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स्मृतिः पौराणिक को आधुनिक बनाया उन्होंने

उन्होंने हमेशा डूबकर लिखा. लिखने के प्रति जुनून के चलते नियमित प्राध्यापकी छोड़ी. वे लक्ष्य के प्रति निर्ममता की हद तक समर्पित थे. उनके व्यक्तिगत जीवन में हर धारा के मित्र थे

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नरेंद्र कोहली 1940-2021 नरेंद्र कोहली 1940-2021

यशवन्त व्यास

इन दिनों किसी व्यक्ति के जाने पर लिखना जैसे लिखना नहीं रहा. उसे दुबारा पढ़ना हो गया है. अवाक्, स्तब्ध, क्षुब्ध, दुखी, प्रार्थनारत या स्मृतिबद्ध जैसे शब्द यकायक पट्टियों में बदल गए हैं जिन्हें आप हर सूचना के बाद क्रम से रखते जाते हैं. जब सूचनाओं की मार से कुछ उबरते हैं तो पलटकर तमाम प्रसंगों की नब्ज टटोलने लगते हैं.

नरेंद्र कोहली उस कोरोना-कालखंड में गए हैं जो स्वयं फिलहाल जाने से इंकार कर रहा है. वे उस वक्त में भी गए हैं जबकि उनके लेखन-जीवन के नए प्रशंसक-संसार ने समकालीन राजनीतिक प्रासंगिकता को संबोधित करना शुरू ही किया था.

कोहली, 'कहानी' काल के थे. जिन्हें भीष्म साहनी और अमृत राय संपादित नई कहानियां याद हों, वे पाएंगे कि उन पन्नों पर पहले जमशेदपुर और फिर दिल्ली से नरेंद्र कोहली का पता मिलता है. 1966 में वे 'सार्थकता' जैसा डार्क ह्यूमर लिख रहे थे. एक चौकीदार, महिला का अंतर्वस्त्र लिए लिए फ्लैट-दर-फ्लैट घूम रहा है—ये आपका है? 1967 में कगार का निषेध की पारिवारिकता और 1971 में हलवाई की शरारत का हल्का-फुल्का आनंद उनकी आरंभिक दुनिया को समझने के लिए काफी हैं. वे व्यंग्य कथाओं के करुण हस्ताक्षर उठाते थे. शम्बूक का वध' और आश्रितों के विद्रोह के साथ पांच एब्सर्ड उपन्यास या एक और लाल तिकोन तक वे सामाजिक अंतर्विरोधों से भावुक सच्चाइयों को अलग करते हुए पहुंचे तो उनका लक्ष्य स्पष्ट हो चुका था. वे उस दिशा में जा रहे थे जहां उन्हें स्वाभाविक विश्राम मिलता और वे अपने उद्वेग को संपूर्ण रचनात्मक वेग में बदल पाते.

वे 'वाम' से 'राम' की तरफ मुड़े.

मुख्यधारा का साहित्य प्रगतिशील आलोचनाओं के ठाठ से अभिषिक्त होता है. और, उनकी दीक्षा में क्या था? खुद कोहली ने एक जगह कहा है, ''एक ओर वे लोग थे जो यह कह रहे थे कि यह सामंती, साम्राज्यवादी, पुरानी मान्यताओं को स्थापित करने वाला लेखक है, इसलिए प्रगतिशील नहीं है. दूसरी तरफ वे लोग थे, जो यह कह रहे थे कि यह तो कम्युनिस्ट रामायण हो गई, इसमें तो आज के सारे सिद्धांत आ गए. क्या व्यक्ति का विकास नहीं होता? एक वह समय था, जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ का उपाध्यक्ष था, एक समय वह था जब मैं सीपीएम के प्रत्याशियों के लिए वोट मांगता फिरता था. लेकिन अब मैं दूसरी तरह का व्यक्ति हूं और मुझे लगता है कि मेरी अपनी स्वाभाविक दिशा यही थी और है.''

इस तरह पारिवारिक करुणा, पीड़ा और डार्क ह्यूमर का रचनाकार अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए पुराकथाओं के रहस्यवाद में उतर गया. उन्हें एहसास हुआ कि ठेठ भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में उतरे बिना वैचारिक अधिष्ठान संभव नहीं है. बाबा नागार्जुन में सुदामा की झलक देखने से शुरू अभिज्ञान, कृष्ण-कथा के वैभव में उतर गया. उन्होंने रामकथा के बाद महाभारत पकड़ी और महासमर में आध्यात्मिकता को ज्याद गहरा पाया. आखिर, विवेकानंद तक पहुंचे.

देखना दिलचस्प है कि कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की वंशी की धुन इसकी पूर्ववर्ती है और हाल का समकाल देवदत्त पटनायक की पॉप-व्याख्याओं और अमीश त्रिपाठी के जनरेशन-जेड के वारियर ऑफ मिथिला से आक्रांत है. धर्म को डिकोड किया जा रहा है. पुनर्व्याख्याओं का दौर है. विवेकानंद जैसे चरित्र फिर लोकप्रिय विमर्श के केंद्र में हैं. सत्ता और राष्ट्रवाद के अंतर्सबंधों की फिर से पड़ताल हो रही है. कुछ खोए हुए शब्द फिर से सतह पर हैं, कुछ दबे हुए संदर्भ अपनी ही शक्ति से पुनर्जीवन पा रहे हैं. ऐसे समय में नरेंद्र कोहली सहज ही प्रतिधारा के प्रिय संबोधन बन गए हैं.

उनकी लोकप्रियता और मुख्यधारा की स्वीकार्यता के बीच स्वाभाविक द्वंद्व था. जाहिर है इसके पीछे के कथित 'वैचारिक शत्रुत्व' को वे न सिर्फ रेखांकित करते थे बल्कि उन्होंने समय-समय पर अपने प्रत्याख्यान को शब्द भी दिए.

उन्होंने हमेशा डूबकर लिखा. लिखने के प्रति जुनून के चलते नियमित प्राध्यापकी छोड़ी. वे लक्ष्य के प्रति निर्ममता की हद तक समर्पित थे. उनके व्यक्तिगत जीवन में हर धारा के मित्र थे. शिष्य मंडली में भांति-भांति के लोग थे.

और, खुद उनके शब्दों में, कई ऐसे थे जो उन्हें बेहद प्रेम करते थे, घर आते थे लेकिन 'वैचारिक शत्रुओं के साथ' होने से सार्वजनिक मंच साझा करने से भी बचते थे.

लेकिन, क्या इसमें कोई संदेह है कि 'पौराणिक आधुनिकतावाद' के उनके विपुल रचना संसार का एक विशाल पाठक वर्ग उनके साथ हमेशा अपना अंतर साझा करने के लिए खड़ा रहेगा?

यशवंत व्यास चर्चित लेखक और व्यंग्यकार हैं

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