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विशेषांकः मैदान की बाजी बदली

देश में बेशक क्रिकेट की दीवानगी सिर चढ़कर बोलती है, लेकिन धीरे-धीरे ही सही अन्य खेलों के दरवाजे भी खुलने लगे

सुनहरे पदक की तलाश सुनहरे पदक की तलाश

इस विडंबना को क्या कहेंगे! 1948 के लंदन ओलंपिक खेलों में प्रतिष्ठित हॉकी स्वर्ण पदक जीतने के 73 साल और कुआलालंपुर में विश्व कप हॉकी चैम्पियनशिप (1975) जीतने के 46 साल बाद, भारतीय टीम अब अपने 'राष्ट्रीय खेल' में शीर्ष तीन में जगह बनाने के लिए जूझ रही है. हालांकि कई दशकों से क्रिकेट के जुनून ने देश में हॉकी को पूरी तरह से पीछे कर दिया है. यहां खिलाड़ी बनने की आकांक्षा रखने वालों और आम जनता दोनों के, दिलो-दिमाग पर क्रिकेट का एक तरह से कब्जा है लेकिन वैश्विक स्तर पर देखें तो पाएंगे कि इसकी कोई खास धमक नहीं है.

इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) के पूर्व सीओओ सुंदर रमन की 'विश्व क्रिकेट और भारतीय खेलों के राजस्व पर कोविड-19 का प्रभाव' शीर्षक रिपोर्ट के अनुसार देश की खेल अर्थव्यवस्था में लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा क्रिकेट का है (इसमें आइपीएल की हिस्सेदारी प्रमुख है), इसके बाद फुटबॉल और कबड्डी दूसरे स्थान के लिए होड़ करते हैं. देश में खेल कमाई का बड़ा हिस्सा प्रसारण और प्रायोजकों से आता है जिनका योगदान क्रमश: 65 फीसद और 30 फीसद है, जबकि टिकट के माध्यम से केवल 5 प्रतिशत कमाई होती है. टिकटों के माध्यम से प्राप्त होने वाली इस 5 प्रतिशत कमाई में महत्वपूर्ण हिस्सा आइपीएल मैचों के लिए टिकट बिक्री से हासिल होता है.

मैदान की बाजी बदली
मैदान की बाजी बदली

नतीजतन अन्य सभी खेल प्रचार, अत्याधुनिक खेल के मैदानों सहित बुनियादी ढांचा विकसित करने और घरेलू मुकाबलों के साथ विदेश में होने वाली प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए मोटे तौर पर सरकार पर निर्भर हैं. यही वजह है कि खिलाडिय़ों ने टीम खेलों की बजाय बैडमिंटन, निशानेबाजी, भारोत्तोलन, यहां तक कि कुश्ती जैसे एकल मुकाबले वाले खेलों में बेहतर प्रदर्शन किया है और चैंपियन बने हैं.

फिटनेस को बढ़ावा देने और कम उम्र से ही बच्चों को खेलों के प्रति आकर्षित करने के लिए कारगर अभियान के न होने से खेलों में पर्याप्त रुचि का अभाव है. गाजियाबाद के इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी में स्पोर्ट्स रिसर्च सेंटर के प्रमुख कनिष्क पांडे ने खेलों को मौलिक अधिकार की सूची में डालने की मांग वाली जनहित याचिका 2018 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की. वे कहते हैं कि देश की 1.25 अरब आबादी में से 5.56 फीसद ही ''खेल साक्षर'' या खेलों के बारे में जागरूक है. इसके विपरीत, अमेरिका में लगभग 20 प्रतिशत लोग खेल साक्षर हैं. अकेले चीन में एक करोड़ से अधिक लोग बैडमिंटन खेलते हैं. खेलों में इतनी कम दिलचस्पी और भागीदारी के पीछे एक बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत को बहुत कम पदक मिलना भी है.

कमाई और रोजगार की दृष्टि से खेल को विश्व के बड़े उद्योगों में से एक माना जाता है. खेलों को एक व्यवसाय के रूप में लेने के बढ़ते चलन के साथ कई विकसित देशों में एथलीटों, कोच और ट्रेनर के अलावा कई अन्य प्रकार के कैरियर प्रोफाइल के साथ लोग इससे जुड़ रहे हैं. कुल रोजगार में खेलों का योगदान लगभग दो से चार फीसद तक होता है. हालांकि भारत में फिलहाल कुल रोजगार में खेल का योगदान सिर्फ 0.05 प्रतिशत है. आइपीएल, हॉकी इंडिया लीग, इंडियन बैडमिंटन लीग, प्रो कबड्डी और इंडियन सुपर लीग (फुटबॉल) जैसी पहल के साथ, भारतीय खेल परिदृश्य बदल रहा है और साबित कर रहा है कि कई खेलों के लिए देश में एक व्यवसाय के रूप में अच्छा भविष्य है.

युवा प्रतिभाओं को तलाशने और प्रशिक्षित करने के लिए व्यापक रोडमैप, अत्याधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं में लैश प्रशिक्षण कार्यक्रम तय करने, चोटी के विदेशी कोच और खेल चिकित्सा विशेषज्ञों को जोड़ने, देश में उभरते कोचों के स्तर को बेहतर करने, डोपिंग पर रोक और खिलाडिय़ों को विदेशों में खेलने के अवसरों की व्यवस्था करके प्रतिस्पर्धा के माहौल से परिचित कराने में सक्षम बनाना ही आगे का रास्ता है.

पेशेवर सक्षम प्रशिक्षकों के प्रबंधन में प्रशिक्षण अकादमियों की संख्या बढऩे से कई खेलों में भारत का स्तर सुधरा है. अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के बढ़ते अवसरों से युवा होनहार खिलाडिय़ों के लिए भी अपना हुनर दिखाने के मौके बढ़े हैं. विकास की दौड़ में पिछड़ गए खेलों के व्यावसायीकरण, पुराने खेलों को पेशेवराना तरीके बढ़ाने की कोशिशें और खेलों में कॉर्पोरेट क्षेत्र के निवेश बढऩे जैसी पहल के बाद, भारत की क्षमता का सही दोहन करते हुए खेल उद्योग उम्मीद कर सकता है कि अगले दो से तीन दशकों में भारत एक खेल शक्ति बनेगा और उसके दिन बहुरेंगे. हालांकि यह तभी होगा, जब लोगों के साथ सरकार की प्राथमिकताएं भी बदलेंगी. सरकार खेल प्रोत्साहन में गंभीर होगी. अगर सिर्फ बाजार के हवाले छोड़ा गया तो क्रिकेट ही बढ़ेगा.

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