scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

विशेषांकः पर्यावरण के लिए फिक्रमंद

कृषि पर्यटन, एडवेंचर टूरिज्म, कारवां, पर्यटक स्थलों की ब्रान्डिंग को बढ़ावा देने पर उनके जोर से राज्य भर में बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर विकास हुआ है.

X
आदित्य ठाकरे आदित्य ठाकरे

नई नस्ल 100 नुमाइंदे/ राजनीति

आदित्य ठाकरे 31 वर्ष
पर्यटन और पर्यावरण मंत्री, महाराष्ट्र

वह ठाकरे परिवार के पहले सदस्य हैं जिन्होंने चुनाव लड़ा और जीते. बालासाहेब के पोते और उद्धव तथा रश्मि ठाकरे के बड़े बेटे ने राज्य की राजनीति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया है. वे कानून और इतिहास में स्नातक हैं और जलवायु परिवर्तन को लेकर अगली पीढ़ी की चिंताओं को साझा करते हैं.

उन्होंने 13 दिसंबर को पर्यावरण शिक्षा के पाठ्यक्रम—माझी वसुंधरा—की शुरुआत करते हुए कहा कि राजनीतिक पार्टियों को जलवायु परिवर्तन को चुनावी मुद्दे के रूप में अपनाना चाहिए. उन्होंने देवेंद्र फड़नवीस के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान राज्य में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने की पहल में गहराई के साथ भागीदारी की थी. इससे उनकी प्रतिबद्धता का पता चला था.

बाद में, जब उन्होंने अपने पिता की अगुआई वाली महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार में पर्यावरण मंत्री का जिम्मा संभाला तो सबसे पहले अपने विभाग के नाम में जलवायु परिवर्तन को जोड़ा. मुंबई की सड़कों पर इलेक्ट्रिक वाहनों को उतारने की उनकी कोशिश भी इसी सरोकार से जुड़ी है. ऐसे में किसी को कोई हैरानी नहीं हुई जब सितंबर में ब्रिटेन में वैश्विक जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में युवा ठाकरे ने भाग लिया.

हालांकि, ऐसा नहीं है कि केवल जलवायु परिवर्तन का मुद्दा उनके दिल के करीब है. और हम शब्दों के प्रति उनके प्यार की बात नहीं कर रहे—आदित्य अपनी कविताएं प्रकाशित कर चुके हैं और उन्होंने अपना एक एलबम भी रिकॉर्ड किया जिसके सभी आठ गाने उन्होंने खुद ही लिखे हैं.

ठाकरे राज्य में पर्यटन को लेकर भी कई विचार पेश किए हैं. मिसाल के तौर पर, उन्होंने एक होटल खोलने के लिए आवश्यक अनुमतियों की संख्या में कटौती करते हुए उसे 70 से 10 कर दिया है. कृषि पर्यटन, एडवेंचर टूरिज्म, कारवां, पर्यटक स्थलों की ब्रान्डिंग को बढ़ावा देने पर उनके जोर से राज्य भर में बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर विकास हुआ है.

उनके एजेंडे में अगली चीजें राज्य के 400 किले, समुद्र तट और वन्यजीव हैं. पर्यटन विभाग के अधिकारियों को बता दिया गया है—''रेत और बर्फ को छोड़कर महाराष्ट्र में दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सब कुछ है.

हमें उनकी सही से मार्केटिंग करने की जरूरत है.ज्ज् उनकी दोनों चिंताओं—पर्यावरण और पर्यटन—को साधने के लिए इससे बेहतर तरीका और न्न्या हो सकता है कि पर्यटन स्थलों पर स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित किया जाए कि वे पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ किस तरह पर्यावरण को भी बचा सकते हैं.

मुंबई में बुनियादी ढांचे की योजना बनाने और उसे पूरा करने में आदित्य उतनी ही दिलचस्पी रखते हैं. ऐसे में उन्हें एक दिन शिवडी-न्हावा शेवा सी लिंक की प्रगति की समीक्षा करते हुए तो अगले दिन मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एमएमआरडीए) के अधिकारियों के साथ बातचीत करते देखा जा सकता है.

वे मुंबई को दिसंबर, 2023 तक ट्रैफिक जाम से मुन्न्त बनाना चाहते हैं. उम्मीद-सिर्फ उनके एलबम का नाम नहीं है. उक्वमीद एक ऐसी चीज है जिसमें युवा ठाकरे ने भारी निवेश किया है. 

शौक हैं और भी कविता लिखने के शौकीन आदित्य अक्सर पार्टी के प्रचार होर्डिंग्स के लिए कंटेट लिखने में मदद करते हैं. पढ़ना और क्रिकेट देखना पसंद करते हैं, खासकर टेस्ट मैच

''वे मेहनती, प्रगतिशील और सहृदय नेता हैं. उनका भविष्य उज्ज्वल है’’
—सुप्रिया सुले, सांसद, एनसीपी

नई नस्ल 100 नुमाइंदे/ राजनीति
जबरदस्त जाट
दुष्यंत चौटाला, 33 वर्ष
उप मुख्यमंत्री, हरियाणा
दुष्यंत चौटाला, उप मुख्यमंत्री, जेजेपी, बीएससी, मास कम्युनिकेशन, अजय सिंह चौटाला

 

मशहूर गांधी परिवार के अलावा, उनका एकमात्र राजनीतिक परिवार है जिसकी चार पीढ़ियां नेता निर्वाचित हुई हैं. फिर भी, हरियाणा के उप-मुख्यमंत्री और जनता जननायक पार्टी (जेजेपी) के अध्यक्ष और सह-संस्थापक दुष्यंत चौटाला ने बार-बार यह दिखाया कि वे पारिवारिक विरासत की बैसाखी के बिना राजनीतिक मोर्चे पर मोल-भाव कर सकते हैं. चुनाव लड़ने के योग्य होने से पहले ही, दुष्यंत ने 2013 में इंडिया टुडे से कहा था, ''लोगों का दिल जीतना आसान काम नहीं है.’’ वे महज आठ वर्ष की उम्र में अपने परदादा और पूर्व उप-प्रधानमंत्री देवीलाल के साथ 1996 में रोहतक में प्रचार अभियान में गए थे. लिहाजा जनता की नब्ज पकड़ने का गुण स्वाभाविक रूप से उनमें मौजूद है. 2014 में, दुष्यंत 16वीं लोकसभा के सबसे कम उम्र के सदस्य बने, तब जब उनके दादा और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, पिता अजय सिंह चौटाला और चाचा अभय सिंह चौटाला जेल में थे. चार साल बाद, जैसे-जैसे दादा और चाचा के साथ उनके मतभेद बढ़े, दुष्यंत को इंडियन नेशनल लोक दल (इनेलो) से निकाल दिया गया. दुष्यंत ने हार नहीं मानी और 31 साल की उम्र में अलग पार्टी बना ली. उनकी पार्टी ने पहले ही चुनाव—साल 2019 के हरियाणा विधानसभा चुनाव—में 10 सीटें जीतीं, जबकि इनेलो ने केवल एक सीट जीती. 90 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा बहुमत से छह सीटें दूर थी. दुष्यंत ने उससे हाथ मिलाया और बदले में उप-मुख्यमंत्री का पद और जेजेपी के लिए कई प्रमुख विभागों को हासिल कर लिया. दुष्यंत तब से सत्ता में अपने कार्यकाल का इस्तेमाल उस जाट समुदाय के बीच अगले बड़े नेता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कर रहे हैं, जो हरियाणा में अकसर चुनावी नतीजे निर्धारित करता है.


—कौशिक डेका
 

''अपनी पारिवारिक विरासत पर निर्भर रहने के बजाए, दुष्यंत ने लोगों का सच्चा प्रतिनिधि बनने के लिए कड़ी मेहनत की. रोज जनता से मिलने से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के साथ संवाद करने तक वे शांत बने रहते हैं और जनता की सभी शिकायतों या सरकारी फाइल को व्यक्तिगत रूप से देखते हैं"
डॉ. के.सी. बांगड़, वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
जेजेपी, पूर्व-चेयरमैन, हरियाणा लोक सेवा आयोग 

डिग्री और विरासत: सीएसयू, बेकर्सफील्ड से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में बीएससी करने के बाद दुष्यंत ने 2018 में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली से एलएलएम (प्रोफे.) किया. अगले साल उन्होंने गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी, हिसार से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की.

नई नस्ल 100 नुमाइंदे/ राजनीति

ए टू जेड 
राजनेता
तेजस्वी यादव, 32 वर्ष

विपक्ष के नेता और पूर्व उप-मुख्यमंत्री, बिहार
उनके माता-पिता—राबड़ी देवी और लालू प्रसाद—ने मुख्यमंत्री के रूप में लगभग 15 वर्षों तक लगभग निर्बाध रूप से शासन किया था. इस लिहाज से उनकी सफल राजनीतिक शुरुआत बिल्कुल सही हुई.
तेजस्वी ने साल 2015 में अपना पहला विधानसभा चुनाव जीता और उप मुख्यमंत्री के रूप में राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. लेकिन उनके शुरुआती अच्छे दिनों पर जुलाई 2017 में विराम लग गया, जब नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से गठबंधन तोड़ दिया और तेजस्वी को विपक्ष की कुर्सी पर बैठना पड़ा. फिर उनके पिता को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और बिहार की सबसे बड़ी पार्टी का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सियासत में नए तेजस्वी के कंधों पर आ गई.
साल 2019 का लोकसभा चुनाव तेजस्वी के लिए बुरे ख्वाब जैसा था जब राजद को एक भी सीट नहीं मिली. लेकिन, एक साल बाद इस युवा नेता ने जोरदार वापसी की और राजद बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनी. हालांकि पार्टी सरकार नहीं बना पाई पर उनकी सफलता महत्वपूर्ण थी और इसका श्रेय केवल उन्हें मिला क्योंकि उन्होंने पिता की अनुपस्थिति में पार्टी की अगुआई की. 
आइपीएल क्रिकेटर पीछे छूट गया और लालू के छोटे बेटे होने के तमगे पर निर्भरता भी. तेजस्वी ने साफ कर दिया कि वे आत्मनिर्भर नेता हैं. वे राजद को ए टू जेड हर किसी की पार्टी के रूप में पेश कर रहे हैं. एक ऐसी पार्टी के रूप में जो केवल एम-वाई (मुस्लिम-यादव) के बजाए हर किसी का प्रतिनिधित्व करती हो. वे मुख्यमंत्री के कट्टर आलोचक हैं, लेकिन 10-दलीय प्रतिनिधिमंडल के हिस्सा थे जो इस अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी से जातिगत जनगणना की मांग को लेकर मिला था. यहां तक कि परिवार के सदस्यों को भी उनके एजेंडे के आड़े नहीं आने दिया जाता, खासकर उनके भाई तेज प्रताप को. चाहे उनके माता-पिता हों या भाई-बहन, उन्होंने राजद के पोस्टरों से उन्हें हटा दिया, ताकि वे पार्टी से कतराने वालों तक पहुंच बना सकें. वे निश्चित रूप से ऐसे राजनेता हैं, जिन पर सबकी निगाहें टिकी होंगी.
 

— अमिताभ श्रीवास्तव

उड़ान का डर उन्हें विमान में उड़ान भरने से डर लगता था लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान उन्होंने इतना सफर किया कि उनका डर खत्म हो गया

''बिहार के लोगों ने तेजस्वी के नेतृत्व में भरोसा जताया है. वे उन्हें कुछ नया देते हैं और अपने प्रगतिशील नजरिये से हर किसी को जोड़ते हैं. ’’
प्रो. मनोज झा, आरजेडी सांसद, राज्यसभा

अदिति सिंह, 34 वर्ष
विधायक रायबरेली सदर 
अदिति सिंह, विधायक, अखिलेश सिंह, रायबरेली, भाजपा, कांग्रेस

बगावती तेवर वाली नेता

रायबरेली सदर से पांच बार विधायक रहे पिता अखिलेश सिंह की तबियत खराब होने के चलते अदिति सिंह ने राजनीति में प्रवेश किया. वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में रायबरेली सदर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पहला चुनाव जीतने वाली अदिति अपने पिता के पदचिन्हों पर ही चल रही हैं. अखिलेश सिंह पहले कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में रायबरेली सदर से चुनाव जीतते रहे लेकिन पिछले दो चुनाव उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस के विरोध में ही लड़ा. पिता की तरह ही अदिति ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद अब भाजपा का दामन थाम लिया है. कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली की सदर विधायक के रूप में अदिति ने अपनी पहचान एक सक्रिय नेता की बनाई है. मुख्यमंत्री योग आदित्यनाथ को अपना गुरु मानने वाली अदिति नवंबर, 2020 में रायबरेली में कमला नेहरू एजुकेशन सोसाइटी की जमीन से जुड़े विवाद को लेकर गांधी परिवार पर हमलावर हो गई थीं. हालांकि इससे साल भर पहले नवंबर, 2019 में वे उन कर्मचारियों के समर्थन में उतर आई थीं जो मोदी सरकार की ओर से रायबरेली के आधुनिक रेलडिब्बा कारखाने का निगमीकरण किए जाने का विरोध कर रहे थे. रायबरेली सदर विधायक के रूप में अदिति की कई बार जनता की समस्याओं को लेकर स्थानीय प्रशासन से भिड़ंत हो चुकी है.

—आशीष मिश्र

समाज सेवा मसूरी इंटरनेशन स्कूल से बारहवीं तक की पढ़ाई करने के बाद अदिति ने अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय से मैनेजमेंट की डिग्री ली. राजनीति में आने से पहले वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय थीं

''2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा लहर के 
दौरान जीवन का पहला चुनाव जीतना जनता के बीच अदिति की पकड़ जाहिर करता है’’
—प्रोफेसर शशिकांत पांडेय, विभागाध्यक्ष राजनीति शास्त्र विभाग, बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ

नई नस्ल 100 नुमाइंदे/ राजनीति
तरंग गोगोई, 37 वर्ष
विधायक, नाहरकटिया, असम
तरंग गोगोई, विधायक, पोस्टर बॉय, तरंग बैडमिंटन, हेमंत बिस्व सरमा

 

काबिल प्रतिनिधि
जब इस साल अप्रैल में तरंग गोगोई ने नाहरकटिया निर्वाचन क्षेत्र से अपने पहले विधानसभा चुनाव में उतरे थे तो बहुत सारे लोगों को उनकी जीत का अंदाजा नहीं था. यह नौसिखुआ युवा तीन हाइप्रोफाइल उम्मीदवारों—पूर्व मंत्री और चार बार की विधायक प्रणति फूकन; लुरिनज्योति गोगोई, असम जातीय परिषद के अध्यक्ष और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के खिलाफ राज्यव्यापी विरोध के पोस्टर बॉय तथा एजीपी के मौजूदा विधायक नरेन सोनोवाल. फिर भी, उन्होंने करीब 15,000 मतों के अंतर से यह बहुकोणीय मुकाबला जीतकर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया—2016 के विधानसभा चुनाव में जीत का अंतर केवल 3,500 वोट से अधिक था.

एक पीडब्ल्यूडी ठेकेदार और गृहिणी मां के बेटे गोगोई ने साल 2003 में दिल्ली में नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया में शामिल होने के साथ राजनीति में प्रवेश किया था. वे उसके केरल, बिहार और पूर्वोत्तर के राष्ट्रीय सचिव और प्रभारी बने. दिल्ली और असम में विभिन्न कैंपसों में चुनावों में वोट जुटाने के अपने काम की वजह से वे असम कांग्रेस के तत्कालीन मंत्री हेमंत बिस्व सरमा की नजर में आए. गोगोई तब से सरमा के वफादार रहे हैं, साल 2015 में सरमा के साथ भाजपा में शामिल हुए और उसके राज्य सचिव बने. उनके आपसी मतभेदों के बावजूद सरमा और पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल का समर्थन पाने में गोगोई कामयाब रहे. तरंग की कामयाबी-उनका जमीनी जुड़ाव, मृदुभाषी राजनेता जो कि बड़े-बड़े वायदे करने के बजाय करके दिखाने में यकीन-जैसी बातों का नतीजा है. ठ्ठ

—कौशिक डेका

बैडमिंटन प्रेम: तरंग बैडमिंटन खिलाड़ी बनना चाहते थे. अब जब भी मुख्यमंत्री सरमा और वे गुवाहाटी में होते हैं, दोनों बैडमिंटन खेलते हैं.

''तरंग असम के सबसे भरोसेमंद युवा नेताओं में से हैं जिन्होंने अपनी योग्यता, नए विचारों और कठिन परिश्रम से स्थान बनाया है’’
सर्बानंद सोनोवाल, केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन व जलमार्ग और आयुष मंत्री

तृणमूल का कप्तान
अभिषेक बनर्जी, 34 वर्ष
लोकसभा सांसद और राष्ट्रीय महासचिव, ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस

 

उनके पास अपनी आक्रामक बुआ सरीखी कोई सियासी तड़क-भड़क नहीं है. अभिषेक हर वक्त स्थिर नजर आते हैं. उन्हें कुछ भी परेशान नहीं कर पाता—न बुआ-भतीजे के तंज, न वंशवादी शासन के आरोप, और न ही ईडी की ओर से उन्हें और उनकी पत्नी रुजिरा को कोयला तस्करी की जांच में शामिल होने के लिए भेजा समन.

इसके बजाय वह 2021 में भाजपा की उस शक्तिशाली चुनावी मशीन का मुकाबला करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे जिसकी अगुआई देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और अन्य भगवा दिग्गज के हाथों में थी. प्रशांत किशोर के साथ मिलकर उन्होंने एक पटकथा लिखी और ममता बनर्जी के साथ चट्टान की तरह खड़े होकर उन्होंने ममता को भाजपा के शक्तिशाली अभियान के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया. आलोचनाओं और पार्टी के लोगों के पलायन के बावजूद अभिषेक ने कमतर प्रदर्शन करने वाले, अलोकप्रिय, भ्रष्ट और विश्वासघाती विधायकों को टिकट से वंचित रखने की किशोर की सिफारिश लागू की. टीएमसी के इतिहास में पहली बार मौजूदा विधायकों में से एक तिहाई का टिकट कटा. उन्होंने चुनावी रणनीतिकार किशोर को खुली छूट दी और भाजपा की आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए उन्होंने पेशेवरों की सहायता से एक सोशल मीडिया अभियान शुरू किया. इसका नतीजा टीएमसी की भारी जीत के रूप में निकला.

अब वह दीदी के उस अभियान के कप्तान हैं जिसका मकसद बंगाल से आगे बढ़कर अन्य जगहों में भी टीएमसी के पैर पसारना है. वे धीरे-धीरे टीएमसी का चेहरा बनकर पार्टी के संगठन को अनुशासित और कॉडर आधारित बनाने की शुरूआत कर रहे हैं. उन्होंने चंद हाथों में सत्ता का केंद्रीकरण रोकने के लिए एक व्यक्ति, एक पद की नीति लागू की है. उन्होंने दबदबे या राजनीतिक रसूख के आधार पर नहीं, बल्कि प्रदर्शन के आधार पर टिकटों और विभागों का निष्पक्ष और पारदर्शी वितरण की नीति लागू की है. वे युवा नेताओं की एक पीढ़ी तैयार करते हुए उन्हें पद और जिम्मेदारियां दे रहे हैं ताकि समय आने पर वे युवा कमान संभाल सकें.

— रोमिता दत्ता.
 

गैजेट के शौकीन: उन्हें नए इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट पर खर्च करना पसंद हैं, उन्होंने हाल ही में आइफोन 13 लिया है

''अभिषेक जो कुछ भी करते है उसमें वास्तुकार जैसा कौशल होता है. वे राज्य में नए सिरे से निवेश पर ध्यान देना चाहते हैं ’’
-सुखेंदु शेखर रे, राज्यसभा सदस्य, टीएमसी

राजनीति में निशानेबाज
श्रेयसी सिंह, 30 वर्ष
भाजपा विधायक, बिहार

श्रेयसी सिंह, भाजपा विधायक, दिग्विजय सिंह, रजत, स्वर्ण पदक, अर्जुन पुरस्कार

वह केवल 19 वर्ष की थीं, जब उनके पिता गिद्धौर राज परिवार के वंशज और समाजवादी नेता दिग्विजय सिंह का जून 2010 में निधन हो गया. हालांकि दिग्विजय उनके लिए राजनीति और निशानेबाजी के प्रति प्यार छोड़ कर गए. वे चंद्रशेखर (1990-91) और अटल बिहारी वाजपेयी (1999-2004) की सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री और भारतीय राष्ट्रीय राइफल संघ के अध्यक्ष थे. उनकी मां पुतुल सिंह भी बांका से पूर्व सांसद हैं. श्रेयसी ने लगातार दो राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीते—वर्ष 2014 में एक रजत और चार साल बाद एक स्वर्ण पदक. उन्हें अर्जुन पुरस्कार भी मिल चुका है.

मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी की पहली लहर में आम लोगों से बातचीत के बाद ही उन्होंने राजनीति में आने पर सोचना शुरू किया. तब उन्हें एहसास हुआ कि जमुई में जन प्रतिनिधि के रूप में लोग उनके जैसा युवा और प्रतिबद्ध व्यक्ति चाहते हैं. 2020 में औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल होने के बाद, उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव लड़ा और पहले चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के तत्कालीन विधायक विजय प्रकाश को 41,000 मतों से हरा दिया. 

— अशोक प्रियदर्शी

गोल्डन गर्ल: राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण जीतने वाली वह बिहार की पहली खिलाड़ी हैं

श्रीकांत शिंदे, 34 वर्ष
लोकसभा सांसद, शिवसेना
श्रीकांत शिंदे, लोकसभा सांसद, शिवसेना, स्वास्थ्य योद्धा, पर्यावरण

 

डॉक्टर राजनेता
जब पेशे से ऑर्थोपेडिक सर्जन श्रीकांत शिंदे ने 2014 में राजनीति में शामिल होने का फैसला किया तो उन्हें अच्छे से मालूम था कि अपनी पार्टी शिवसेना को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं—सड़क पर लड़ने वाले से लेकर स्वास्थ्य योद्धा तक.

अपने डॉ. श्रीकांत शिंदे फाउंडेशन के बैनर तले शिंदे ने महाराष्ट्र सरकार की कई योजनाओं के जरिये लाखों गरीब और जरूरमंद मरीजों को चिकित्सा सहायता हासिल करने में मदद की. अब राज्य के 36 में से 14 जिलों में उनका कामकाज फैल गया है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके काम की इतनी मांग है कि ग्रामीण सतारा में एक चाय दुकानदार ने फाउंडेशन के स्वास्थ्य विंग के कार्यालय के रूप में अपने परिसर को देने की पेशकश की.

शिंदे शादी से पहले आनुवंशिक टेस्ट को मुफ्त और अनिवार्य बनाने तथा स्कूलों में पल्मोनरी (फेफड़ों से संबंधित) रिस्पांस ट्रेनिंग को अनिवार्य बनाने की योजना बना रहे हैं. शिंदे पर्यावरण को लेकर भी उतने ही फिक्रमंद रहते हैं और उन्होंने अपने क्षेत्र में एक छोटा-सा जंगल लगाने के लिए सैकड़ों पौधे लगाने की पहल शुरू की है. सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध को लेकर उनके प्राइवेट मेंबर्स बिल ने इस विषय पर बहस छेड़ी और बाद में उस पर प्रतिबंध लगा दिया.

कल्याण से दो बार के सांसद शिंदे ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में रेल तथा इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर जोर दिया है. अंबरनाथ में एक शूटिंग रेंज खोलने की उनकी पहल रंग लाई और 11 निशानेबाजों ने इस साल राष्ट्रीय टीम में चयन के लिए क्वालिफाई किया है. मुंबई महानगर क्षेत्र में यह केवल दूसरी निशानेबाजी रेंज है. उन्हें लगता है कि एक चिकित्सक की बजाय राजनेता के रूप में वे लोगों की ज्यादा बेहतर सेवा कर सकते हैं. उनके क्षेत्र के लोग उनसे इत्तेफाक रखते होंगे.

— किरण डी. तारे

हरित पहल श्रीकांत ने इस साल सतारा में अपने खेत में चंदन, स्ट्रॉबेरी, चेरी और ब्लूबेरी के लगभग 10,000 पौधे लगाए हैं


भगवा स्टार
तेजस्वी सूर्या, 31 वर्ष
लोकसभा सांसद, भाजपा

 

भाजपा के लिए तेजस्वी सूर्या से बड़ा पैकेज और कोई नहीं हो सकता. वे आरएसएस स्वयंसेवक, एबीवीपी के सदस्य और युवा मोर्चा के नेता, कानून स्नातक, डिजिटल कौशल से लैस और पार्टी की विचारधारा के लिए प्रतिबद्ध शख्स हैं. उनकी इन्हीं क्षमताओं को देखते हुए भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण बेंगलूरू सीट का प्रतिनिधित्व करने के लिए छह बार के भाजपा सांसद और दिल्ली में पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरे अनंत कुमार की पत्नी तेजस्विनी की जगह तब 28 वर्ष के रहे सूर्या को चुना. नवंबर 2018 में अनंत कुमार का निधन हो गया था. सूर्या ने कांग्रेसी दिग्गज बी.के. हरिप्रसाद को 3,31,000 मतों से हराया और 17वीं लोकसभा में सबसे कम उम्र के भाजपा सांसद बने.

नए जमाने के राजनेताओं की तरह सूर्या भी इंटरनेट और सोशल मीडिया के जानकार हैं और ट्विटर पर उनके 10 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं. वे मिलनसार हैं और आप उन्हें किसी कॉफी शॉप में मतदाताओं के साथ बात करते हुए देखें हैरान न हों. वे भगवा एजेंडा के प्रति वफादार रहते हैं, चाहे कर्नाटक में एनआरसी की उनकी मांग हो या भाजपा को हिंदुओं की पार्टी कहना हो या नरेंद्र मोदी का विरोध करने वालों को 'भारत विरोधी ताकतों’ को मजबूत करने वाला बताना हो. वकील के रूप में उन्होंने उन लोगों का प्रतिनिधित्व किया जिन्हें भाजपा के मुताबिक, कांग्रेस सरकार ने निशाना बनाया था. शिक्षा उनके लिए एक और वजह है जो उनके दिल के करीब है; वे एराइज इंडिया नामक एनजीओ चलाते हैं. यह स्कूली शिक्षा के लिए काम करता है. महामारी के दौरान चिकित्सा सहायता और आवश्यक वस्तुओं को लोगों की दरवाजे तक पहुंचाने के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र में विशेष कोविड टास्क फोर्स का गठन किया था. आप समझ सकते हैं कि 2024 के आम चुनाव के लिए भाजपा का पसंदीदा उम्मीदवार कौन होगा?

—अमरनाथ के. मेनन
 

कला से प्यार: वे नौ साल के थे जब उन्होंने करगिल कोष में योगदान के लिए अपनी पेंटिंग बेची. वे कर्नाटक संगीत के प्रशिक्षित संगीतकार हैं और उन्हें बाइकिंग भी पसंद है

''स्कूल के दिनों से ही तेजस्वी सूर्या की किस्मत में राष्ट्रीय नेता बनना लिखा था. वे एक ऐसी ताकत हैं जिसे रोका नहीं जा सकता. वे हमेशा आगे बढ़ने के लिए तत्पर हैं ’’
-ए.एच. आनंद, प्रवक्ता, कर्नाटक भाजपा


कन्हैया कुमार, 34 वर्ष
बिहार के कांग्रेस नेता
कांग्रेस की नई उम्मीद

 

कन्हैया कुमार को अपनी पहली चुनावी जंग में भाजपा नेता गिरिराज सिंह के खिलाफ बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन इससे उनकी भाषण कला और हाजिरजवाबी की धार कुंद नहीं हुई है. फरवरी 2016 में अफजल गुरु की तीसरी बरसी पर राष्ट्र-विरोध नारे लगाने के आरोप में भाजपा सरकार ने उनपर राजद्रोह का मामला दर्ज करवा दिया था. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होना एक तार्कित प्रगति थी. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बेगूसराय में हार गए. फिर कांग्रेस की ओर से हाथ बढ़ाने के बाद उन्होंने पाला बदल लिया और 28 सितंबर को कांग्रेस में शामिल हो गए. 

हालांकि जो उन्हें एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में खारिज करने के लिए दौड़ पड़े, वे भाजपा नहीं बल्कि आरजेडी (राष्ट्रीय जनता दल) के थे. आरजेडी प्रवक्ता ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि कन्हैया कौन हैं. आरजेडी बिहार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है और अपने राजकुमार—लालू के छोटे बेटे और बिहार में विपक्ष के नेता—तेजस्वी यादव के सामने किसी भी तरह की चुनौती को बर्दाश्त नहीं करेगी. उधर, कांग्रेस नेताओं को सारी उम्मीदें पार्टी में नए शामिल हुए कन्हैया से है. कांग्रेस ने 1990 तक बिहार में शासन किया था और उन्हें उम्मीद है कि कन्हैया बिहार में कांग्रेस की किस्मत बदलेंगे.  

— अमिताभ श्रीवास्तव


कुशल वक्ता: कन्हैया ने बेगूसराय के सनराइज पब्लिक स्कूल में पढ़ाई के दौरान मदर टेरेसा पर अपनी पहली डिबेट जीती थी. उसका ईनाम था एक अंग्रेजी शब्दकोश.

नई नस्ल 100 नुमाइंदे
राजनीति

पाटीदारों की आवाज़
हार्दिक पटेल, 28 वर्ष
कार्यकारी अध्यक्ष, गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी

 

हार्दिक पटेल ने अपने युवा कंधों पर पूरे आंदोलन भार उठाया जिसने उन्हें पाटीदार नेता बना दिया. उनके खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए और इसने यही साबित किया कि वे मायने रखते हैं. राज्यों में अगली पीढ़ी के नेताओं को तैयार करने के अभियान में उन्हें शामिल करने के लिए यह पर्याप्त था. यह और बात है कि हार्दिक पार्टी की राज्य इकाई में अलग-थलग महसूस करने लगे और शिकायत की कि ''कांग्रेस ने उनकी क्षमता का इस्तेमाल नहीं किया.’’ करीब एक साल तक नाराज रहने के बाद लगता है हार्दिक ने अब एक योजना तैयार की है. अपने जनसंचार के कौशल का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने लोगों तक पहुंचने के लिए दो कार्यक्रम शुरू किए—नवंबर में जनचेतना महासम्मेलन, जिसका मकसद राज्य सरकार की 'गरीब विरोधी नीतियों’ को 'उजागर’ करना है. हार्दिक ने 2022 में पूरे गुजरात में लगभग 300 रैलियां आयोजित करने की योजना बनाई है. उसी साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं.
अक्तूबर में हार्दिक ने कोविड-19 पीड़ितों के परिवारों के साथ न्याय सुनिश्चित करने के लिए 'न्याय यात्रा’ शुरू की. उनका दावा है कि महामारी संभालने में सरकार की नाकामी की वजह से करीब दो लाख लोग मारे गए. वे हर उस परिवार से मिलने की योजना बना रहे हैं जिसने वायरस की वजह से अपने कम-से-कम एक सदस्य को खो दिया. उन्होंने अब तक 16,000 गांवों में 31,000 परिवारों से संपर्क किया है.

राज्य के 6 करोड़ की आबादी में से पाटीदार समुदाय की 1.25 करोड़ की अच्छी-खासी आबादी है. इस मजबूत समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हुए हार्दिक पटेल ने राज्य कांग्रेस अध्यक्ष के पद के लिए दावा ठोका है. लेकिन कांग्रेस ने यह जिम्मेदारी ओबीसी नेता जगदीश ठाकोर को दी और आदिवासी नेता सुखराम राठवा को विपक्ष का नेता नियुक्त कर दिया. ऐसे में उम्मीद है कि हार्दिक अपने मूल समर्थन आधार, पाटीदारों पर ध्यान केंद्रित करेंगे जिनकी इकलौती मजबूत आवाज होने का दावा वे करते हैं. तब तक भाजपा ने एक पाटीदार, भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाकर जो बढ़त हासिल की है, हार्दिक उसे बेअसर करना चाहते हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री पटेल को दिल्ली की कठपुतली बताकर और खुद को एकमात्र पाटीदार योद्धा के रूप में पेश करके शुरूआत की है. 

— किरण डी. तारे
 

योद्धा की छवि: भगवान राम के परम भक्त हार्दिक को तलवार, राइफल या पिस्तौल लेकर तस्वीर के लिए पोज देना पसंद है

''हार्दिक फाइटर हैं और उन्होंने लोगों का ध्यान खींचा है. उन्हें इस क्षेत्र के गुर आते हैं. वे गुजरात में अपना आधार पाटीदार समुदाय से बाहर भी फैला रहे हैं. वे बहुत आगे जाएंगे.’’
—जिग्नेश मेवाणी, गुजरात के विधायक

किंजरापु राम मोहन नायडू, 34 वर्ष
राष्ट्रीय महासचिव लोकसभा नेता, टीडीपी

संयोग से सियासत में
 

उनका कहना है कि उनके लिए पेशे के तौर पर राजनीति कभी विकल्प नहीं रही थी. उन्होंने पर्ड्यू यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री हासिल की और लॉर्निंग आइलैंड यूनिवर्सिटी से एमबीए (2011) किया. वे साल 2009 में एक निवेश कंपनी के लिए बिजनेस डिवलपर मैनेजर के रूप में काम कर रहे थे. लेकिन, नवंबर 2012 में उनके पिता और चार बार के सांसद तथा तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के संसदीय दल के नेता के. येरन नायडू की एक सड़क हादसे में दुखद मौत ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने साल 2014 के संसदीय चुनावों से पहले युवा राम मोहन को 2013 में उनके पिता के श्रीकाकुलम लोकसभा क्षेत्र का प्रभारी बनाया. उन्होंने कामयाबी हासिल की, और कैसे. अपने पिता के प्रति सहानुभित की लहर पर सवार होकर इस नौसिखुआ नेता ने 1,27,572 मतों के अंतर से जीत हासिल की. फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

वे कहते हैं, ''व्यक्तिगत तौर पर, उस उम्र में अपने पिता को खोना दुनिया के अंत जैसा महसूस हुआ. लेकिन, मैं अपने पिता की उस विरासत से अभिभूत था जिसे उन्होंने अपने 30 साल से ज्यादा के सियासी सफर में बनाया था.’’ आर.के. पुरम के दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ाई और केंद्रीय मंत्री के रूप में अपने पिता के कार्यकाल के दौरान वे संसद और सांसदों से रू-ब-रू हो चुके थे, लेकिन खुद राजनीति में शामिल होना एक अलग बात थी. वे शायद ही कभी लोकसभा सत्र में मौजूद रहने से चूकते हैं.   

—अमरनाथ के. मेनन

ड्यूटी पर डैडी : जनवरी, 2021 में राम मोहन ने लोकसभा के बजट सत्र से नौ दिनों का पितृत्व अवकाश लिया था

''राममोहन अपने निर्वाचन क्षेत्र और संसदीय काम में अच्छा संतुलन रखते हैं. उनका हिंदी, तेलुगू और अंग्रेजी में दक्ष होना मददगार है ’’
—अशोक गजपति राजू, पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री


नई नस्ल 100 नुमाइंदे
राजनीति

उभरता युवा दलित नेतृत्व 

चंद्रशेखर आजाद, 35 वर्ष
संस्थापक भीम आर्मी, राष्ट्रीय अध्क्षक्ष, आजाद समाज पार्टी

 

पश्चिमी यूपी के सहारनपुर जिले के शब्बीरपुर गांव में 9 मई, 2017 को दलितों और सवर्णों के बीच हिंसा की घटना सुर्खियां बनी थी. इस दौरान पहली बार भीम आर्मी नाम का संगठन चर्चा में आया था. भीम आर्मी भारत एकता मिशन नाम के इस संगठन की स्थापना 2011 में दलित नेता चंद्रशेखर ने शब्बीरपुर के कुछ दलित युवाओं को साथ लेकर की थी. भीम आर्मी सहारनपुर और आसपास के जिलों में दलितों के उत्थान के लिए काम कर रही थी. दलितों के मुद्दों को लगातार आक्रामक ढंग से उठाकर चंद्रशेखर और उनकी आर्मी दलित युवाओं को अपनी ओर खींच रही थी. पंजाब और हरियाणा में भी इससे जुड़े युवा दलितों की खासी तादाद है. शब्बीरपुर कांड के बाद दलितों के मुद्दे लेकर चंद्रशेखर यूपी की योगी सरकार के खिलाफ मुखर हो गए. प्रदेश में कहीं भी दलितों पर अत्याचार की खबर मिलने पर चंद्रशेखर सबसे पहले मौके पर पहुंचकर पीड़ित को हरसंभव मदद की कोशिश करते हैं. बसपा संस्थापक कांशीराम के जन्म दिन 15 मार्च, 2020 को उन्होंने नए सियासी दल आजाद समाज पार्टी का गठन कर 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. 

—आशीष मिश्र

कानूनी मदद पेशे से वकील चंद्रशेखर ने ऐसे युवाओं की एक टीम तैयार की है जो किसी दलित पर अत्याचार होने पर उसे नि:शुल्क मदद करती है

'' चंद्रशेखर बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती की निष्क्रियता के चलते दलितों के बीच उत्पन्न खाली जगह को भरने की कोशिश कर रहे हैं’’
—स्नेहवीर पुंडीर, विभागाध्यक्ष, राजनीतिशास्त्र विभाग, डीएनपीजी कॉलेज, मेरठ

इरादों से अमीर
चंदना बाउरी, 30 वर्ष
भाजपा विधायक, पश्चिम बंगाल

 

बांकुड़ा जिले के अपने गांव केलई में महिला मोर्चा की महासचिव के रूप में, उन्होंने भाजपा का ध्यान उस वक्त खींचा, जब वे सदस्यता अभियान में ग्रामीणों को शामिल करने के लिए घर-घर गईं. उन्होंने पार्टियों के बीच आपसी हिंसा के बावजूद पड़ोसी गांवों के दो उम्मीदवारों को 2018 में पंचायत चुनाव जीतने में मदद की.

इसलिए जब भाजपा पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की तलाश कर रही थी, वे पार्टी की स्वाभाविक पसंद बनीं, खासकर तब जब ममता बनर्जी ने 50 महिलाओं को मैदान में उतार दिया था. एक दिहाड़ी मजदूर की पत्नी और तीन बच्चों की मां चंदना उम्मीद पर खरी उतरीं और उन्होंने साल्टोरा विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के संतोष मंडल को हराकर पहला चुनाव जीता. वे भाजपा के उन 77 उम्मीदवारों में से एक थीं जो बंगाल में टीएमसी की जबर्दस्त जीत के बावजूद अपनी सीट निकालने में कामयाब रहे.  

भाजपा विधायक होने के बावजूद चंदना की सादी जीवन शैली में शायद ही कोई बदलाव आया हो. वे अब भी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बिना प्लास्टर वाली दीवारों और बिना खिड़की के शीशे के एक साधारण घर में रहती हैं. वे विधायक के तौर पर अपना वेतन खुद पर खर्च नहीं करतीं. वे उन परिवारों की मदद करना चाहती हैं जो बहुत गरीब हैं और अपनी बेटियों की शादी नहीं कर सकते हैं या चिकित्सा का खर्च उठाने में असमर्थ हैं. गरीब होने का क्या मतलब होता है, उनसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता.

—रोमिता दत्ता

बिना शौचालय का आवास
उनके घर में शौचालय नहीं हैं. घर के पीछे जो शौचालय है उसे उन्हें अपनी सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ जवान के साथ साझा करना पड़ता है.

''गरीबों के उत्थान के लिए काम करने का उनका उत्साह मुझे हैरान कर देता है जबकि वे खुद की जरूरतें भी पूरी नहीं कर पातीं.’’
-मिहिर गोस्वामी, भाजपा विधायक, कूच बिहार (दक्षिण)

राघव चढ्ढा, 33 वर्ष
(विधायक, आम आदमी पार्टी)
राजेंद्र नगर, दिल्ली

 

सियासत में एक ताजा सुर
 

राघव चढ्ढा की टैगलाइन है: 'उन्होंने राजनीति को नहीं, राजनीति ने उन्हें चुना है.’ आम आदमी पार्टी के टिकट पर फरवरी 2020 में पहली बार दिल्ली के राजेंद्र नगर से विधायक चुने गए चढ्ढा पार्टी के कद्दावर नेताओं में शुमार हैं. वे पार्टी प्रवक्ता भी हैं. पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट राघव ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उच्च शिक्षा प्राप्त की. चढ्ढा राजनीति में आ तो गए हैं लेकिन वर्षों से देश की राजनीति का जो पराभव हुआ है वह उन्हें एक बड़ी चुनौती दिखता है. परिवारवाद को वे राजनीति का सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं. वे दो टूक कहते हैं, ''देश की 65 फीसद आबादी युवा है, लेकिन राजनीति में गांधी, सिंधिया, पायलट, पटनायक, चौटाला, बादल ही क्यों हैं? बिना परिवार या गॉड फादर के राजनीति में कोई नहीं आ सकता, यही वह बैरियर है जिसे तोडऩा है.’’ उनकी मानें तो राजनीति के प्रति लोगों के मन में नफरत इसीलिए है क्योंकि इसमें वही हैं जो बेरोजगार या किसी रोजगार के लायक नहीं हैं. वे युवाओं से कहते हैं कि इस स्थिति से हार नहीं माननी, इसे बदलना है. वे लोगों से भी आग्रह करते हैं कि राजनीति को इस गर्त से निकालने के लिए घर के पढ़े-लिखे, कर्मठ बच्चों को राजनीति में आने दें. 

—सुजीत कुमार ठाकुर

''राघव उन पढ़े-लिखे और कर्मठ युवाओं के लिए एक उदाहरण हैं जो स्वच्छ एवं लोकतांत्रिक राजनीति में पदार्पण करना चाहते हैं.’’
—संजय सिंह, राज्यसभा सांसद, आम आदमी पार्टी
 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें