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कंटेनर में क्लासरूम

ऐसे बांटी खुशी: व्यस्त चौराहे पर फ्लाइओवर के नीचे चल रहा एक स्कूल आवारा भटकने वाले साधनहीन बच्चों को शिक्षा और दिन में तीन वक्त का खाना दे रहा है और जिंदगी के हुनर सिखा रहा है

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पढ़ाई : ठाणे की सिग्नल शाला में विद्यार्थी
पढ़ाई : ठाणे की सिग्नल शाला में विद्यार्थी

धवल कुलकर्णी

सिग्नल शाला, स्थापना: 2016, ठाणे, महाराष्ट्र

किरण चंद्रकात काले दसवीं में पढ़ता है और कहता है, ''मैने अभी तय नहीं किया, पर मैं सिपाही बनना चाहता हूं.'' कक्षा की दीवारों पर लगी महात्मा गांधी और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की तस्वीरें उसे निहार रही हैं. काले करियर का लक्ष्य बताने वाला महज एक छात्र भर नहीं है. वह सड़कों पर आवारा भटकने वाले उन साधनहीन बच्चों में है जो ठाणे के तीन हाथ नाके पर फ्लाइओवर के नीचे चल रहे स्कूल 'सिग्नल शाला' में पढ़ रहे हैं.

इस अनूठे स्कूल में पढ़ रहे छात्र डिनोटिफाइड जनजातियों के प्रवासी परिवारों के बच्चे हैं. कभी वे फूल और छोटी-मोटी चीजें बेचते थे या ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगते थे. शिक्षा की मुख्यधारा से वंचित इन बच्चों के नशे की लत और जुर्मो-गारत के जाल में फंस जाने का खतरा था.

पांच एयरकंडीशंड कंटेनरों से चलाया जा रहा यह स्कूल समर्थ भारत भविष्य नाम के एनजीओ ने 2016 में शुरू किया. बच्चों को यहां शिक्षा और तीन वक्त का खाना दिया जाता है और जिंदगी के हुनर भी सिखाए जाते हैं. काले कहता है, ''मैं सिग्नल पर फूल बेचा करता था. शुरुआत में शिक्षक मेरे माता-पिता से मिले, तो उन्होंने मुझे स्कूल भेजने से इनकार कर दिया. उन्हें लगा पढ़ाई-लिखाई से हमें कोई मदद तो मिलेगी नहीं. लेकिन शिक्षकों ने अंतत: मेरे माता-पिता को मना लिया और मैं यहां आ गया.'' काले और उसकी बहन सिग्नल के नजदीक सड़क पर अपनी मां और नाना-नानी के साथ रहते हैं. उसके पिता अहमदनगर में सीमांत किसान हैं.

समर्थ भारत भविष्य के सीईओ भाटू सावंत कहते हैं कि सिग्नल स्कूल का विचार तब पनपा जब 2016 में वे एक मराठी दैनिक में रिपोर्टर का काम करते थे. उनके ज्ञानचक्षु तब खुले जब उन्हें अहसास हुआ कि इन बच्चों को ''मुख्यधारा'' के स्कूलों में इसलिए भर्ती नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे उनके माता-पिता की आमदनी में बट्टा लगेगा. सावंत कहते हैं, ''इसलिए हमने सोचा कि स्कूल को ही उनके पास क्यों न ले आएं?'' इस तरह तीन हाथ नाके पर फ्लाइओवर के नीचे कंटेनर में 'सिग्नल शाला' खुली. 

बच्चों को स्कूल ला पाना मुश्किल था, पर स्वयंसेवियों और शिक्षकों ने उनके माता-पिता को मना ही लिया. सावंत कहते हैं, ''ज्यादातर छात्र पारधी समुदाय के हैं और अपनी ही बोली बोलते हैं.'' सात छात्र अब तक कक्षा 10 पास कर चुके हैं. 2018 में जब दो छात्रों ने सबसे पहले मैट्रिक पूरा किया, तो और भी छात्र नाम लिखवाने को प्रेरित हुए. उन दो में से एक इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा करके उपभोक्ता वस्तुओं की एक कंपनी में काम कर रहा है. स्कूल में 40 छात्र हैं. छात्रों को कक्षा 7 से नल, बढ़ईगीरी और रंगाई-पुताई सरीखे काम भी सिखाए जाते हैं.

 

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