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विशेषांकः परमानंद का स्रोत

भारत शायद एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो ईश्वर या सृष्टि के स्रोत को आनंद के रूप में वर्णित करती है. और जिस क्षण आप उसके संपर्क में आते हैं, आप आनंदित हो जाते हैं.

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सदगुरु जग्गी वासुदेव
सदगुरु जग्गी वासुदेव

खुशी की गुरु वाणी/खुशी की खोज

सदगुरु जग्गी वासुदेव

बहुत सारे लोग, यहां तक कि दुनिया की तथाकथित प्रमुख आध्यात्मिक व्यक्ति भी यही कहते सुने जाएंगे कि मन की शांति ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है. देखिए, शांत और आनंदित होना लक्ष्य नहीं, यह तो बुनियादी जरूरत है. आज रात आप अगर परम आनंद की अवस्था में नहीं हैं फिर भी रात्रिभोज का आनंद लेना चाहते हैं, तो शांत और प्रसन्नचित्त से वह तो लेंगे ही!

इसके पर्याप्त चिकित्सीय और वैज्ञानिक आंकड़े उपलब्ध हैं जो बताते हैं कि जब आप भीतर से आनंदित होते हैं तभी आपका शरीर और मस्तिष्क अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं. कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि यदि आपने 24 घंटे बिना किसी चिड़चिड़ाहट, उत्तेजना, क्रोध या चिंता के बिताए हों और आप केवल आनंद से भरे रहे हों तो बुद्धि के उपयोग की आपकी क्षमता 100 प्रतिशत तक बढ़ सकती है. 

लेकिन ज्यादातर लोगों के लिए उनके अपने विचार और भावनाएं बहुत बड़ी परेशानी हैं. मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल भारी कीमत वसूलती है. 10 साल पहले क्या हुआ और परसों क्या हो सकता है या क्या होगा, लोग इसको लेकर भी परेशान हो जाते हैं. वे सोचते हैं कि वे अतीत और भविष्य को भुगत रहे हैं पर वे केवल अपनी दो मानसिक शक्तियों—स्मृति और कल्पना का इस्तेमाल अपने नुक्सान के लिए कर रहे हैं.

जो कल या 10 साल पहले हुआ वह आज भी मौजूद है? नहीं. परसों जो हो सकता है वह अभी मौजूद है? नहीं. दूसरे शब्दों में कहें तो आप उसको लेकर दुखी हैं जो मौजूद ही नहीं. इसे पागलपन कहते हैं. लोग कहते हैं, ''यह मानवीय स्वभाव है.’’ नहीं, यह उन लोगों का स्वभाव है, जिनका मानवीय स्वभाव उनके अपने नियंत्रण में नहीं होता.

मानव शरीर इस धरती की सबसे जटिल मशीनरी या तंत्र है. यह एक सुपर-सुपर कंप्यूटर है, पर क्या आपने इसका यूजर्स मैनुअल पढ़ा है? अभी आप जैसे-तैसे इसका उपयोग कर रहे हैं. अगर आप चीजें 'जैसे-तैसे’ करते रहेंगे तो जीवन में दुर्घटनाएं तो होनी ही हैं. योग का अर्थ है उपयोगकर्ता के मैनुअल को पढ़ने की कला सीखना.

योग में हम मानव शरीर को पांच कोशों या पांच परतों से बना हुआ मानते हैं. पहले कोश या शरीर की पहली परत को अन्नमय कोश या भोजन से बना शरीर कहते हैं क्योंकि जिसे आप भौतिक कहते हैं वह केवल राशन का ढेर है. दूसरे को मनोमय कोश या मानसिक शरीर कहा जाता है. आज डॉक्टर मनोदैहिक रोगों के बारे में बाते करते हैं. अगर आपका सिर तनाव में है तो आपको पेट में अल्सर हो सकता है.

यानी मन को जो हो रहा है वह शरीर के साथ हो रहा है क्योंकि जिसे आप 'मन’ कहते हैं वह किसी एक स्थान पर स्थित नहीं. शरीर की प्रत्येक कोशिका की अपनी समझ होती है. शरीर की तीसरी परत ऊर्जा शरीर या प्राणमय कोश है; चौथा है विज्ञानमय कोश या सूक्ष्म शरीर; और पांचवां आनंदमय कोश. आनंदमय कोश का अर्थ यह नहीं कि आपके भीतर आनंद का कोई बुलबुला मौजूद है.

हम इसे परमानंद शरीर कहते हैं क्योंकि हमारे अनुभव में जब भी हम इसे छूते हैं, हम आनंदित हो जाते हैं. आनंद उसका स्वभाव नहीं है; बल्कि वह हमारे लिए आनंद का कारण बनता है. आनंदमय कोश एक अभौतिक आयाम है जो हर भौतिक वस्तु का स्रोत है. अगर आप शरीर की पहली तीन परतों को एक सीध में कर लेते हैं तो इससे आनंदमय कोश को छूने का एक मार्ग और संभावना पैदा होगी और परमानंद एक स्वाभाविक स्थिति बन जाएगा.

भारत शायद एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो ईश्वर या सृष्टि के स्रोत को आनंद के रूप में वर्णित करती है. और जिस क्षण आप उसके संपर्क में आते हैं, आप आनंदित हो जाते हैं. जिसे हम 'ईशा योग’ कहते हैं, वह आपके भीतर उस दिव्यता की सीढ़ी मात्र है.

 (शैली आनंद से बातचीत पर आधारित)

सद्गुरु जग्गी वासुदेव एक आध्यात्मिक गुरु हैं. वे सबसे ज्यादा पढ़े जाने वालों लेखकों में शुमार हैं और पद्म विभूषण (2017) से सम्मानित हैं

खुशी का मंत्र
''शांत और आनंदित होना जीवन का लक्ष्य नहीं बल्कि वह तो बुनियादी जरूरत है.’’

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