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लोग और लोकाचारः थोडा़ ही बहुत है

बड़े पैमाने पर युवाओं ने भोग-विलास और शाहखर्ची की जिंदगी से तौबा करनी शुरू की और भारत में संयमी और सादगी-पसंद लोगों की जमात बढ़ने लगी.

समीक्षा लोहार अलीबाग स्थित अपने घर पर न्यूनतावाद का जीवन जीते हुए थोड़ा ही बहुत है समीक्षा लोहार अलीबाग स्थित अपने घर पर न्यूनतावाद का जीवन जीते हुए थोड़ा ही बहुत है

—साथ में रिद्धि काले और शैली आनंद

समीक्षा लोहार मुंबई में सोशल मीडिया स्ट्रेटजिस्ट हैं. 2019 में उनका करियर परवान चढ़ रहा था. मगर मन में एक तरह की लाचारगी का एहसास भी था. जब भी कचरे के बढ़ते पहाड़, नदियों को मैला करती कंपनियां या जलवायु में आ रहे बदलावों से खेती छोड़ते किसानों की खबरें आतीं, उनका मन विचलित हो उठता. उनके मन में अपनी जीवनशैली को लेकर सवाल उठने लगे.

पहली बार उन्होंने इसकी ज्यादतियों के बारे में सोचा. और तभी संयम और सादगी की जिंदगी अपनाना तय किया. उन्होंने नई चीजों की बजाए सेकंड-हैंड और पुरानी चीजों के बदले मिलने वाली चीजें खोजना शुरू किया. वे महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में अपने घर लौट गईं और पर्यावरण को ध्यान में रखकर जैविक खेती का नया अध्याय शुरू किया. 27 वर्षीया लोहार का मकसद है कि चीजें फेंकी जाने की बजाए उनका दोबारा इस्तेमाल हो.

उन्होंने फटे-पुराने कपड़ों से रस्सियां, झाड़न और बाड़ बनाईं. वे कहती हैं, ''मेरे पास जो कुछ है, उसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के तरीके खोज रही हूं. मकसद है कि चीजें ज्यादा चलें और जरूरत भी पड़े तो इस्तेमाल की गई चीजें या फिर स्थानीय दुकानदारों और लोगों से खरीदूं.’’ वे 'धीमी और सचेत’ जिंदगी जीना चाहती हैं, ऐसी जिंदगी जिसमें ''अथाह चीजों का मालिक होने से जुड़ा अहंकार’’ बह जाए, ताकि वे 'हर क्षण को पूरी तरह जी’ सकें.

लोहार ऐसे लोगों की बढ़ती जमात का हिस्सा हैं जिन्होंने 'थोड़ा ही काफी है’ का मंत्र अपनाया है. जोशुआ फील्ड्स मिलबर्न और रेयान निकोडेमस को 2009 से 'द मिनिमलिस्ट’ या न्यूनतावादी के तौर पर पहचाना गया. उन्होंने इस विषय पर चार किताबें लिखीं और दो डॉक्युमेंट्री में दिखाई दिए. न्यूनतावाद को परिभाषित करते हुए वे कहते हैं, यह ''जिंदगी में अतिरेक से छुटकारा पाने और जो जरूरी है उसी पर ध्यान देने का तरीका है, ताकि आपको खुशी, संतोष और स्वतंत्रता मिले’’.

यह आंदोलन चीजों के साथ भावनाएं न जोड़ने पर भी जोर देता है. इसकी बजाए यह ऐसी चीजों को प्राथमिकता देता है जो जीवन को मूल्यवान बनाती हैं. इसने वीर दास सरीखी जानी-मानी शख्सियतों को प्रेरित किया, जिन्होंने गैर-जरूरी कपड़ों से वार्डरोब खाली कर दिया, बहुत जरूरी कपड़े ही रहने दिए. दास के वार्डरोब में आठ टी-शर्ट, दो जींस, एक हेयरबैंड और तीन हैट भर हैं. पिछले साल जुलाई में ट्विटर और इंस्टाग्राम पर स्टैंड-अप कॉमेडियन, अभिनेता और लेखक ने बताया कि कैसे उन्होंने चीजें खरीदना बंद कर दिया और ''खाने, यात्रा, संगीत, अनुभवों और किताबों पर’’ ही पैसा खर्च करना चुना है.

हल्की-फुल्की आजाद जिंदगी
जिंदगी में हल्के रहने और कभी-कभी तो सूटकेस में अटने जितनी चीजों के सहारे जीने का विचार निराला या अटपटा नहीं है. 34 वर्षीय राशिद नूर गुरुग्राम की एक कंपनी के साइबर सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन विभाग में मैनेजर हैं. वे 2013 से ही ऐसा कर रहे हैं.

वे अब भी पिता का 12 साल पुराना स्कूटर चलाते हैं और चीजें खरीदने की बजाए किराए पर लेते हैं. नूर की सादगी-पसंद जीवनशैली पर शुरू में भौंहें तनीं. मगर धीरे-धीरे इसे स्वीकार किया जाने लगा. वे कहते हैं, ''मैं ऐसा कुछ नहीं खरीदता जिसकी वाकई जरूरत नहीं. इससे मैं उस तेज रफ्तार दौड़-भाग से दूर रह पाता हूं जिसे ज्यादातर लोग 'जिंदगी जीना’ कहते हैं.’’

न्यूनतावाद से जिंदगी आसान हो जाती है. ताजातरीन रुझानों के पीछे भागने की चाहत नहीं रह जाती. इस जीवनशैली के चलते कोरियोग्राफर गेती सिद्दीकी के लिए मुंबई में घर बदलना और फटाफट तैयार होना आसान हो गया. वे हर छठे महीने वार्डरोब की सफाई करती हैं और डांसरों से कहती हैं कि कभी-कभार इस्तेमाल की जाने वाली चीजें दे दें.

वे कहती हैं, ''जितना ज्यादा आप जमा करते हैं, उतना ही उससे लगाव होता जाता है. मैं 10 चीजें देती हूं तब एक खरीदती हूं. यह मुझे उपचार जैसा लगता है.’’ गेती 16 साल की उम्र से एक ही ब्रांड के परफ्यूम पर अटकी हैं. उनका मेकअप काजल, आइलाइनर, लिपस्टिक तक सिमटा है.

खाली करना बाहर और अंदर से
महामारी और लॉकडाउन ने पर्यावरण की भंगुरता को लेकर व्यापक चर्चाएं छेड़ दीं. घरों में कैद रहने से लोगों को जीवनयापन की जगहों, ठसाठस भरे कपबोर्ड और अलमारियों को जानने-समझने का वक्त मिला. फिर तो यह होना ही था कि गैर-जरूरी चीजें हटाने का विचार जोर पकड़ने लगा. पुणे की गृहणी शीतल की तरह कुछ लोगों ने अपने घर दुरुस्त करने के लिए गायत्री गांधी सरीखी पेशेवरों की सेवा ली.

गांधी कोनमारी विशेषज्ञ हैं, जो जॉय फैक्ट्री नाम की डिक्लटरिंग सर्विस चलाती हैं. कोनमारी जापानी पद्धति है, जिसे लेखिका मैरी कोंडो ने लोकप्रिय बनाया है. यह कहती है कि अस्त-व्यस्त माहौल का असर आपके भौतिक वातावरण के साथ मानसिक सुख-चैन पर भी पड़ता है. यह ऐसी चीजें त्यागने को बढ़ावा देती है जो ''आनंद की चिंगारी’’ प्रज्वलित नहीं करती.

महामारी के दौरान गांधी का कारोबार खूब फला-फूला.  वे वर्चुअल माध्यम पर आ गईं, आमने-सामने सलाह-मशविरे की पेशकश की और वर्कशॉप करने लगीं. वे कहती हैं, ''घर पर रहने से लोगों को जगह की तंगी का एहसास हुआ. इसलिए नहीं कि जगहें छोटी हैं, बल्कि इसलिए कि चीजें ठूंस-ठूंसकर भरी होने से जगहें छोटी दिखती और महसूस होती थीं.’’

जॉय फैक्ट्री में गांधी एक सूत्र लागू करती हैं जिसे वे 'सी2एस2 फॉर्मूला’ यानी कलेक्ट, चूज, स्क्रैप और स्टोर कहती हैं. इसके जरिए शीतल ने वार्डरोब आधा खाली कर दिया. बरसों से रखी किताबें, बर्तन, खिलौने और तोहफे दे दिए. इसका बड़ा हिस्सा गुडविल इंडिया को दान में गया, जो इस्तेमाल चीजें इकट्ठा करके साधनहीन लोगों को बांटता है. 

दूना और सुहाना
कुछ लोग सामान की भीड़ हटाने से कहीं ज्यादा पर्यावरण को लेकर चिंतित हैं. ग्लोबल वार्मिंग और कचरे की चिंता उनके मन पर हावी है. 'यूगव’ का 2019 का सर्वे कहता है कि ज्यादा भारतीय, खासकर मिलेनियल्स तथा जेन एक्स के खरीदार, कपड़े खरीदते वक्त मैन्युफैक्चरिंग के टिकाऊ मानदंडों को अहमियत देते हैं. ताजा फैशनन के हिसाब से बाजार के लिए बनाए गए महंगे कपड़ों को पर्यावरण-प्रतिकूल माना जाने लगा और इसके साथ ही थ्रिक्रिटंग या कमखर्ची के तौर-तरीके चलन में आ गए.

कमखर्ची या किफायत का मतलब है कपड़ों को दूसरी जिंदगी देना. यह बात भारतीय घरों के लिए अजनबी नहीं है. अंबिका माथुर के लिए कमखर्ची जारा और एचऐंडएम सरीखे फैशन ब्रांड से खरीदारी करने का दिलचस्प विकल्प बन गया. दिल्ली में वकील 25 वर्षीया माथुर कहती हैं, ''लॉकडाउन ने हमें सोचने का वक्त दिया कि हमारे कपड़े कहां से आ रहे हैं और हमारे पहनने के बाद कहां जा रहे हैं.’’ उनका फलसफा यह है कि कपड़े ज्यादा वक्त टिकें, कम खरीदें और जिनसे जी भर जाए उन्हें एनजीओ को दान कर दें. दीवाली के लिए माथुर ने नए एथनिक वीयर नहीं खरीदे. इसकी बजाए अपनी मां की साड़ी पहनी.

किफायत के साथ मजे का भी एक तत्व है. कोलकाता में मल्टी-डिजाइनर स्टोर मोनो चला रही मृदुला पै को इसका सीधा अनुभव हुआ. उन्होंने देखा कि उनके ग्राहक ''प्री-लव्ड’’ या इस्तेमालशुदा चीजों के रैक की तरफ खिंचे चले जाते हैं. अक्तूबर 2019 में थ्रिक्रटेड चीजों का एक रैक था. अब पै और उनके सह-संस्थापकों मुनीर मोहंती और करुणा एजरा पारीख ने इस किस्म की चीजों के लिए ज्यादा जगह दी है. उन्होंने एक थ्रिक्रट ब्रांड और ई-कॉमर्स उद्यम भी शुरू किया है— Lovemetwice.in..

धरती को टिकाऊ बनाने की लहर
कपड़े युवाओं के लिए टिकाऊ जीवनशैली के प्रति अपना जज्बा दिखाने का अकेला तरीका नहीं हैं. कुछ ने अपने कार्बन फुटप्रिंट में कटौती के लिए हवाई यात्रा छोड़ दी है, तो लोहार सरीखे दूसरों ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को ताकत देने का बीड़ा उठाया है. धरती के स्थायित्व की चिंता शादी के कारोबार में भी आ रही है.

वेडिंग वायर इंडिया की एसोसिएट डायरेक्टर मार्केटिंग अनम जुबैर कहती हैं कि जोड़े और उनके परिवार अब छोटे पैमाने पर सस्टेनेबल शादियों का विकल्प चुन रहे हैं और इस बदलाव के पीछे युवा जोड़ों में आई सजगता है. सॉफ्टवेयर इंजीनियर अभिनव अरोड़ा और इशिता गुप्ता ऐसे ही युगल हैं.

दिसंबर में उनकी शादी है, जो 40 मेहमानों के साथ छोटा-सा समारोह होगी. फूल और सजावट की चीजें स्थानीय विक्रेताओं से खरीदने और ई-निमंत्रण भेजने के अलावा उनका इरादा घर के चारों और लगाई गई पर्यावरण-अनकूल सजावटी चीजों को फिर इस्तेमाल करने का भी है.

कम खरीदें. गैर-जरूरी चीजें दे दें. धरती के स्थायित्व के अनुरूप जिंदगी जीने के कई तरीके हैं. मगर यह फर्क पैदा करने की प्रेरणा ही है जो अंतत: लोगों को जोड़ती है. न्यूनतमवाद की ज्यादातर क्रांतियां आखिरकार एक कमरे के भीतर शुरू होती हैं.

रीब्रांड. ईडी
 लॉकडाउन के दौरान 21 वर्षीय मानसी अरोड़ा को एक कुत्ता मिला. उन्हें पता था कि कुत्ता पालने पर काफी खर्च आता है, लिहाजा उन्होंने धन कमाने का नया-नवेला तरीका सोचा. उन्होंने अपने इस्तेमाल कपड़े बेचने के लिए इंस्टाग्राम पर एक एकाउंट खोला.

बाद में इसमें उन्होंने दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट में मिली अपने किस्म की अनूठी चीजों को भी जोड़ लिया. अरोड़ा कहती हैं, ''मेरा मकसद हमेशा पिता से पैसा लेना बंद करके खुद कमाना था.’’ अब वे अपने हैंडल से हर महीने 40,000 रुपए कमाती हैं.

 क्रिमसनक्लोजेट. बीएलआर
कमारा फरीद के पास ''बेशुमार कपड़े’’ थे जिन्हें वे किफायती खरीदारों को ऑनलाइन बेच रही थीं. फिर सितंबर 2020 में उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया. एक साल और दो महीने बाद बेंगलूरू के एक कॉलेज की तीसरे साल की छात्रा कमारा के इंस्टाग्राम प्लेटफॉर्म पर पूरे हिंदुस्तान के लोग चीजें बेच और खरीद रहे थे.

लेडीबर्ड.इन
लॉकडाउन ने गुरुग्राम की लतिका शर्मा को वह करने का मौका मुहैया कर दिया जो कि वे हमेशा से बस सोचती ही आ रही थीं—अपने वार्डरोब से कपड़ों के अटाले को खत्म करना. 23 वर्षीया शर्मा ने अगस्त 2020 में अपनी पसंदीदा फिल्म लेडीबर्ड के नाम पर अपने कपड़े बेचने के लिए एक पेज शुरू किया. अब वे कहती हैं, ''मैं कभी सोचा भी नहीं था कि मैं एक बिजनेस चला सकती हूं और वह भी पूरी तरह से अपने बूते पर. मुझे तो इतनी खुशी मिल रही है कि मैं न्न्या बताऊं!’’

नए शब्द-अर्थ
 फालतू निकाल दो/डीक्लटरिंग
सफाई की ऐसी प्रक्रिया जिसके तहत गैरजरूरी सामान निकाल बाहर किए जाते हैं और बाकी को व्यवस्थित ढंग से स्टोर करके रखा जाता है

 सेकंड हैंड/थ्रिक्रिंटग
उपयोग में आ चुकी वस्तुएं फिर से काम में लेना. इसका मकसद है मुनासिब दाम में अच्छी चीजें खरीदना

 न्यूनतावाद/मिनिमलिज्म
कम-से-कम चीजों में जीना. खरीद तो बस उन्हीं की जो नितांत जरूरी हों

कोनमारी एक्सपर्ट गायत्री गांधी. वे जॉय फैक्ट्री नाम से डीक्लटरिंग सर्विस चलाती हैं

अभिनव अरोड़ा और इशिता गुप्ता
ये दोनों इसी महीने कम से कम खर्च में शादी की योजना बना रहे हैं.

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