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विशेषांकः अंतरात्मा की आवाज

कोलकाता की एक युवती अपनी पाक कला और अपने पैसों से भोजन की व्यवस्था करके कोविड के मरीजों की सेवा में जुटी.

सेवा भाव:  श्रावस्ती घोष वितरण के भोजन पैक करती हुईं सेवा भाव:  श्रावस्ती घोष वितरण के भोजन पैक करती हुईं

श्रावस्ती घोष अप्रैल के महीने में कोविड के मरीजों के लिए अस्पताल में बेड और ऑक्सीजन सिलिंडर की व्यवस्था कराने में लगी हुई थीं. वे मरीजों के लिए दवाइयों और दूसरी जरूरी चीजों की भी व्यवस्था कर रही थीं. लेकिन देर रात एंबुलेंसों के सायरन की आवाज ने उन्हें बेचैन कर रखा था रखा था और उन्हें लग रहा था कि वे चाहकर भी इस महामारी में लोगों के लिए कुछ खास नहीं कर पा रहीं. उन्हें अपराध बोध-सा हो रहा था. तभी उन्हें आइडिया आया कि क्यों न मरीजों के लिए मुफ्त में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाए.

घोष की मां अजंता ने उन्हें सलाह दी कि काम शुरू करने से पहले उन्हें पैसों की व्यवस्था करनी चाहिए. घोष कहती हैं, ''पर मैं बेचैन होती जा रही थी. मुझे लगा कि लोग मर रहे हैं, ऐसे में मैं समय बर्बाद नहीं कर सकती.’’ नृत्य और रंगमंच से जुड़ीं श्रावस्ती शहर के कला संगठन कोलकाता सेंटर फॉर क्रिएटिविटी में काम करती हैं. उन्होंने 27 अप्रैल को फेसबुक पर एक पोस्ट डालकर घर पर रह रहे कोविड मरीजों के लिए खाने के रोज 15 पैकेट देने की पेशकश की.

घोष कहती हैं, ''कुछ ही घंटों के भीतर मेरी पोस्ट को 1,000 बार शेयर किया गया और मेरा फोन बजना शुरू हो गया.’’ उस दिन शाम को घोष की मां जैसे ही काम के बाद घर पहुंचीं, दोनों बाजार गईं और सब्जी आदि खरीदने में लग गईं. उधर, घोष के पिता सुबीर खर्चों का हिसाब लगाने में लग गए. उन्होंने पाया कि 15-20 मरीजों का भोजन तैयार करने में हर रोज 1,000-1,500 रु. का खर्च आएगा.

मेन्यू सादा ही रखा गया—लंच और डिनर के लिए चावल, दाल, सब्जी और मछली या अंडा. घोष मां के साथ पकाती हैं और उनके पिता पैकिंग संभालते हैं. भोजन पहुंचाने के लिए उन्होंने दोस्तों की मदद ली. घोष मुफ्त में यह सेवा जारी रखना चाहती हैं: ''आप किसी बुजुर्ग या ऐसी महिला से खाने का पैसा कैसे मांग सकती हैं जिसका पति लॉकडाउन के कारण बेरोजगार हो गया हो?’’

शुभचिंतकों से अब उनके पास दो लाख रु. जुट गए हैं. इससे वे अगले दो हफ्तों तक रोज 100 पैकेट उपलब्ध करा सकती हैं. इस बीच उनका मोबाइल लगातार बजता रहता है, नोटपैड भी नाम/पतों से भरता जा रहा है. घोष कहती हैं, ‘‘एक छोटा-सा प्रयास भी अहम होता है.’’ ठ्ठ

‘‘जैसे ही मुझे लगता है कि अब मैं थक रही हूं वैसे ही मुझे ख्याल आता है कि अभी कितने लोग बचे हुए हैं, जिन तक मदद पहुंचनी बाकी है बस मुझमें नई ऊर्जा आ जाती है’’

श्रावस्तवी घोष
श्रावस्ती घोष, 26 वर्ष, नृत्यांगना और रंगकर्मी, कोलकाता 
उन्होंने क्या किया कोविड के मरीजों के लिए 28 अप्रैल, 2021 से अब तक घर के बने खाने के  2,000 पैकेट मुफ्त बांटे

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