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विशेषांकः तय किया कि अब कभी खाली हाथ नहीं लौटूंगी..

...जब 2014 के एशियाई खेलों में मुझे पांचवां स्थान मिला’’

स्वप्ना बर्मन स्वप्ना बर्मन

स्वप्ना बर्मन, 24 वर्ष

अपने संकल्प के अनुरूप उन्होंने 2017 में एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप जीती, अगले साल एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक प्राप्त किया. 2019 में उन्हें प्रतिष्ठित अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया

बंगाल  के जलपाईगुड़ी जिले में एक गरीब चाय बागान मजदूर के परिवार में जन्मी स्वप्ना बर्मन को बहुत कम उम्र में ही खेल में इस उम्मीद के साथ डाल दिया गया था कि इससे उसे नौकरी पाने में मदद मिल सकेगी और वह परिवार का सहारा बन सकेगी.

इस सफर में उन्हें बहुत-सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा; मसलन, दोनों पैरों में छह-छह उंगलियां होने से उन्हें सामान्य जूते पहनने में मुश्किल होती थी लेकिन गरीबी के कारण वे अपने लिए उपयुक्त जूते बनवाने में असमर्थ थीं और सामान्य जूतों में ही घंटों अभ्यास में जुटी रहती थीं.

उनके पिता को लकवा मार जाने के बाद मां ही परिवार का आर्थिक सहारा रह गई थीं. इससे स्वप्ना पर बेहतर प्रदर्शन का दबाव और बढ़ गया. एथलेटिक्स करियर की तैयारी में उन्हें बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन अहम बात यह है कि इस दौरान मां रीढ़ बनकर पीछे खड़ी रहीं: वे हर दिन उन्हें घर से कई किलोमीटर दूर प्रशिक्षण के लिए लेकर जाती थीं और लौटकर आने के बाद स्वप्ना के दुखते हाथ-पैरों पर तेल मलती थीं ताकि वे अगले दिन के कठोर अभ्यास के लिए तैयार हो सकें.

बर्मन की कड़ी मेहनत और अनगढ़ प्रतिभा ने 2012 में लोगों का ध्यान खींचना शुरू किया जब उन्होंने स्कूल नेशनल अंडर-14 ग्रुप स्पर्धा में स्वर्णपदक जीता. इसके बाद उनके सामने और कठिनाइयां आईं. पांच फुट ढाई इंच लंबाई के हिसाब से अधिक वजन होने के कारण उसके प्रशिक्षकों को शुरू में उम्मीद नहीं थी कि वे ऊंची कूद जैसे खेलों में अच्छा प्रदर्शन कर सकेंगी. लेकिन साल भर के भीतर ही उन्होंने दो नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए. इसके बाद उनके कोच सुभाष सरकार ने उन्हें हेप्टाथलीट के तौर पर तैयार करना शुरू किया.

इस स्पर्धा में 100, 200 और 800 मीटर की दौड़, ऊंची कूद, शॉट-पुट और भाला-फेंक जैसे खेल एक साथ शामिल होते हैं. 2014 के एशियाई खेलों में उनका पदार्पण पदकों के मामले में सफल नहीं रहा. वे पांचवें स्थान पर आईं जिससे उनका दिल टूट गया. इसी के साथ परिवार की मदद करने में सक्षम होने के लिए नौकरी पाने का उनका सपना भी टूट गया था. खैर, इससे वे जीत के लिए और भी दृढ़संकल्प हुईं. स्वप्ना का कहना है, ''उसी वक्त मैंने कभी खाली हाथ घर न लौटने की कसम खाई.’’

उन्होंने नए उत्साह से प्रशिक्षण लेना शुरू किया. नतीजा भी मिला एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2017 और पटियाला फेडरेशन कप में स्वर्ण पदक के रूप में. अगले वर्ष वे एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने वाली देश की पहली हेप्थाटलीट बन गईं. उनके उतार-चढ़ाव भरे जीवन की ही तरह उनका स्वर्ण विजय अभियान भी बाधा-मुक्त नहीं था.

मुख्य स्पर्धा के दो दिन पहले भयानक दांत-दर्द से निबटने के लिए उन्हें बड़ी मात्रा में दर्द निवारक दवाएं लेनी पड़ीं. प्रतिस्पर्धा में भाग लेते हुए उनके जबड़े के दाहिने हिस्से पर काइनेसियो टेप बंधा था. पर जीत का स्वाद बेशक मीठा रहा. स्वर्ण पदक के साथ ही वजन कम रखने के लिए वर्षों से चाशनी भरे रसगुल्ले और आइसक्रीम का त्याग करने वाली इस 22 वर्षीया स्वप्ना को दोनों ही चीजों के साथ जश्न मनाने की मंजूरी मिली.

फिर तो और भी कई प्रतिफल मिले. जो लड़की छह-छह उंगलियों वाले पैरों के लिए अनुकूलित जूते नहीं खरीद सकती थी, उसे एडिडास ने जर्मनी में अपनी प्रयोगशाला का दौरा करने को न्यौता दिया, अपना ब्रान्ड ऐंबेसडर बनाया और उपहार में सात जोड़ी हाइ-परफॉर्मेंस जूते भेंट किए. हालांकि अभी उन्हें कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली है, फिर भी आज वे परिवार का सहयोग कर पाने के सपने को पूरा कर रही हैं. उन्हें ओएनजीसी से वजीफा मिलता है और राहुल द्रविड़ एथलीट मेंटरशिप प्रोग्राम के माध्यम से गोस्पोट्र्स फाउंडेशन से मदद भी मिलती है. 

'स्पोट्र्स में सकारात्मक नजरिया बनाए रखना बहुत जरूरी है. अपने पर भरोसा रखो, अपनी क्षमताओं पर यकीन करो और ध्यान लक्ष्य पर रहे. असंभव कुछ भी नहीं

✒ कड़ी प्रतिस्पर्धा
स्वप्ना बर्मन इंडिया टुडे कॉनक्लेव ईस्ट 2018 में; और (नीचे) 2014 के एशियाई खेलों में अपने आगाज के दौरान

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