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''मारुति में साल भर बाद मैंने अहम फैसला किया...

...यहीं टिका रहा जाए, बनिस्बत कि अफसरशाही के अपने करियर में लौट जाया जाए’’

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आर.सी. भार्गव आर.सी. भार्गव

जिंदगी का निर्णायक पल

आर.सी. भार्गव, 86 वर्ष

देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी के चेयरमैन के नाते उन्होंने 2019-20 में कंपनी की 15 लाख वाहनों की बिक्री और 5,650 करोड़ रु. का कुल मुनाफा दिखाया है

साल था 1974. रवींद्र चंद्र भार्गव तत्कालीन केंद्रीय मंत्री के.सी. पंत के विशेष सहायक के रूप में कार्यरत थे और उन्हें भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के तत्कालीन अध्यक्ष वी. कृष्णमूर्ति से मिलने का मौका मिला. कृष्णमूर्ति ने एक सवाल दागा, ''भार्गव, क्यों न आप आएं और मेरे साथ भेल से जुड़ जाएं?’’ भार्गव ने उस प्रस्ताव पर ‘नहीं’ कहने में समय नहीं लिया. आखिरकार, उनके पास ऐसी रसूखदार सरकारी नौकरी छोडऩे की एक भी वजह तो थी नहीं. देहरादून में जन्मे, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित में स्नातकोत्तर और 1956 के आइएएस बैच टॉपर भार्गव को निकट भविष्य में और अधिक अहम जिम्मेदारियां मिलने की उम्मीद थी. 

हालांकि, 1978 में भार्गव के उत्तर प्रदेश लौटने का समय आ गया, जहां से वे पांच साल के लिए केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आए थे. बच्चे दिल्ली में पढ़ रहे थे इसलिए वे उत्तर प्रदेश जाने के लिए उत्सुक नहीं थे. भार्गव ने कृष्णमूर्ति को फोन करके पूछा कि क्या चार साल पहले की गई भेल की नौकरी वाली पेशकश अब भी है. कृष्णमूर्ति भेल छोड़ चुके थे, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनी ने भार्गव को निदेशक-वाणिज्य के रूप में काम पर रखा. यह ऐसी पोस्ट थी, जो विशेष रूप से उनके लिए बनाई गई थी.

दो साल बाद भार्गव को भेल में परेशानी हुई. भार्गव कहते हैं, ''नए चेयरमैन ने कंपनी में पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू की और जिस पद पर मैं था, उसे खत्म कर दिया. शायद उन्हें लगा कि आगे मैं उनके लिए खतरा बन सकता हूं.’’ वे छुट्टी पर चले गए.

लेकिन नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कृष्णमूर्ति को मारुति कार परियोजना के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के रूप में कंपनी की अगुआई करने के लिए चुना. कृष्णमूर्ति इस बात को लेकर स्पष्ट थे कि उनकी टीम में कौन होगा. इस तरह 1981 में भार्गव मारुति उद्योग में निदेशक-बिक्री और विपणन के रूप में शामिल हुए.

उन दिनों, यह बहस छिड़ गई कि कंपनियों के प्रबंधन में ‘जनरलिस्ट’ (सिविल सेवाओं से आए लोग) बेहतर हो सकते हैं या 'टेक्नोक्रेट’ (इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले लोग). भार्गव कहते हैं, ''मैंने वी. कृष्णमूर्ति से पूछा कि मैं उनके जैसा टेक्नोक्रेट नहीं हूं, फिर उन्होंने अपनी टीम में क्यों चुना? उनका जवाब था, 'जब मैं आपसे (भार्गव) ऊर्जा मंत्रालय में मिला था, तो मैंने आपको ऐसा नौकरशाह पाया जो किसी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश करेगा, न कि किसी समाधान में से समस्याएं ढूंढेगा.’’

मारुति में एक साल के भीतर भार्गव को एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना था—वे मारुति के साथ बने रहें या फिर आइएएस में वापसी करें. एक ओर—जैसा कुछ लोगों ने बताया था- 'एक राजनैतिक परियोजना (मारुति) थी जो लंबे समय नहीं चलेगी’ और दूसरी ओर, नौकरशाह के रूप में शानदार करियर और संभवत: कैबिनेट सचिव का पद भी. 

भार्गव के पास नौकरशाह के रूप में एक दशक का कार्यकाल शेष था और उन्होंने मारुति पर दांव लगाया. किसी ने उन्हें आगाह भी किया था कि वे मारुति छोड़ते हैं तो यह बात इंदिरा गांधी को अच्छी नहीं लगेगी, जो अपने दिवंगत बेटे संजय गांधी की एक कुशल और सस्ती स्वदेशी कार बनाने की परियोजना को पूरा करने की इच्छुक थीं. सुजुकी के साथ शुरुआती वार्ता सफल नहीं हुई. जनवरी 1982 में, भारत में टीवीएस मोटर कंपनी के दौरे पर आए एक शीर्ष सुजुकी अधिकारी ने इंडिया टुडे पत्रिका में दाइहात्सु के साथ मारुति के समझौते की योजनाओं के बारे में पढ़ा.

अधिकारी ने सुजुकी के तत्कालीन चेयरमैन को फैक्स भेजा. कंपनी इस अवसर को जाने नहीं देना चाहती थी. भार्गव कहते हैं, ''तीन दिन बाद, सुजुकी की एक टीम सौदे पर बातचीत के लिए भारत में थी.’’ दोनों कंपनियों ने 2 अक्तूबर, 1982 को संयुक्त उद्यम समझौते पर हस्ताक्षर किए. ठीक 14 महीने बाद संजय गांधी के 37वें जन्मदिन 14 दिसंबर 1983 को मारुति 800 लॉन्च की गई.

1985 में, मारुति उद्योग के चेयरमैन के रूप में कृष्णमूर्ति के तहत, भार्गव को एमडी की हॉट सीट की पेशकश की गई थी जिस पर वे 12 साल तक, 1997 में अपनी सेवानिवृत्ति तक, बने रहे. भार्गव 2003 में मारुति बोर्ड में एक निदेशक के रूप में कंपनी के साथ फिर से जुड़े. वे 2007 में इसके अध्यक्ष बने.

जब कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई और सरकार के नियंत्रण से बाहर होकर आज की मारुति सुजुकी बन गई. देश के सबसे बड़े कार निर्माता ने 2019-20 में 15 लाख से अधिक वाहन बेचे. वे कहते हैं, ''किसी की शैक्षणिक डिग्री से कोई फर्क नहीं पड़ता. आप समय के साथ सीखते रहना जारी रखते हैं और उस कौशल और हुनर का अपने काम में उपयोग करते हैं, तो कोई परेशानी नहीं होगी.’’ 

 

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