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रक्त संकट

कोविड-19 के डर और आइटी दफ्तरों तथा कॉलेजों के बंद हो जाने से रक्त संग्रह अभियान को धक्का पहुंचा है

ए. शिवा ए. शिवा

हैदराबाद के विद्यानगर में रेड क्रॉस का ब्लड बैंक हमेशा खुला रहता है. इसके संचालक डॉ. के. पिची रेड्डी अब चिंतित हैं क्योंकि रक्त प्लाज्मा की सप्लाई कम हो रही है.

थैलेसीमिया से पीडि़त करीब 400 बच्चों के लिए उन्हें मार्च के दूसरे हफ्ते में कम से कम 400 यूनिट खून जुटाना होता है. बहुत गंभीर मामलों में शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी की भरपाई पखवाड़े में एक बार खून चढ़ाकर की जाती है और आम तौर पर ब्लड बैंक यह खून मुहैया करवा देता है. अब इंतजार लंबा हो रहा है और इसके नतीजे खतरनाक हो सकते हैं.

रेड्डी कहते हैं, ''रक्तदाताओं से हम हर माह 1,400 यूनिट खून जमा करते हैं. उसमें से 800 यूनिट बच्चों को जाता है. इस मार्च में अब तक सिर्फ 600 यूनिट जमा हुआ है और हम मुश्किल में हैं. हमें बच्चों और सरकारी अस्पतालों में आपात स्थितियों के लिए (खून) पहुंचाना होता है.

इंजीनियरिंग कॉलेजों, आइटी कंपनियों, जिम और फिटनेस केंद्रों के बंद होने से हम प्राथमिक रक्तदाता खो बैठे हैं.'' अब सारी उम्मीदें सशस्त्र बलों और अन्य वर्दीधारी बलों पर टिकी हैं कि वे रक्तदान करेंगे.

1.11

करोड़ यूनिट

खून 2016-17 के दौरान जमा किया गया, डब्ल्यूएचओ के तहत निर्धारित लक्ष्य का सिर्फ 85 फीसद

2,903

ब्लड बैंक थे भारत में 2018 में

''हर माह जमा होने वाले 1,400 यूनिट में से 800 यूनिट बच्चों को जाता है. इस मार्च में अब तक केवल 600 यूनिट ही जमा हुआ है''

डॉ. के. पिची रेड्डी

निदेशक, रेड क्रॉस ब्लड बैंक, हैदराबाद

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