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विशेषांकः पचास की उम्र नौकरी बदलने की नहीं होती...

उसने (राजनीति में उतरने) मेरी जिंदगी बदल दी. न केवल मैंने उस चुनाव को जीता, उसने मेरे जीवन में घटी बहुत-सी अच्छी और बुरी घटनाओं के लिए मार्ग प्रशस्त किया. उससे मुझे बहुत अशांति और महान संतुष्टि दोनों हासिल हुई''

नई पारी 2009 में तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट से चुनाव जीतने के बाद नई पारी 2009 में तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट से चुनाव जीतने के बाद

तीन बार के सांसद और देश की सबसे जानी-पहचानी सार्वजनिक आवाजों में से एक, शशि थरूर ने चार दशकों के लंबे करियर में कई उपलब्धियां अपने नाम की हैं. 1978 और 2007 के बीच, वे संयुक्त राष्ट्र में एक करियर डिप्लोमैट थे और तरक्की करते हुए संचार तथा सार्वजनिक सूचना के अवर-महासचिव के पद तक पहुंचे. 2009 में, उन्होंने राजनीति में उतरने का फैसला किया, तिरुवनंतपुरम से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत गए.

निपुण लेखक थरूर ने एक दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं जिसमें काल्पनिक कथाओं से लेकर राजनैतिक मामलों और दर्शन तक, पर किताबें शामिल हैं. ट्विटर पर लगभग 80 लाख फॉलोवर्स के साथ सोशल मीडिया पर उनकी व्यापक फॉलोइंग है. हालांकि माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट पर टिप्पणियां अक्सर उन्हें विवादों में डालती हैं.

''चर्चा से दूर रहने वाले नौकरशाह'' से लगातार जनता की निगाह में रहने वाले विद्वान के रूप में उनका उदय 2006 में तब हुआ जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के लिए भारत के उम्मीदवार के रूप में उन्हें मैदान में उतारने का निर्णय लिया था. पीएमओ ने उन्हें एक साल पहले सितंबर में ही इसके लिए तैयारियां शुरू करने के संकेत दे दिए थे लेकिन सरकार बाद में इस विचार से पीछे हट गई. जून 2006 तक, खुद थरूर भी समझ चुके थे कि यह संभव नहीं हो सकेगा. लेकिन वे तब हैरान रह गए जब एक दिन उन्हें तत्कालीन विदेश सचिव श्याम सरन का फोन आया कि आज उनकी उम्मीदवारी की घोषणा की जा रही है.

थरूर कहते हैं, ''यह कई मायनों में महत्वपूर्ण मोड़ था. संयुक्त राष्ट्र में, मुझे राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों सहित दुनिया की कुछ सबसे प्रसिद्ध हस्तियों के निकट रहने का अवसर मिला. लेकिन यह बहुत हद तक एक व्यक्ति के रूप में था, जो एक टीम और एक संस्थान का हिस्सा था. इस भूमिका से आपको व्यक्तिगत रूप से कोई विशेषाधिकार नहीं मिलता. संयुक्त राष्ट्र जैसी बड़ी संस्था और उसके आदर्शों के प्रतिनिधित्व का दायित्व निभाना था. अचानक, मुझे एक व्यक्तिगत उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट किया जाने वाला था, जो न केवल संयुक्त राष्ट्र के आदर्शों के लिए खड़ा है, बल्कि एक देश की सरकार की ओर से ऐसा करने वाला है और उस संस्थान का नेतृत्व करना चाहता है.''

थरूर 22 साल के थे जब वे संयुक्त राष्ट्र से जुड़े. उन्होंने महसूस किया कि इस विश्व निकाय में विभिन्न क्षमताओं में काम के लंबे अनुभव ने उन्हें महासचिव पद के लिए 'असामान्य तरीके से' सुसज्जित किया. हालांकि, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ओर से कराए गए चार में से प्रत्येक खंड के चुनाव में वे दक्षिण कोरिया के बान की मून के बाद दूसरे स्थान पर रहे और परिषद के एक स्थायी सदस्य अमेरिका ने वीटो भी किया था. थरूर ने अंतत: यह महसूस करके अपना नामांकन वापस ले लिया कि ये नौकरियां ''सबसे योग्य व्यक्ति होने'' से नहीं मिलतीं. वे कहते हैं, ''यह एक राजनैतिक संस्थान में एक राजनैतिक वोट का मामला है. राजनैतिक चयन विभिन्न सरकारें करती हैं.''

2007 में संयुक्त राष्ट्र से इस्तीफा देने के बाद, थरूर के सामने अचानक अपने करियर और जीवन के लिए कोई दिशा चुनने की चुनौती आ खड़ी हुई. वे बताते हैं, ''जिस करियर में मैं लगभग 29 वर्षों तक बड़ी सहूलत के साथ काम करता रहा, वह अचानक तब समाप्त होने वाला था जब मैंने अपना केवल 50वां जन्मदिन मनाया. यह नई नौकरी खोजने की कोई आदर्श उम्र नहीं है.'' फिर भी, उन्हें उस चुनाव में हार का कोई पछतावा नहीं है. थरूर कहते हैं, ''मैंने संयुक्त राष्ट्र में अपने करियर को केवल एक दशक और लंबा करने के लिए भारत सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया होता, तो यह मेरी बहुत बड़ी भूल होती. मन में हमेशा सवाल उठता कि अगर मैंने कोशिश की तो क्या हुआ? मैंने कोशिश की, अपना सर्वश्रेष्ठ दिया, अलग बात है कि असफल रहा.''

इस असफलता ने थरूर की राजनैतिक पारी की नींव रखी. 2009 में, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट की पेशकश की. थरूर कहते हैं कि यह मेरे लिए आश्चर्य की बात थी, क्योंकि वे न ''किसी राजनैतिक परिवार से हैं, न ही तब राजनीति में कोई गॉडफादर था, और न ही कभी किसी नेता के प्रिय विश्वासपात्र रहे थे.'' उनका दावा है कि भाजपा और वामपंथी दलों ने भी उनसे संपर्क साधा था. उन्हें याद दिलाया गया था कि वे कांग्रेस के कोटा लाइसेंस राज और इमरजेंसी के बड़े विरोधी रहे हैं. थरूर कहते हैं, ''मेरे लेखन में लगातार एक बहुलतावादी भारत की दृष्टि रही थी और मैंने अपने देश की विविधता पर हमेशा गर्व किया है. भाजपा का हिंदुत्व एक ऐसा बोझ था जिसे ढोने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी और वामपंथी आर्थिक सोच मुझे खास पसंद नहीं आती थी.''

बिना ज्यादा सोचे-विचारे कि उनके फैसले का क्या असर होगा, थरूर ने सोनिया की पेशकश स्वीकार कर ली. वे कहते हैं, ''उसने मेरी जिंदगी बदल दी. न केवल मैंने उस चुनाव को जीता, उसने मेरे जीवन में घटी बहुत-सी घटनाओं—अच्छी और बुरी दोनों—के लिए मार्ग प्रशस्त किया. उसने मुझे बहुत अशांति और महान संतुष्टि दोनों प्रदान की.''

थरूर को लगता है कि संयुक्त राष्ट्र का चुनाव लड़ना और राजनीति में कदम रखना दोनों ही ऐसे जोखिम थे जिन्हें उठाया जाना चाहिए था और उन्होंने उठाया. वे कहते हैं, ''उन प्रस्तावों को न कहने का मतलब होता कि मैं खुद से यह कहता कि चुनौतियां स्वीकारने का मुझमें माद्दा नहीं है. कभी न कभी, मैं पीछे मुड़कर देखता और खुद से यह सवाल पूछता—क्या मुझमें साहस की कमी है कि इस तरह मैं अपना आत्मविश्वास खो देता?'' और सफलता का यही मंत्र थरूर हर युवा और आकांक्षी व्यक्ति को देते हैं: ''आप जो हो सकते हैं उसमें भी सर्वश्रेष्ठ होने की कोशिश करें. आप जो होना चाहते हैं, उसमें आपसे बेहतर कोई और नहीं हो सकता.''

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