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देश के चार बड़े शायर मोरारी बापू के बारे में अपना-अपना नजरिया बता रहे हैं

कोई उन्हें कबीर-गालिब के घराने का कहता है, कोई काली कमली वाला. देश के चार बड़े शायर अपने-अपने नजरिए से उनके बारे में बता रहे हैं.

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कबीर, यगाना, गालिब के घराने के हैं वे
-निदा फाजली, शायर

मोरारी बापू जिस राम को गाते और सुनते हैं, वे डॉ. इकबाल की एक कविता में इमामे-हिंद के रूप में नजर आते हैं. इकबाल की पंक्तियां यूं हैं: है राम के वुजूद पे हिंदोस्तां को नाज, अहले-नजर समझते हैं उसको इमामे-हिंद. राम की पहचान के लिए इकबाल ने अहले नजर होने की शर्त लगाई थी.

अहले-नजर अर्थात् नजर वाले यानी गहराई को छूने वाले. गहराई में वही उतरता है जो आदमी से इनसान बनने की यात्रा पूरी करता है. आदमी और इनसान का अंतर भारतीय संस्कृति में पहली बार गालिब के यहां नजर आता है: बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इनसां होना.

गालिब ने ही बताया है, मां की कोख से जन्म लेने वाला हर व्यक्ति आदमी कहलाता है, लेकिन आदमी को इनसान बनने के लिए एक लंबी यात्रा पूरी करनी पड़ती है. इस यात्रा को तय करने के सभी के अलग-अलग रास्ते हैं. कोई बनारस में शहनाई बजाने का रास्ता अपनाता है और बिस्मिल्लाह खां बन जाता है, कोई जुलाहा करघा चलाता है, एकांत में गाता है और कबीर कहलाता है.

कोई बीसवीं शताब्दी के शुरू में मुसलमान होते हुए भी अपनी एक गजल में अली के साथ कृष्ण को बिठाता है और इस जुर्म पर कट्टरपंथियों के हाथों सजा पाता है, वह साहित्य में यगाना चंगेजी के नाम से याद किया जाता है.

और कोई रामकथा में उर्दू के शायरों के शेर गुनगुनाता है और मोरारी बापू बन जाता है. ये सब एक ही घराने के सदस्य हैं. न हिंदू हैं, न मुसलमान, केवल इनसान, साहिबे-ईमान.

खुदा को कुरान में रब्बुल आलमीन (तमाम आलमों का खुदा) के रूप में परिभाषित किया गया है. खुदा या ईश्वर की व्यापक परिभाषा आज की सियासत नहीं जानती, मुहब्बत जानती है.

यह बात खुदा को मानने वाला हाफिज मोहम्मद सईद नहीं जानता, राम को पहचानने वाले मुरारी बापू जानते हैं. उन्होंने गालिब के दुश्वार काम को राम के रास्ते पर चलकर आसान किया और खुद को इनसान बनाया है. 

काली कमली वाला शायरनवाज संत
-राहत इंदौरी, शायर

बापू एक शायरनवाज संत हैं और अपनी कथा में दिल खोलकर शेर-ओ-शायरी का इस्तेमाल करते हैं. मेरी खुशकिस्मती है कि मेरे कलाम को वे पसंद करते हैं. देश-दुनिया के कई शहरों में अपनी कथा के दरम्यिान उन्होंने मुझे शायरी पेश करने का मौका दिया है. इस संत के दिल में लिटरेचर और आर्ट्स के लिए जो मुकाम है, उसका पता हर साल तीन दिन के उनके अस्मिता पर्व से मिलता है.

इसमें दिग्गज लेखक, शायर-कवि दर्शन, साहित्य और दूसरे कई मुद्दों पर चर्चा करते हैं. इसके अलावा आला दर्जे के गीतकार-संगीतकार अपने हुनर का जलवा बिखेरते हैं. सौराष्ट्र के अपने गृहनगर तलगा जरड़ा में कई साहित्यकारों, संगीतकारों, नृत्यांगनाओं, रंगकर्मियों, अदाकारों का सम्मान कर चुके हैं बापू.

इनसान की जात को रूहानी सुकून देने वाली जो चंद सूफियाना शख्सियतें दो जहान को अपनी मुकद्दस मौजूदगी से रोशन और इनसानियत की रहनुमाई कर रही हैं, उनमें संत मोरारी बापू का नाम मेरे लिए सरे-फेहरिस्त है. तकरीबन आधी सदी से वे मुल्क और तमाम दुनिया में राम के चरित्र की तबलीग के जरिए मानवता का संदेश जन-जन तक पहुंचा रहे हैं.

यह एक ऐसा अनोखा संत है जिसकी रामकथा में हरिजन और मुसलमान भी मेहमान होते हैं. बापू की कथा में जिक्र बेशक राम का होता है मगर सभी मजहबों, धर्मों के देवी-देवताओं, पैगंबरों की बात भी वहां होती है. कुछ साल पहले दुनिया भर के मजहबों पर रोशनी डालने वाली एक कॉन्फ्रेंस बापू ने करवाई थी.

जिसका मकसद सभी धर्मों में कौमी यकजहती के बारे में बताई गई बातों का जिक्र करना था. कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन मोहतरम दलाई लामा ने किया था, जिसमें बौद्ध, जैन, सिख, इस्लाम, ईसाई और हिंदू धर्म से जुड़े विद्वानों ने लगातार आपसी डॉयलॉग और सभी धर्मों के बीच सौहार्द की सीख पर बात की थी.

आज साधु, फकीरों का लबादा ओढ़े कई ढोंगी सीधे-सादे लोगों को ठग रहे हैं, जिस वजह से सच्चे सूफियों को भी कई लोग शक की निगाह से देखते हैं. ऐसे में काली कमली वाले इस पाकीजा संत के उजले कामों ने अकीदतमंदों को सच की राह दिखाई है. बापू फरमाते हैं कि सच्चे महापुरुष जब आते हैं तो दुनिया से कुछ लेते नहीं, न दुनिया से कुछ मांगते हैं.ॉ

वे वह राज बतलाना चाहते हैं जो हमारे अंदर पहले से ही मौजूद है. सिर्फ उससे जुड़कर आनंद पाने की जिज्ञासा जगाने के उद्देश्य से वे जन-मन में नवचेतना का संचार करते हैं. यह बात कम-से-कम संत बापू के लिए एकदम सच है, ऐसा मैंने महसूस किया है.

मैं उन्हें एक दुनियावी संत कहूं तो ज्यादती न होगी. गुजरात का जलजला, बिहार की बाढ़, जापान का न्यूक्लिअर लीक, हर तरह के इनसानी या प्राकृतिक संकट पर आगे बढ़कर बापू ने भरपूर मदद दी है. मैं उनकी शख्सियत को सलाम करता हूं.

डूबने वालो न घबराओ के हम आते हैं
-वसीम बरेलवी, शायर

आत्मा का सौंदर्य जब आंखों से बोलने और लहजे से झ्लकने लगे तो व्यक्तित्व देखने से ज्यादा महसूस किए जाने योग्य हो जाता है. मोरारी बापू का व्यक्तित्व ऐसा ही है. उनसे मिलिए तो लगता है कि सादगी की पराकाष्ठा शालीनता की इंतिहां से मिल रहे हों.

आज के क्रूर, वारदाती वातावरण में जब हर क्षेत्र के बड़े-बड़े पदों पर उंगलियां उठ रही हों, धराशायी करने वाले खुद धराशायी होने के कगार पर हों, आस्था के कलश डगमगा रहे हों, व्यक्तिगत वैमनस्य सामूहिक बुनियादों को हिला देने पर उतारू हो तो समाजी विश्वास कहां सांस ले?

बड़ा सवाल है. ऐसे में एक मुस्काता, आस बंधाता चेहरा उभरता है, मानो कह रहा हो डूबने वालो न घबराओ के हम आते हैं. ये चेहरा है मोरारी बापू का, जिनके आदेश पर कई बार सेवा में उपस्थित होने, शायरी सुनाने और रू-ब-रू होने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ है.

सहजता, सरलता और व्यावहारिक शाइस्तगी उनके व्यक्तित्व के वे आकर्षण हैं जो बगैर बोले संबोधित करते हैं. भेदभाव से अनजाना मन और इस मन की विशाल उदारता इनसानी दोस्ती की कितनी बड़ी प्रचारक है, इसका अंदाजा केवल इससे लगाया जा सकता है कि उनके आत्मबोध के समर्थक हर तबके में पाए जाते हैं.

वे रामकथा मंच को मानवता मंच के रूप में प्रस्तुत करने और आज के संदर्भों से जोड़कर जीवन दर्शन बनाने वाले शायद एकमात्र कथावाचक हैं, जो बिखरों को समेटने और बिगड़ों को संभालने में लगे हैं. प्रवचन किसी को लोकप्रिय तो बना सकता है, मनप्रिय वही हो सकता है.

जिसकी साधना समर्पण आधारित हो, जो कर्म वचन वाणी का सच्चा साधक हो. शायद मोरारी बापू के मनमोहन होने का बड़ा रहस्य यही है कि वे जो कहते हैं, सोचते हैं, वही जीते हैं. उनकी कथनी-करनी में विरोधाभास नहीं.

बापू आत्मा के भाषायी रंगों के प्रवक्ता हैं, इसीलिए अच्छी शायरी के पारखी भी हैं और प्रेमी भी. वे अपने प्रवचनों में प्रसिद्ध शायरों के शेर मुनासिब संदर्भों में कुछ इस प्रकार से प्रयोग करते हैं कि अर्थों की नई तहें खुलने लगती हैं.

शायरी को मान्यता देना, शायरों का मान-सम्मान करना और अपने लाखों सुनने वालों के बीच आमंत्रित कर सुनवाना उनकी कितनी बड़ी सोच और कितने बड़े विजन को दर्शाता है.

उनकी यह प्रेरणा हिंदुस्तानी शायरों तक ही सीमित नहीं, नाथद्वारा (राजस्थान) की आध्यात्मिक धरती पर दो बार हिंदो-पाक मुशायरों का आयोजन उन्हीं के संरक्षण में हुआ.

उनकी इंसानियत की पैरवी उनका बरताव है और हिंदुस्तानियत की पहरेदारी उनका स्वभाव. आज की विषम परिस्थितियों में भी वे इसी प्रकार मेरे शेर का पात्र बनकर जगमगाते रहें: ये मैं ही था बचाके खुद को ले आया कनारे तक, समंदर ने बहुत मौका दिया था डूब जाने का.  

वो भीड़ में भी जाए तो तन्हा दिखाई दे
-मुनव्वर राणा, शायर

बापू स्टेज के अलावा बहुत कम बोलते हैं क्योंकि यह काम उनकी साहिराना आंखें करती हैं. वे बोलती भी हैं और पूछती भी हैं. इससे जुड़ा दिलचस्प वाकया सुनाते हैं आपको. बनारस में कपड़ों के मशहूर व्यापारी दीनदयाल अग्रवाल के डगमगपुर स्थित फार्महाउस पर बापू ने मुझे और बुद्धिसेन शर्मा को शायरी सुनाने के लिए बुलाया था.

जालान साहब की कार एअरपोर्ट से मुझे लेकर रवाना हुई, ड्राइवर ने फार्महाउस के  कायदे-कानून से मुझे आशना कराया. सैकड़ों बीघे में फैले फार्महाउस में सिगरेट या शराब मना थी. वहां जालान साहब मुझे बापू के पास लेकर पहुंचे.

मैंने निहायत बेतकल्लुफी से सिगरेट की पाबंदी वाला कानून उनको बता दिया. वे एक लम्हे के लिए खामोश रहे फिर उनके चेहरे पर हल्की-सी नागवारी दिखाई दी. वे जालान साहब से बोले, 'जो शायर और कवि हैं, मैं उन्हें यहां अपना इल्म बढ़ाने के  लिए बुलाता हूं, मैंने तो (कवि गोपालदास) नीरज जी के सिलसिले में भी कभी कुछ नहीं कहा, क्योंकि ये लोग अपनी तरंग में नहीं होंगे तो खुलेंगे भी नहीं.

संतों और सूफियों का चुप रहना और शायरों का खुलना जरूरी होता है. वरना आश्रम और खानकाहें बीमार-बीमार लगती हैं.”

कुछ इसी तरह का एक वाकया पाकिस्तान के शायर मरहूम अहमद फराज साहब से जुड़ा है. 2007 की बात है. नाथद्वारा के मुशायरे में लगभग डेढ़ दर्जन हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी शायर मौजूद थे. राजस्थान में बीजेपी की हुकूमत थी.

बापू स्टेज के नीचे श्रोताओं में मसनद के सहारे बैठे थे. फराज साहब मुझसे कहने लगे कि इस शहर में जब तक बापू हैं, शराब की दुकानें बंद हैं और पीने पर भी नैतिक पाबंदी है. मैंने चुपके से पूछा कि आप बहुत प्यासे हो रहे होंगे.

वे बोले कि ''शराब तो मेरे पास अच्छी-खासी मौजूद है, लेकिन मोरारी बापू जैसे संतों का एहतराम भी हमारे जैसे कलंदर ही करते हैं. 34 वर्ष में यह पहली शाम है जब मैं अपनी प्यास पर फख्र कर रहा हूं.”
पांच बरस पहले कुंभ मेले में बापू की रामकथा का पहला दिन था.

बैठने के इंतजाम में कुछ कमियां रह गई होंगी. बापू ने अरब की धार्मिक महिला राबिआ बसरी के एक किस्से से कथा शुरू की. अरब का बड़ा धार्मिक जत्था राबिआ से मिलने आया और आश्रम में घुसते ही फर्नीचर के बारे में पूछा.

राबिआ ने हाथ जोड़कर कहा कि फर्नीचर से इतना ही प्रेम है तो साथ लाना था. धर्मगुरु ने कहा कि वे सफर में हैं. राबिआ ने मुस्कराते हुए कहा कि यह दुनिया सराय है और हम सब मुसाफिर. इस तरह संदेश देते हैं बापू.

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