scorecardresearch
 

आवरण कथाः ...हालात का रुख मोड़ दिया

कोई वाकया या कोई हादसा, किसी मोड़ पर मिली नाकामी या वंचना...हमारी जिंदगी के ढर्रे को इनमें से कोई भी गढ़ या फिर बदल सकता है. इस विशेषांक में हमने 45 ऐसी शख्सियतों से यह जानने की कोशिश की कि उनके जीवन के सफर का सबसे निर्णायक मोड़ आखिर कौन-सा था और उन्होंने सफलता के लिए क्या तरीके अपनाए

जिंदगी का निर्णायक पल जिंदगी का निर्णायक पल

यह विचित्र किंतु सत्य है कि जिंदगी के सबसे अहम निर्णायक मोड़ अक्सर उस वक्त और उन तरीकों से आते हैं जिनकी हमें जरा उम्मीद नहीं होती—यह कई बेस्टसेलिंग और सेल्प-हेल्प किताबों के लेखक नेपोलियन हिल ने कहा है. जिंदगी की ऐसी घटनाओं की विलक्षण बात यह है कि चाहे कितने भी साल बीत चुके हों, आप उन्हें उतने ही साफ और सजीव ढंग से याद करते हैं जितना उनके घटित होने के दिन. यह ऐसा है मानो आपके मन ने उस घटना को धीमी गति से दर्ज कर लिया है ताकि बाद में जब भी आप चाहें उसे नए सिरे से जी सकें.

मेरी जिंदगी को बदलने वाला क्षण तब आया जब मैं बंगलोर यूनिवर्सिटी से आर्ट्स में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स की तलाश कर रहा था. दशकों बाद सेंट्रल कॉलेज की पत्थर की दीवारों के पीछे उस जालीदार काउंटर का मैं अब भी जस का तस वर्णन कर सकता हूं जहां से मैंने कोर्स में दाखिले का फॉर्म खरीदा था. मैं राजनीति विज्ञान में मास्टर्स करने को उत्सुक था, लेकिन विकल्प के तौर पर मैंने इतिहास, अर्थशास्त्र और अंग्रेजी कोर्स के लिए भी फॉर्म भर दिए. पता नहीं क्यों, मैंने एक अतिरिक्त फॉर्म भी खरीद लिया था. गलियारे से गुजरते हुए संयोग से मेरी नजर उस बोर्ड पर पड़ी जहां मॉस कम्युनिकेशन या जनसंचार के पोस्ट-ग्रेजुएट डिग्री कोर्स में दाखिले के लिए आवेदन करने का नोटिस चस्पा था. मेरी कभी पत्रकार बनने की आकांक्षा नहीं थी, हालांकि मुझे इतना जरूर याद है कि मैंने इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया जैसी स्थापित पत्रिकाओं में अपनी कुछ कविताएं और कहानियां भेजी थीं और संपादक की खेद व्यक्त करती अस्वीकृति की चिट्टियां पाकर खासा मायूस हुआ था. अलबत्ता अतिरिक्त फॉर्म को बेकार जाने देने के बजाय मैंने जनसंचार के कोर्स के लिए आवेदन कर दिया.

पता यह चला कि राजनीति विज्ञान के कोर्स में दाखिले की पहली सूची से तो मेरा नाम नदारद था, लेकिन मुझे एक चिट्ठी जरूर मिली जिसमें पत्रकारिता के कोर्स के इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. मैंने पूरा इंटरव्यू बड़े आराम से दिया, सवालों के जवाब भी कुछ अक्खड़पन से दिए क्योंकि मेरे पास खोने को कुछ नहीं था. मैं तब हैरान रह गया जब मुझे दाखिला मिल गया और मैंने यह सोचकर स्वीकार भी कर लिया कि जब राजनीति विज्ञान की दूसरी सूची घोषित होगी तब बदल लूंगा. मैग्जीन जर्नलिज्म पर बिल्कुल पहली क्लास में शिक्षक वत्सल श्रीकांतन ने हमसे अपने प्रिय लेखक पर निबंध लिखने को कहा. वैसे तो मैं अनेक किस्म के उपन्यासों का भुक्खड़ पाठक था लेकिन जो उपन्यास सबसे ज्यादा अच्छे लगे उनमें से ज्यादातर मूर्तिभंजक लेखक हेनरी मिलर के थे, जिन्हें यौन भूख वाला साहित्यिक गांधी माना जाता था. तो मैंने उनके बारे में लिखा और यह देखकर बेहद हैरान रह गया कि वह श्रीकांतन को इतना अच्छा लगा कि मुझसे उसे शानदार लेखन की मिसाल के तौर पर पूरी कक्षा में सस्वर पढ़ने के लिए कहा गया. तभी मैं जान गया था कि मुझे अपनी जिंदगी का सच्चा रास्ता मिल गया है. लिहाजा जब राजनीति विज्ञान में दाखिले की सूची में मेरा नाम आया, तब मैंने उसे ठुकरा दिया.

तो, मैं यहां हूं, और किसी कॉलेज में लेक्चर देने के बजाय यह निबंध लिख रहा हूं. अगर मैंने उस दिन वह अतिरिक्त फॉर्म न खरीदा होता या नोटिस बोर्ड पर नहीं ठहर गया होता तो शायद मैं कॉलेज में लेक्चर ही दे रहा होता. इसे नियति का अदृश्य हाथ कहिए या कुदरत की साजिश, लेकिन 45वीं सालगिरह के इस विशेषांक के लिए इंडिया टुडे की टीम ने जब 45 जानी-मानी शख्सियतों से उनकी जिंदगी बदल देने वाले क्षणों के बारे में बात की, तब हमने पाया कि उनमें से हरेक के पास सुनाने के लिए एक शानदार कहानी थी. इन बड़े कामयाब लोगों के साथ ऐसा मुश्किल से ही कभी हुआ लगता है कि जिंदगी बहुत सोच-समझकर बनाई गई उनकी योजनाओं के मुताबिक चली हो या उनकी महत्वाकांक्षाओं ने बंधा-बंधाया रास्ता अपनाया हो.

मिसाल के तौर पर किस्मत मोहतरमा आपके ऊपर मुस्कराने से पहले हमेशा इतनी दयालु नहीं होतीं, जैसा कि भारत के दो सबसे समृद्ध और सबसे सम्मानित कारोबारियों कुमार मंगलम बिड़ला और अजीम प्रेमजी की जिंदगी में हुआ. दोनों के साथ ही ऐसा हुआ कि उनके पिता की असमय मौत ने उनके अपने-अपने पुश्तैनी कारोबार चलाने की जिम्मेदारी उस वक्त उनके कंधों पर डाल दी जब वे इसके लिए कतई तैयार नहीं थे. बिड़ला याद करते हैं कि उन्हें जल्दी-जल्दी बड़ा होना पड़ा लेकिन उन्होंने अपनी कहानी गढऩे के लिए यह मौका स्वीकार किया. उन्होंने कारोबार को कामयाबी से संभालने के मुकाबले 20 गुना बढ़ाया. प्रेमजी को अपने पिता के कारोबार की बागडोर संभालने के लिए स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग की डिग्री बीच में छोडऩी पड़ी. इसके चलते उन्हें सालों संघर्ष करना पड़ा, तब कहीं जाकर वे ताकतवर कारोबारी साम्राज्य के प्रमुख के तौर उभरे, उस चीज के माध्यम से जिसे वे विनम्रता से ''कड़ी मेहनत और ढेर सारी किस्मत'' कहते हैं.

दूसरे मामलों में जैसा कि परम पावन दलाई लामा कहते हैं, ''कभी-कभी आप जो चाहते हैं उसका नहीं मिलना भी किस्मत की अनोखी कारीगरी होता है''. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चेयरमैन डॉ के. सिवन ने यह सचाई भारी मुश्किलों से गुजरकर खोजी. वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने को बेहद उत्सुक थे, लेकिन उनके गरीब किसान पिता कॉलेज फीस का खर्च नहीं उठा सकते थे. मायूस सिवन ने एक स्थानीय कॉलेज से साइंस की डिग्री की पढ़ाई करना मंजूर कर लिया. डिग्री पूरी होने पर उनके प्रोफेसर ने उन्हें मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) से प्रोफेशनल कोर्स करने की सलाह दी. इस संस्थान के बारे में उन्होंने सुना तक नहीं था. सिवन ने एरोनॉटिक्स इसलिए चुना क्योंकि तमिलनाडु के अपने गांव में उनका घर हवाई अड्डे के नजदीक था और बचपन में वे हैरानी से सोचते थे कि विमान कैसे उड़ता है. एमआइटी में आना उनके लिए जिंदगी बदल देने वाला क्षण था जो उन्हें पहले इसरो और फिर उसके शिखर तक ले गया.

मगर दूसरों के लिए, उनका निर्णायक मोड़, विख्यात रोमांटिक उपन्यासों की लेखिका जूलिया क्विन के शब्दों में, ''वह क्षण (है) जो इतना जबरदस्त, इतना प्रखर और साफ होता है कि आपको लगता है कि आपके सीने से कुछ टकराया है, पूरी सांस रोक देने वाला प्रहार हुआ है, और आप जानते हैं, शक की परछाईं की बिल्कुल रत्ती भर भनक के बगैर अच्छी तरह जानते हैं कि आपकी जिंदगी अब कभी यही नहीं रह जाएगी.'' बेजवाड़ा विल्सन की जिंदगी में वह क्षण तब आया जब उनका सामना इस कड़वी सचाई से हुआ कि उनके माता-पिता सिर पर मैला ढोते हैं और कोलार की सोने की खदानों में कामगार नहीं हैं, जैसा कि उन्हें यकीन दिलाया गया था. सच जानकर उन्हें इतना गहरा झटका लगा कि पहले तो वे आत्महत्या करना चाहते थे. जल्द ही उसकी जगह गुस्से ने ले ली और फिर उन्होंने ठान लिया कि वे सिर पर मैला ढोने के अभिशाप को जड़ से मिटाकर ही दम लेंगे. इसके लिए उन्होंने जबरदस्त जागरूकता पैदा की है, उसके लिए उन्हें स्वाभाविक ही वाहवाही और पुरस्कार मिले हैं.

कुछ लोगों के लिए सत्य का वह क्षण उनके मन की अवचेतन गहराई में तब तक छिपा रहता है जब तक वे अपनी प्रत्यक्ष नियति का एहसास करने के लिए तैयार नहीं हो जाते. आयुष्मान खुराना के गणित के शिक्षक ने नाच-गाने के उनके शौक के कारण उन्हें लूजर करार दे दिया था और उनका भविष्य चौपट होने की भविष्यवाणी कर दी थी. अपने बेहतर स्वभाव के विरुद्ध उन्होंने विज्ञान ले लिया और डेंटिस्ट्री कॉलेज में दाखिला लेने में कामयाब हो गए. तभी उन्हें कौंधा—वे तो थिएटर के लिए बने हैं. डेली सोप से एमटीवी के शो और अंतत: फिल्मों तक खुराना ने अलग और खास पहचान बनाई. अपनी पहली फिल्म विकी डोनर से 100-100 करोड़ रुपए की तीन हिट फिल्मों और एक नेशनल अवार्ड तक, स्कूल में नाच-गाने वाला बच्चा कहकर खारिज कर दिया गया यह शख्स आज कामयाब होकर बॉलीवुड का सबसे नामुमकिन-सा सुपरस्टार बन गया है.

अगले पन्नों में ऐसे ही 45 लोगों की बेनजीर मिसालें हैं जिनके जिंदगी बदल देने वाले क्षणों ने—चाहे वह कोई घटना, हादसा, त्रासदी या नाकामी हो—उन्हें वह कीर्ति हासिल करने के लिए विवश या प्रेरित किया जिसके लिए आज वे जाने जाते हैं. यहां प्रस्तुत शख्सियतों में से कइयों की प्रेरणा रहीं मदर टेरेसा ने कहा था, ''मैं अकेली दुनिया नहीं बदल सकती, लेकिन मैं समुद्र में लहरें पैदा करने वाला एक पत्थर तो फेंक ही सकती हूं.'' इसलिए जब नियति इशारा करे, तब एक पत्थर फेंकने से मत डरिए—उससे पैदा हुई लहरें आपको महानता के दरवाजे पर ले जा सकती है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें