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बेखौफ फिल्मकार

फिल्मकार मृणाल सेन का 31 दिसंबर को 95 साल की उम्र में निधन हो गया. वे हमेशा प्रयोगशील बने रहे

मृणाल सेन 1923-2018 मृणाल सेन 1923-2018

मृणाल सेन ने अपनी पहली फिल्म 1955 में बनाई थी. उसी साल उनके समकालीन सत्यजित रे ने शानदार पदार्पण किया था. पथेर पांचाली ने रे को रातोरात सनसनी बना दिया. दूसरी लोकप्रिय फिल्मों की छाया तले सेन की रात भोरे का पता ही न चला. उन्हें दूसरी फिल्म बनाने में चार साल लगे. 1959 में आई नील आकाशेर नीचे एक राष्ट्रवादी बंगाली महिला के साथ प्रवासी चीनी फेरीवाले के रिश्ते की कहानी थी, जो हिट रही.

जवाहरलाल नेहरू और कम्युनिस्ट पार्टी दोनों ने इसकी तारीफ की. हालांकि बाद में उन्होंने इसके जज्बातीपन को लेकर शर्मिं दगी जाहिर की, पर इसने एक शानदार करियर तो लॉन्च कर ही दिया.

1960 और 2002 के बीच सेन ने कोई 25 फिल्में बनाईं. इनमें बेहद असरदार अकालेर संधाने से लेकर गुस्ताख भुवन शोम तक अलहदा फिल्में थीं. सेन ने आदिवासी-औपनिवेशिक ड्रामे (मृगया) को उतनी ही आसानी से संभाला जितनी आसानी से नक्सल राजनीति (कलकत्ता त्रयी) को या मध्यम वर्ग की नैतिकता (एक दिन प्रतिदिन) को. वे खांटी सियासी थे, पर कभी किसी पार्टी लाइन पर नहीं चले और हालांकि साहित्य से प्रेरणा लेते थे, पर आख्यान से ज्यादा उनकी दिलचस्पी एपिसोडिक फॉर्म में होती थी.

फरीदपुर (अब बांग्लादेश में) एक वकील के घर जन्मे सेन स्कॉटिश चर्च कॉलेज में पढ़ाई के लिए 1940 में कलकत्ता आ गए. उनका विषय हालांकि भौतिक शास्त्र था, पर राजनीति और साहित्य उन्हें ज्यादा खींचता था. बेरोजगारी की हालत में इंपीरियल (अब नेशनल) लाइब्रेरी उनके हाथ लग गई, जहां वे रोज 10 घंटे बिताते. यह सिलसिला पांच साल चला. यहां उन्होंने कई चीजों के बारे में जाना, जिनमें सिनेमा भी शामिल था. वे उस वक्त के गहमागहमी से भरे मार्क्सवादी अड्डों में शिरकत करते, इप्टा के नाटक देखते (यहीं ऋत्विक घटक से मिले) और फिर कलकत्ता फिल्म सोसाइटी से जुड़े.

सेन को बंधे-बंधाए रास्तों की बजाए नई पगडंडियों ने ज्यादा उत्साहित किया. 1965 में बॉम्बे में द 400 ब्लोज देखकर वे इतने रोमांचित हुए कि उन्होंने अपनी अगली फिल्म आकाश कुसुम में फ्रांस के न्यू वेव सिनेमा के जंप कट, वॉइसओवर, स्टिल्स और फ्रीज फ्रेम अपना लिए. उनकी राजनीति बेधड़क और निर्भीक थी. बाद के सालों में जब उनसे पूछा गया कि उनकी शानदार फिल्म खारिज में मृत नौकर लड़के के पिता ने लापरवाह, जातिवादी मालिक को कभी चांटा रसीद क्यों नहीं किया, सेन ने एक मायने में कहा था, ‘‘उसने चांटा रसीद किया था. उसने हम सबको रसीद किया था. आपने महसूस नहीं किया?’’ किया था, मिस्टर सेन, हमने किया था.

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