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जुनूनी महिलाएं: उनके जज्बे को सलाम

ये वे महिलाएं हैं जिन्होंने अपना अच्छे-खासे कॅरियर को छोड़कर समाजसेवा का रास्ता अपनाया है.

एक निवेश बैंकर से समाज सेवी बनने की मुंबई की वृषाली पिस्पाती की कहानी बेहद दिलचस्प है. अपने बेटे की देखरेख करने के लिए 42 साल की वृषाली ने थोड़े समय के लिए कॅरियर से ब्रेक लिया था. इस दौरान वे मुंबई मोबाइल क्रेचेज नाम के एनजीओ से जुड़ गईं, जो निर्माण कार्य में जुटे श्रमिकों के बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में काम करता है. कॅरियर ब्रेक खत्म होता, इससे पहले ही वृषाली कॉर्पोरेट जगत में नहीं लौटने का फैसला ले चुकी थीं.

इस फैसले के चलते उनकी पारिवारिक आय आधी रह गई लेकिन वृषाली को इसका रत्ती भर भी अफसोस नहीं है. वे कहती हैं, ‘‘श्रमिकों के बच्चों की ओर तो हमारा ध्यान जाता ही नहीं. यह मुझे उस वक्त महसूस हुआ जब मैंने इन बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया.’’

दान देने से सामाजिक जिम्मेदारी पूरी हो जाती है, ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है लेकिन वृषाली की तरह कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की खातिर कॅरियर को अलविदा कह दिया.

इंदौर की रहने वालीं और सेना में मेजर रह चुकीं 51 वर्षीया अनुराधा सांखला को मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल खरगौन जिले के एक बंजर टीले ‘‘आस्था ग्राम’’ को मानवता का तीर्थ बनाने में चौदह साल लग गए. एमबीबीएस डॉक्टर अनुराधा 1998 में खरगौन आई थीं, जब उन्हें पता चला था कि आस्था ग्राम में कुष्ठ रोगी रहते हैं. अनुराधा इन रोगियों की सेवा में जुट गईं. फिर उन्होंने मानसिक और शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों के लिए यहां एक स्कूल शुरू किया. त्याग दिए या अनाथ बच्चों को भी यहां जगह दी गई.social work

अनुराधा के इस स्कूल की खास बात यह है कि यहां मानसिक और शारीरिक रूप से अक्षम बच्चे और सामान्य बच्चे एक साथ पढ़ते हैं. उन्होंने सेहत संबंधी एक और पहल शुरू की है, जिसका नाम है ‘‘स्वास्थ्य किराए पर.’’ इसके अंतर्गत आस्था ग्राम ट्रस्ट ने इस इलाके के उन परिवारों को  शौचालय मुहैया करवाए हैं जो खुले में शौच जाते थे. अनुराधा कहती हैं, ‘‘इलाके की कई महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं, जिसका प्रमुख कारण है खुले में शौच और साफ-सफाई की कमी. इन शौचालयों के लिए हम 50 रु. महीना फीस लेते हैं.’’

समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास महिलाओं को खासतौर से होता है, लेकिन इसकी वजह क्या है? विमहांस में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट पुलकित शर्मा कहते हैं, ‘‘महिलाएं प्राकृतिक रूप से ज्यादा संवेदनशील होती हैं. वे दूसरों का दर्द ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकती हैं. दया और इंसानियत तो उनकी सबसे बड़ी शक्ति हैं और इन्हीं की वजह से वे दूसरों से इतनी आसानी से जुड़ पाती हैं.’’

शानोशौकत का जीवन जीने वाली वॉल स्ट्रीट इनवेस्टमेंट बैंकर नीरा नंदी को कुछ खालीपन महसूस होता था. यही अहसास उन्हें समाजसेवा के क्षेत्र में खींच लाया. नीरा कहती हैं, ‘‘मॉर्गन स्टेनली औैर यूबीएस वारबर्ग के साथ न्यूयॉर्क में मैंने बतौर इनवेस्टमेंट बैंकर पांच साल काम किया है. मैं प्राइवेट जेट में यात्रा करती थी और मेरा जीवन बढिय़ा चल रहा था. लेकिन मुझे लगा कि मेरा काम सिर्फ पैसा बनाना नहीं है.’’ तब उन्होंने भारत लौटने का फैसला किया. उन्होंने 1999 में मुंबई में दासरा नाम से भारत की पहली रणनीतिक परोपकारी संस्था की स्थापना की. दासरा आर्थिक रूप से सक्षम लोगों और अपने सामाजिक अभियान में मदद चाहने वाले लोगों के बीच सेतु का काम करती है.

छब्बीस साल की मैरी एलन मैत्सुयी को भी उनकी दिल की आवाज भारत खींच लाई. वे कनाडा की राजधानी ओटावा में एक सांसद की सहायक के बतौर काम करती थीं. मुंबई आकर वे आत्मा नाम के एनजीओ से जुड़ गईं, और अब इसकी कार्यकारी निदेशक हैं. मैरी बताती हैं, ‘‘पेंशन, अच्छा वेतन और कई लाभों वाली सरकारी नौकरी छोडऩे के मेरे फैसले से परिवार खुश नहीं था. लेकिन 2007 में मैं आरामदायक जीवन सहित सबकुछ छोड़कर भारत आ गई और बतौर स्वयंसेवक आत्मा से जुड़ गई.’’

मैरी को लोगों की इस सोच से परेशानी होती है, जिनका मानना है कि एनजीओ से जुडऩा समय बिताने का तरीका है. वे कहती हैं, ‘‘लोगों को जब यह पता चलता है कि मैं एनजीओ से जुड़ी हूं तो उनका अगला सवाल होता है कि मैं फुलटाइम क्या काम करती हूं. उन्हें यह समझना चाहिए कि हम गरीबी के खिलाफ असल लड़ाई लड़ रहे हैं. यह भी एक पेशा ही है.’’social work

लेकिन जमीनी स्तर पर काम करना आसान नहीं है. जैसा कि मुंबई मोबाइल क्रेचेज की देविका महादेवन कहती हैं, ‘‘दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ भावनात्मक रूप से मजबूत और सामाजिक कार्य के प्रति जुनूनी होना भी जरूरी है. समर्पित स्वयंसेवक मिलना भी बड़ी चुनौती है क्योंकि इस काम में पैसा तो कुछ खास है नहीं.’’

इसीलिए जब 26 साल की अनुश्री गुप्ता ने मार्केटिंग और फाइनेंस में एमबीए करने के बाद घोषणा की कि वे समाज के लिए काम करना चाहती हैं, तो हर किसी ने इसे उनके कॅरियर का अंत मान लिया. रूट्स टू रूट्स नाम के एनजीओ की सदस्य अनुश्री याद करते हुए कहती हैं, ‘‘एमबीए करने के बाद मेरे पास ढेरों विकल्प मौजूद थे. लेकिन मुझे लगता था कि मैं सेल्स के टार्गेट का पीछा करने के लिए नहीं बनी हूं.’’ यह एनजीओ सार्क देशों के लोगों, संस्कृतियों और मूल्यों को एक दूसरे के पास लाने का काम करता है, और भारत और पाकिस्तान की ओर खास ध्यान दिया जाता है. आज अनुश्री को अपने फैसले पर गर्व है.

वे कहती हैं, ‘‘मुझे उतना पैकेज तो नहीं मिल रहा जितना कॉर्पोरेट जगत में मिल सकता था लेकिन इस काम से मिलने वाली संतुष्टि के आगे कुछ भी नहीं है.’’ इन जुनूनी महिलाओं की सोच को वृषाली इस तरह व्यक्त करती हैं, ‘‘थोड़ा वक्त निकाल हर कोई दूसरों की मदद कर सकता है. बदलाव लाने के कई तरीके हैं.’’ परोपकार की शुरूआत घर से होती है, इन महिलाओं ने इसी बात को आत्मसात कर अपने दम पर बदलाव लाने का आगाज  कर दिया है.

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