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शख्सियतः बेटी बड़े घर की

पंडित बिरजू महाराज की नातिन शिंजिनी कुलकर्णी अपनी रचनात्मक स्वायत्तता को लेकर बड़ी सजग हैं. भीतर की इसी स्वतंत्र आग ने उन्हें इस महामारी में भी नवाचार-सृजनशीलता के लिए जैसे वैचारिक जमीन दे दी.

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शिंजिनी कुलकर्णी शिंजिनी कुलकर्णी

पंडित बिरजू महाराज की नातिन शिंजिनी कुलकर्णी अपनी रचनात्मक स्वायत्तता को लेकर बड़ी सजग हैं. भीतर की इसी स्वतंत्र आग ने उन्हें इस महामारी में भी नवाचार-सृजनशीलता के लिए जैसे वैचारिक जमीन दे दी.

महाराज जी पर बायोपिक का विचार अगर उभरे तो  किरदार किस अभिनेता को करना चाहिए? 

बेशक बायोपिक बनती है तो कथक की असल तस्वीर सामने आएगी और दर्शक-समाज भी महाराज जी के जीवन से परिचित होगा. फिल्म विश्वरूपम में कमल हासन काफी कुछ महाराज जी की तरह लगे थे. संजय लीला भंसाली अगर बनाएं और कमल हासन रोल करें तो यह जोड़ी कमाल कर सकती है.

आपका नाम अलग सा है शिंजिनी...! क्या अर्थ है इसका?

एक अर्थ तो घुंघरूओं की छनक है. दूसरा, ऊँ  का उच्चारण करने से जो तरंगें ब्रह्मांड में पैदा होती हैं, उन्हें भी शिंजिनी कहा जाता है. संस्कृत के बड़े अध्येता हुए हैं जीवन पाणि, उन्होंने मेरा नामकरण किया था.

महामारी के दौरान आपका जीवन दूसरे कलाकारों के मुकाबले कैसा गुजरा?

आमतौर पर जब दो रोज भी एक जगह टिकने की आदत न हो तब लगातार घर पर रहना. फिर इसके फायदे समझ में आए कि जीवन की मध्यम गति ही सर्वोत्तम है. रियाज के मायने बदले. कथक के थोड़ा और नजदीक आई. दर्शक को क्या पसंद है?

इसकी बजाए मुझे किसमें आनंद आएगा, ऐसी नजर विकसित हुई. परिवार में रम गई. दौड़-भाग बंद होने से मानसिक शांति पाई, जो छूट गई थी.

■ घर में ही जब दिग्गज हों तो दो राय नहीं कि खूब फायदे होते हैं. क्या नुक्सान भी होता है?
 

दोनों पहलू हैं इसके. हम पहले रोज से ही खालिस तालीम पाते हैं. दिग्गजों की आवाजाही और सत्संग से भी सीखते हैं.

हमारी मेहनत का श्रेय मगर हमें कई बार नहीं मिलता. हमेशा हमारी तुलना ऊंचे दर्जे से की जाती है. इसके उलट जब हम कोई असाधारण प्रस्तुति कर दें तो क्रिटिक्स कहते हैं, ''बड़े घर की है. नाचेगी ही!’’

■ बड़ी परंपरा ने तो आपको भरपूर दिया. पर पूछें तो बदले में आपने कथक को क्या दिया?

कोई भी शिष्य से कलाकार तभी बनता है जब उसमें अपना रंग डाल सके. मेरा रुझान आरंभ से नई परिकल्पनाओं में रहा. कथक की तकनीकी बातें बनाए रखते हुए पौराणिक मिथकों वाले कथ्य के साथ शुद्ध साहित्य को भी प्रस्तुति के दायरे में लाई.

घराने में इसकी हिम्मत कम ही की गई थी मगर महाराज जी ने भी हिम्मत दी. इस महामारी में उर्मिला-लक्ष्मण के प्रेम पर आधारित एक रचना गढ़ डाली. मैंने कभी रट्टू तोता नहीं बनना चाहा.

-राजेश गनोदवाले

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