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विशेषांकः चुनौतियों का चतुष्कोण

भारत को 2022 में जिन इम्तहानों से गुजरना है, उनमें राजनीतिज्ञ मोदी नहीं बल्कि राजनेता मोदी की जरूरत है

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साल 2022 की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनौतियों के चतुष्कोण से दोचार हैं, जिसमें उनके नेतृत्व कौशल और राजकाज का कड़ा इम्तहान होगा: कोविड की तीसरी लहर पर काबू पाना, पांच विधानसभाओं के चुनाव में अपनी पार्टी को जीत दिलाना, देश की तहस-नहस अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकना और आक्रामक चीन से निपटना. लड़ाई के लिए हुंकार भरते हुए प्रधानमंत्री को उस भारतीय बाजीगर की तरह महसूस करना होगा जिसके बारे में 19वीं सदी के अंग्रेजी निबंधकार विलियम हैजलिट ने एक लेख में लिखा था: ''एक सेकंड से भी कम वक्त में एक के बाद चार गेंदें पकड़ना और उन्हें इस तरह लौटाना ताकि वे आभासी चेतना के साथ हाथ में वापस आ सकें, निश्चित अंतरालों पर उन्हें गोल-गोल घुमाना, जैसे ग्रह अपनी कक्षा में घूमते हैं, वह करना जो असंभव दिखाई देता है... समय के छोटे से छोटे कल्पनीय क्षण की बाल बराबर चूक भी जानलेवा हो सकती है.''

मोदी जिन चार चुनौतियों से दोचार हैं, वे आपस में गहराई से जुड़ी हैं. उनसे निपटने के लिए उन्हें जादूगर सरीखी निपुणता, तालमेल, तत्क्षण प्रतिक्रिया, सभी आयामों के प्रति जागरूकता, रणनीतिक सोच-विचार और एकाग्रता की दरकार होगी. कोविड-19 के ओमिक्रॉन रूप के फटाफट फैलाव को ही लीजिए. इसने तब धावा बोला जब भारत अपने विशाल टीकाकरण अभियान की प्रगति से गदगद था और 2021 की दूसरी लहर के दुस्वप्न को पीछे छोड़ आया लगता था. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ओमिक्रॉन 'वैक्सीनों की वैक्सीन' है—हल्की और फिर भी कहीं ज्यादा व्यापक रूप से फैलने वाली संक्रामक बीमारी, जो इसे दुनिया भर में हर्ड इम्यूनिटी पैदा करने का आदर्श साधन बना सकती है.

लेकिन जरा भी आत्मसंतुष्ट रहना नादानी होगी क्योंकि मामलों की भारी तादाद भर स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को चरमरा सकती है. नए खतरे को समझते हुए मोदी ने 15 से 18 के बीच की उम्र के 14 करोड़ भारतीयों किशोरों को टीके लगाने की शुरुआत कर दी. साथ ही, दोनों टीके लगवा चुके पर दूसरी बीमारियों से ग्रस्त 65 से ऊपर के उन लोगों को भी बूस्टर डोज लगेगी. मोदी सरकार को अब यह जरूर पक्का करना चाहिए कि राज्य संक्रमण दरों को धीमा करने के कदम उठाएं और इलाज के लिए पर्याप्त बिस्तरों, दवाइयों और ऑक्सीजन से लैस हों. इस बीच और भी छोटी उम्र के बच्चों की कई संभावित वैक्सीन को फास्ट-ट्रैक पर डालने की जरूरत है, ताकि अंतत: देश की पूरी आबादी को टीके लग सकें.

ओमिक्रॉन से जिस तरह निपटा जाता है, उसी से तय होगा कि प्रधानमंत्री बाकी तीन गेंद कितनी अच्छी तरह उछाल सकते हैं. यह समझने के लिए बहुत अक्ल की जरूरत नहीं कि राजनीति में उत्तर प्रदेश बेशकीमती है. मोदी और भारतीय जनता पार्ट (भाजपा) के लिए दो टूक बहुमत के साथ इस राज्य को जीतना वह कुंजी है जिसके बल पर वे तीसरे कार्यकाल के अभियान को गति दे पाएंगे और दूसरे कार्यकाल के उत्तरार्ध में बेधड़क हुकूमत कर पाएंगे. अपनी पार्टी को विधानसभा चुनाव जिताने में मदद का मोदी का ट्रैक रिकॉर्ड 2018 के बाद अच्छा नहीं रहा है. 2021 की गर्मियों में असम और एक साल पहले बिहार की सीमित जीत को छोड़ दें तो छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और हाल में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल की हार भाजपा के तुरुप के पत्ते के छीजते प्रतिफल की तरफ इशारा करती हैं. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में सत्ता बनाए रखना भाजपा के लिए बेहद जरूरी है और उतना ही जरूरी पंजाब में कांग्रेस को दोबारा सत्ता में आने से रोकना भी है ताकि उसे फिर उठ खड़ा होने से रोक सके.

राजनैतिक मोर्चे पर मोदी को और भी कई मुश्किल फैसले लेने हैं. चुनाव में जा रहे राज्यों में भीड़-भरी राजनैतिक रैलियां कोविड के मामलों में विस्फोट का सबब होंगी. प्रधानमंत्री के नाते भाजपा के पक्ष में उनके प्रचार अभियान को सावधानी और सतर्कता का आदर्श कायम करना चाहिए, जिसका अनुसरण दूसरे भी करें. फिर 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव की हार से साबित हो चुका है कि किसी भी कीमत पर जीतने की खातिर ध्रुवीकरण में जोर लगाने के पार्टी और उसके प्रधान प्रचारक के लिए नुक्सानदेह नतीजे हो सकते हैं. हिंदुत्व का उग्र धड़ा पहले ही अपने आक्रामक तेवर दिखा रहा है, जैसा कि हाल में उत्तराखंड की धर्म संसद में अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ भाषणों में देखा गया.

समुदायों के बीच मौजूदा फूट को तीखा करने वाला चुनाव अभियान न केवल पंजाब के चुनाव नतीजों पर प्रतिकूल असर डाल सकता है बल्कि लंबे समय की दरारें पैदा कर सकता है. टूट-फूट से ग्रस्त पंजाब भारत गवारा नहीं कर सकता क्योंकि अफगानिस्तान में अपनी कामयाबी से दुस्साहसी हो उठा पाकिस्तान इस सरहदी राज्य में उग्रवादी तत्वों को फिर जिंदा करने का मौका ताड़ रहा है. यही चेतावनी जम्मू और कश्मीर पर भी लागू होती है जहां मोदी सरकार ने 2019 में अनुच्छेद 370 रद्द करके राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था. घाटी में अलगाव की भावना को खत्म करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा नैतिक आधार दोबारा हासिल करने के लिए भी 2022 में विधानसभा चुनाव करवाने चाहिए.

राजनैतिक लड़ाइयां लड़ते हुए भी प्रधानमंत्री जानते ही हैं कि 2021 के बाद के आधे साल में अर्थव्यवस्था की बहाली फिर जहां की तहां आने लगी. बढ़ती महंगाई और खासकर अनौपचारिक क्षेत्र में बेरोजगारी की प्रेतछायाएं ओमिक्रॉन से धुंधली रोशनी में और भी मनहूस ढंग से चमकेंगी. इसका असर खास तौर पर उन लोगों पर पड़ेगा जिन्होंने कोविड की पिछली लहरों के दौरान छोटे और बहुत छोटे उद्यमों पर ताले पड़ने के वक्त नौकरियां गंवा दी थीं. उधर कृषि कानूनों के मामले में मोदी के पीछे हटने के बाद विभिन्न क्षेत्रों में सुधार की प्रक्रिया को तेज करना सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है. मसलन, किसान आंदोलन की देखा-देखी, मजदूर संगठनों के हौसले इतने बुलंद हो गए कि वे नए श्रम कानूनों पर अमल के खिलाफ प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतर आए.

2022 में मोदी सरकार का फोकस तेज रफ्तार आर्थिक वृद्धि पर अवश्य कायम रहना चाहिए ताकि नौकरियां दी जा सकें और जनकल्याण तथा बुनियादी ढांचे के योजनाओं के लिए जरूरी राजस्व बढ़ाया जा सके. लेकिन, वित्त मंत्रालय के एक बड़े अफसर के शब्दों में कहें, तो ''कोई आसान समाधान नहीं हैं.'' छोटे और बहुत छोटे उद्यमों में नई जान फूंकने के लिए वित्तीय सहायता के अलावा, विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) को पांच के बजाय तीन स्लैब में घटाकर और तर्कसंगत बनाया जा सकता है और टर्नओवर सीमा बढ़ाकर और ज्यादा छोटे कारोबारों को छूट दी जा सकती है. इससे प्रक्रिया सरल होगी, अनुपालन बढ़ेगा और करचोरी कम होगी. इस बीच केंद्र सरकार को बेरोजगार शहरी कामगारों के लिए सुरक्षा जाल लाना पड़ सकता है. एक तरीका यह हो सकता है कि मनरेगा की तर्ज पर शहरी बेरोजगार योजना लाई जाए.

मोदी सरकार ने 2021 के बजट में राजकोषीय घाटे की जिस राह का वायदा किया था, उसे कायम रखते हुए बुनियादी ढांचे पर पूंजीगत खर्च कम नहीं करना चाहिए. बैंकों और केंद्र सरकार के उपक्रमों का निजीकरण आगे बढ़ना चाहिए ताकि सरकार नकदी संकट से बच सके. यह भी महत्वपूर्ण है कि पूंजी निवेश का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र से आए, जिसमें पिछले साल अर्थव्यवस्था के उबरने के बाद विस्तार की तीव्र इच्छा दिखाई दी. 13 क्षेत्रों की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन लाभ योजनाओं से मदद मिलनी चाहिए. हाल ही में खुले खनन, अंतरिक्ष और प्रतिरक्षा सरीखे क्षेत्रों के लिए नियामकीय लाल फीते भी काटने होंगे.

मोदी को 2022 में जिस चौथी गेंद को हुनर और बाजीगरी से संभालना होगा, वह है विदेश नीति, खासकर आक्रामक चीन से उत्पन्न खतरों और अवसरों से जुड़ी नीति. चीन को काबू करना भारत और अमेरिका का साझा उद्देश्य है. 2021 में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ क्वाड की प्रक्रिया को पुख्ता किया. मगर उनमें भारत अकेला है जो चीन के साथ अनसुलझी सरहद साझा करता है और 2022 में मोदी सरकार को ऐसी रणनीतियां और व्यूह रचनाएं विकसित करनी होंगी जिनसे चीन को आगे किसी भी सामरिक दुस्साहस से भयपूर्वक रोका जा सके. काबुल में तालिबान की वापसी से उत्पन्न अपनी चुनौतियां हैं—आतंकवाद उनमें नहीं है—खासकर तब जब इससे चीन-पाकिस्तान की मौजूदा साठगांठ को पहले ही रणनीतिक गहराई मिल गई है. दूसरी तरफ, चीन और पश्चिम के बीच बढ़ते गतिरोध में भारत के लिए वैकल्पिक सप्लाई चेन नेटवर्क का हिस्सा बनने और निर्यात बढ़ाने का आर्थिक मौका है. इसके लिए भारत को बड़े व्यापार समझौतों को लेकर अपने प्रतिरोध की नए सिरे से जांच करनी होगी.

सबसे बढ़कर, 2022 में देश के सामने मौजूद घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों चुनौतियों से निपटने के लिए शिखर पर राजनीतिज्ञ मोदी नहीं बल्कि राजनेता मोदी की जरूरत है. देश की प्रगति पर प्रतिकूल असर डाल रही राजनैतिक गर्मागर्मी को कम करने की तीव्र जरूरत है, चाहे वह सत्तारूढ़ पार्टी का उग्र राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण हो या विपक्ष का अड़ियलपन और नकारात्मकता. यह वह साल है जब मोदी को 2022 में मुंह ताक रही असाधारण चुनौतियों से निपटने के लिए विपक्ष के पास जाना और एकता के लिए संवाद शुरू करना चाहिए. एक बार फिर हैजलिट के शब्दों मे, ''महानता महान प्रभाव उत्पन्न करने वाली महाशक्ति है.'' मोदी के पास अब भी महाशक्ति है. 2022 में उन्हें इसका प्रयोग बुद्धिमानी से और बेहतर भलाई के लिए करना चाहिए.

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