकार करने के साथ शुरू हो सकती है.

नीति निर्माताओं को यह पूछने-परखने की जरूरत है कि क्या कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती तब भी काम करेगी जब वैश्विक मांग गिर रही हो. शायद, नीतिगत कटौती करने का फायदा घरेलू उपभोग को प्रोत्साहित करने के लिए जीएसटी दरों में कटौती करने पर मिलता. उन्हें इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि क्या बैंकों और गैर-बैंकिंग संस्थानों के डूबत कर्जों का मसला निपटाने के लिए दिवालिया मामलों की अदालतों का इंतजार करना अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक बोझ डाल रहा है. इसकी बजाए, यह बात चाहे जितनी असंगत लगे, रिजर्व बैंक को इन डूबत कर्जों का अधिग्रहण कर लेना चाहिए. रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट में गुंजाइश है कि वह यह कदम उठा सके. रिजर्व बैंक को डूबत कर्जों की वसूली में अदालतों की मदद मिल सकती है.

अब घरेलू मांग को भारत के विकास में बड़ी भूमिका निभाने देने का समय है. इसका मतलब यह है कि भारतीय कंपनियों को विदेशियों की जरूरत का उत्पादन करने की बजाए उन वस्तुओं का उत्पादन करना चाहिए जिन्हें देश के लोग खरीद सकें. इसका यह भी मतलब है कि नीति निर्माताओं को ऐसी नीतियों को उलटना पड़ेगा जिनके कारण भारतीय परिवारों पर सेवानिवृत्ति, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास के लिए बचत करने को मजबूर होना पड़ता रहा है. इसका यह भी मतलब है कि देश के भीतर ज्यादा और बाहर कम देखने की जरूरत है, ताकि स्वास्थ्य और शिक्षा की बेहतर व्यवस्था, बीमा नियमों में सुधार और सेवानिवृत्ति बचतों पर दमनकारी वित्तीय व्यवस्था समाप्त हो.

संभावना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2020 में मामूली सुधार होगा और जी-3 देशों के केंद्रीय बैंकों की आसान नीतियां वित्तीय बाजारों को ठीक रखेंगी. इन स्थितियों में भारत के पास प्रतिकूल बाहरी झटकों की चिंता किए बिना सुधारों के लिए जरूरी मौका है. आशा की जाए कि इस मौके का बुद्धिमानी से उपयोग किया जाएगा.

जहांगीर अज़ीज़ जे.पी. मॉर्गन चेज बैंक में चीफ एमर्जिंग मार्केट्स इकोनॉमिस्ट हैं. ये विचार व्यक्तिगत हैं

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