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कोरोना संकटः कड़वा अनुभव

मुंबई के कस्तूरबा अस्पताल में भाविका गुंदेचा को अलग रखने की सुविधा सफाई के लिहाज से पर्याप्त नहीं

मिलिंद शेल्टे मिलिंद शेल्टे

पुणे की भाविका गुंदेचा स्पेन में कोविड-19 के फैलाव के बाद 25 दिन का अपना प्रशिक्षण कार्यक्रम बीच में ही छोड़ 16 मार्च को मुंबई पहुंचीं.

मुंबई में उतरने के फौरन बाद उन्हें स्क्रीनिंग के लिए सेवेनहिल्स अस्पताल ले जाया गया और फिर टेस्टिंग के लिए कस्तूरबा अस्पताल भेज दिया गया. भाविका कहती हैं, ''वहां आठ घंटे से भी ज्यादा लाइन में खड़ी रही. हममें से कुछ लोग वहां से भाग गए.'' उन्हें एक अलग सेक्शन में एक बेड रहने के लिए दे दिया गया.

गुंदेचा बताती हैं कि बेड पर लाल चींटियां रेंग रही थीं. ड्यूटी पर तैनात नर्स से शिकायत की पर कोई फायदा नहीं हुआ. वे कहती हैं, ''कुछ समय बाद कोविड-19 के लक्षणों वाली एक महिला को हमारे वार्ड में भर्ती कर दिया गया. मैं डर गई और अस्पताल से निकल भागने की कोशिश की. मम्मी-पापा को भी फोन किया पर कोई फायदा न हुआ.''

आखिरकार संक्रमित महिला को कहीं दूसरी जगह भेज दिया गया. 17 मार्च की सुबह जब कोरोना वायरस का उनका टेस्ट नेगेटिव आया तो उन्होंने अस्पताल छोड़ दिया. वे कहती हैं, ''मुझे नाश्ते में ब्रेड और दूध दिया गया, जिसने मुझे जेल के दृश्यों की याद दिला दी.

अस्पताल में खानपान और दूसरी चीजों को लेकर हालात बहुत खराब थे. इसीलिए लोग सरकारी अस्पतालों में भर्ती होना नहीं चाहते.''

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