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जलवायु परिवर्तनः ऊर्जा व्यवस्था की साफ-सफाई

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग में भारत की असली चुनौती बुनियादी ढांचे का निर्माण नहीं, बल्कि यह तय करने की होगी कि निपट निर्धन व्यक्ति भी 'स्वच्छ' ऊर्जा की कीमत चुका सके

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जलवायु परिवर्तन जलवायु परिवर्तन

सुनीता नारायण

जब मामला जलवायु परिवर्तन का हो तो इस चुनौती से लड़ने के लिए दुनिया और भारत के तरीके में तीन हकीकतें शामिल होनी चाहिए. पहली बात, हमें जीवाश्म ईंधनों को जलाने से उत्पन्न उत्सर्जन की वजह से विकट होती जलवायु की हकीकत को स्वीकार करना चाहिए, जिससे पूरी दुनिया में तबाही मची हुई है. इसलिए दुनिया को फौरन तेज रफ्तार से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए काम करना चाहिए. इस पर कोई तर्क-वितर्क नहीं होना चाहिए.

दूसरी बात, मुख्यत: जीवाश्म ईंधनों को जलाने से उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैस आर्थिक वृद्धि से जुड़े हैं और इससे भी अहम बात यह है कि वायुमंडल में ये उत्सर्जित गैस लंबे समय तक बनी रहती हैं. लिहाजा, जब दुनिया उत्सर्जनों से निबटने की बात करती है तो वह राष्ट्रों और पीढ़ियों के बीच साझेदारी पर चर्चा करती है. इसीलिए उत्सर्जन कम करने के लिए वैश्विक कार्रवाई अलग और इस समस्या में विभिन्न देशों के योगदान पर आधारित होनी चाहिए. जलवायु न्याय कोई नैतिक नहीं बल्कि जरूरी पूर्व शर्त होनी चाहिए.

तीसरी बात, भारत जैसा देश, जिसने वायुमंडल में भारी प्रदूषण नहीं फैलाया है बल्कि खुद जलवायु परिवर्तन का शिकार है—हमारी दुनिया में आज भीषण उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों या विकट मौसम और अत्यधिक बारिश की वजह से गरीब सबसे ज्यादा प्रभावित हैं—को अपने हित में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए. भारत को न सिर्फ पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन से बचाने के लिए ऐसा करना चाहिए बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना चाहिए कि तेजी से बिगड़ते पर्यावरण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले खराब प्रभाव को कम किया जा सके. 

यहीं हमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उन घोषणाओं को मानना चाहिए जो उन्होंने हाल में ग्लासगो में आयोजित क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस (कॉप26) में की थी. वहां सबसे अहम वादा यह किया गया कि भारत 2030 तक अपनी ऊर्जा जरूरतों का 50 फीसद हिस्सा अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से हासिल करेगा. यह बहुत बड़ी बात है—इस पर कोई सवाल नहीं है. हकीकत यह है कि ऊर्जा व्यवस्था में बदलाव करके ही दुनिया में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग लड़ी जाएगी. इस तरह से भारत यह कह रहा है कि भविष्य में उसका ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर 'हरित' होगा—देश कोयले का इस्तेमाल नहीं छोड़ेगा लेकिन इस काले हीरे पर अपनी निर्भरता को जबरदस्त रूप से कम कर देगा, जिसे जलवायु परिवर्तन करने वाली गैसों के लिए जिम्मेदार माना जाता है.

अब आंकड़ों पर नजर डालते हैं. फिलहाल, अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए भारत की कोयले पर निर्भरता बहुत ज्यादा है—2019 में कोयला आधारित बिजली स्थापित क्षमता की 63 फीसद थी और उससे देश की 80 फीसद ऊर्जा जरूरत पूरी हुई. लेकिन अगर इस योजना को कामयाब बनाना है तो 2030 तक देश को यह स्थिति बदलनी होगी. केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के मुताबिक, कोयला आधारित ऊर्जा पर निर्भरता करीब 56 फीसद कम हो जाएगी और बाकी जरूरतें अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से पूरी की जाएंगी. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारत को अपने मौजूदा अक्षय या नवीकरणीय ऊर्जा पोर्टफोलियो को 100 गीगावाट से बढ़ाकर 2030 तक 650-700 गीगावाट करना होगा जबकि कोयला आधारित ऊर्जा 280 गीगावाट होगी यानी अभी से मामूली तौर पर ज्यादा. यह बहुत बड़ा काम लगता है और ऐसा लगना भी चाहिए. लेकिन यह मुमकिन है बशर्ते हम सोच-समझकर और कल्पनाशीलता के साथ योजना बनाएं.

हकीकत यह है कि हमें अपने करोड़ों लोगों के जरूरी जीविकोपार्जन और उनकी आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए अपनी ऊर्जा व्यवस्था में आमूल बदलाव की जरूरत है. आज भारत की ऊर्जा व्यवस्था इतनी बिखरी हुई है कि यह सबसे सस्ती ऊर्जा उत्पादन—कोयला आधारित ताप बिजली—को अपनाकर उसकी आपूर्ति करता है लेकिन वास्तव में वह दुनिया में सबसे महंगी हो जाती है. इसकी कई वजहें हैं; विकृत सब्सिडी व्यवस्था से लेकर, जिससे अंतत: उन्हीं गरीबों और किसानों का कोई फायदा नहीं होता जिनके नाम पर उसे दिया जाता है, से लेकर बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की नाकामियां और बड़े पैमाने पर चोरी शामिल हैं.

लेकिन नतीजा यह है कि भारत ऊर्जा निर्धनता से विचलित है क्योंकि करोड़ों लोग अब भी अंधेरे रहते हैं और महिलाएं जलावन वाले चूल्हों पर खाना बना रही हैं, जो उनकी खुद की सेहत के लिए खराब है. दूसरी ओर, अपेक्षाकृत अमीर उपभोक्ता उसी बिखरी ऊर्जा व्यवस्था से बाहर जाकर जेनरेटरों के लिए डीजल से लेकर बॉयलर और कैप्टिव बिजली संयंत्रों के लिए कोयला और पेटकोक जैसे उससे भी ज्यादा गंदे विकल्प अपना लेते हैं. इन सबका स्वास्थ्य पर जानलेवा असर पड़ता है क्योंकि कोयले का इस्तेमाल बेहद प्रदूषणकारी बिजली संयंत्रों और कैप्टिव बिजली संयंत्रों में बढ़ता है. यह सस्ता या टिकाऊ नहीं है. इसे बदलना ही होगा.

यहीं नई ऊर्जा व्यवस्था अपनी भूमिका निभा सकती है. लेकिन इसके लिए निवेश की जरूरत है, वह भी सिर्फ बुनियादी ढांचे के निर्माण में नहीं बल्कि स्वच्छ और सक्षम वितरण तथा आपूर्ति नेटवर्क को फिर तैयार करने के लिए. असली चुनौती बुनियादी ढांचे का निर्माण करना नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि निर्धनतम व्यक्ति भी 'स्वच्छ' ऊर्जा की कीमत चुका सके. समस्या का केंद्र यही है. हमें यह देखने के लिए कि स्वच्छ ऊर्जा किस तरह से सस्ती हो सकती है, अक्षय ऊर्जा से परे देखने की जरूरत है ताकि समावेशी विकास हो सके. यह जलवायु वित्त पोषण के इस्तेमाल का मौका है ताकि यह न केवल स्वच्छ ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण के लिए धन दे बल्कि उस लागत में अंतर की भी भरपाई करे जिससे इस ऊर्जा को सबके लिए सुलभ बनाया जाएगा.

लिहाजा, 2022 में क्या करने की जरूरत है? सबसे पहले तो हमें देश में जलवायु परिवर्तन के लिए कार्रवाई करने की जरूरत है. इसे 'सामान्य' होना चाहिए और भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक सेक्टर के लिए उत्सर्जन के विकल्प तैयार होने चाहिए तथा यह भी तय होना चाहिए कि हम बदलाव की निशानदेही कैसे करेंगे. हम हमेशा ऐसा करने के अनिच्छुक रहे हैं, ऐसा होने पर यह हमें उत्सर्जन कटौती के वैश्विक लक्ष्यों से बांध देगा. लेकिन हमें यह पीड़ा बर्दाश्त करनी होगी. हमें मालूम है कि आज प्रदूषण फैलाए बगैर, हमारे सामने विकास को नए सिरे से गढऩे के विकल्प हैं. हम अपने उद्योग और शहर में आवाजाही के इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाते हुए अपनी ऊर्जा तैयार करेंगे. लिहाजा, यह इसे ज्यादा संसाधन सक्षम, ज्यादा सस्ता और नतीजतन ज्यादा टिकाऊ बनाने के लिए रिडिजाइन करने का मौका है. इस योजना के लिए आंकड़ों और 2030 तक की योजना बनाने और इसकी लागत जानने की जरूरत है—फंडिंग की यह जरूरत महत्वपूर्ण है क्योंकि जलवायु वित्त पोषण को इस बदलाव का हिस्सा होना है.

साल 2022 का दूसरा एजेंडा जलवायु परिवर्तन के भीषण प्रभावों—बेहद बारिश की वजह से बाढ़ और अल्प वर्षा की वजह से सूखे से लेकर ट्रॉपिकल चक्रवातों या मौसम के दूसरे बदलावों की संख्या में वृद्धि—को दूर करने के लिए रणनीति तैयार करना है. हमें इन बदलावों को रोकने के लिए और वह भी जल्दी रोकने के लिए हस्तक्षेप की रणनीतियों की जरूरत है. मिसाल के तौर पर, किसानों को फसल की बर्बादी के लिए ज्यादा मुआवजे की जरूरत है और सरकार को इस चुनौती से निबटने के लिए बीमा योजना पर फिर से काम करना चाहिए.

फिर हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि बारिश होने पर हमारे शहर डूब न जाएं—इसके लिए शहरी नवीकरण कार्यक्रम के तहत बस्तियों में झील, तालाब और हरित क्षेत्रों के संरक्षण पर ध्याना दिया जाना चाहिए. लेकिन सबसे बड़ा गेमचेंजर ग्रामीण भारत में जल संरक्षण और जीविकोपार्जन के हरित साधनों में निवेश करके बार-बार के झटकों के खिलाफ लचीलेपन की क्षमता विकसित करना होगा. मैं और भी उपाय बता सकती हूं. लेकिन 2022 में असली बदलाव यह होगा कि हम वजूद के इस खतरे के प्रति गंभीर हो जाएं.

सुनीता नारायण डाउन टु अर्थ की संपादक और सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरनमेंट की डायरेक्टर हैं

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