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स्मृतिः हमें आपसे भी जुदा कर चले

जब भी हिंदी सिनेमा में अच्छे और अर्थपूर्ण लेखन की बात उठेगी, सागर सरहदी सबसे आगे की पंक्तियों में बैठे हुए नजर आएंगे. मुफलिसी को सम्मान देने का उनका अंदाज याद आएगा कि वे बेरोजगार संघर्षशीलों को हर शाम चाय की दावत देते थे

सागर सरहदी 1933-2021 सागर सरहदी 1933-2021

अविनाश दास

मुंबई शहर के अंधेरी पश्चिम में उनका एक छोटा-सा कमरा था. उस कमरे में कुछ आवारा संघर्षशील युवा हमेशा जमे रहते थे, जमीन पर बैठे और लोटे हुए. पतली-सी एक पुरानी चौकी थी, जिस पर बरसों पुराना एक गद्दा और महीनों बिना धुली हुई चादर पर सागर सरहदी शाम को ठीक चार बजे आकर जम जाते थे. कबाड़ की तरह जमे हुए युवाओं से अलहदा उनके हाथ में कोई किताब होती थी. दूसरे हाथ की उंगलियों में फंसाकर आधी जली हुई सिगरेट का कश लेते रहते थे. पास में रखे स्टूल पर शीशे के ग्लास में लाल चाय रखी होती थी, जिसको देख कर रम का आभास होता था.

बीच-बीच में नजर उठा कर किसी को गाली देते और फिर दुनिया-जहान की बातें करने लगते थे. सालों से उनकी शामें यहां बीतती रही थीं. यह उनका तथाकथित दफ्तर था, जो सायन के उनके घर से लगभग पचास किलोमीटर की दूरी पर था. कभी बस से आते थे, कभी टैक्सी से, कभी ऑटो से. मायानगरी के चमकदार वैभव पर तंज कसने का सागर सरहदी का यह अपना तरीका था.

बरसों पहले दिल्ली में राजकमल प्रकाशन के दफ्तर में उनसे पहली मुलाकात हुई थी. कहानियों की उनकी किताब जीव-जनावर वहां से छप रही थी. इस किताब की चर्चा हिंदी में ज्यादा नहीं हुई, लेकिन सागर सरहदी अदबी संवेदना वाले रचनाकार थे. 1976 में यश चोपड़ा ने एक सुपरहिट फिल्म बनाई थी कभी कभी. सरहदी साहब ने फिल्म का स्क्रीनप्ले और डायलॉग लिखा था. एक दृश्य में अमिताभ बच्चन और राखी के बीच का यह संवाद देखिए.

अमित (अमिताभ): आपने कभी अपनी आंखें देखी हैं?

पूजा (राखी): क्यूं? कोई खास बात है?

अमित: जहां देखती हैं, एक रिश्ता कायम कर लेती हैं!

कभी कभी में सागर सरहदी की कलम के इस जादू ने बॉलीवुड में उनका रंग जमा दिया. इससे पहले बासु भट्टाचार्य की फिल्म अनुभव के संवाद उन्होंने लिखे थे, लेकिन कभी कभी के बाद हर बड़े निर्देशक ने उन्हें अपने प्रोजेक्ट से जोड़ा. उन्होंने सोलह फिल्में लिखीं, जिनमें सिलसिला, चांदनी, दीवाना और कहो न प्यार है ने कामयाबी की नई मंजिलें तय कीं. इन्हीं सोलह फिल्मों में बाजार भी थी, जिसे सागर साहब ने निर्देशित भी किया था और जो व्यावसायिक और कला सिनेमा के बीच एक खूबसूरत कड़ी साबित हुई. बाजार फारूक शेख, स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह और सुप्रिया पाठक के अभिनय की ऊंचाइयों के लिए हमेशा याद रहेगी. साथ ही मखदूम मोहिउद्दीन की गजल फिर छिड़ी बात रात फूलों की के लिए भी. सागर प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट से जुड़े थे और मखदूम का जीवन और लेखन भी मजदूरों के संघर्ष से वाबस्ता था. बाजार में पाये के गीतकारों को एक जगह इकट्ठा कर लिया गया था, मसलन मीर तकी मीर, मिर्जा शौक, बशर नवाज और जगजीत कौर. संगीतकार खय्याम थे.

1983 में इस फिल्म को फिल्म फेयर अवार्ड के लिए हर कैटगरी में नॉमिनेट किया गया था. लेकिन बॉलीवुड का बाजार मुनाफा देखता है और सागर सरहदी की बाजार ने मुनाफे के अलावा सब कुछ कमाया. यही वजह है कि वे फिर कभी बाजार की लोकप्रियता को दोहरा नहीं पाए. उनकी आखिरी फिल्म नवाजुद्दीन सिद्दीकी और अमृता सुभाष के अभिनय वाली चौसर कभी रिलीज नहीं हो पाई और बाजार का सीक्वल बनाने का सपना लिए हुए सागर सरहदी इस दुनिया से विदा हो गए.

पाकिस्तान के ऐबटाबाद के निकट बफ्फा में 11 मई 1933 में पैदा हुए सागर सरहदी का असली नाम गंगा सागर तलवार था. तेरह साल की उम्र में वे हिंदुस्तान आए और ताउम्र विभाजन का दर्द उन्होंने अपने दिल में महसूस किया. पाकिस्तान में जहां वे रहते थे, वहां से अफगानिस्तान और हिंदुस्तान की सरहद शुरू होती थी, इसलिए बाद में जब लगा कि उन्हें एक अदबी तखल्लुस की जरूरत है, तो उन्होंने अपना सागर सरहदी रख लिया.

जब भी हिंदी सिनेमा में अच्छे और अर्थपूर्ण लेखन की बात उठेगी, सागर सरहदी सबसे आगे की पंक्तियों में बैठे हुए नजर आएंगे. मुफलिसी को सम्मान देने का उनका अंदाज याद आएगा कि वे बेरोजगार संघर्षशीलों को हर शाम चाय की दावत देते थे. दूर-दराज के कस्बाई सांस्कृतिक आयोजनों में ट्रेन के मामूली क्लास से उनका जाना याद आएगा और ऊंच-नीच का भेद किए बिना हर किसी को प्यारी गालियों की घुड़की देना याद आएगा.

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

गुजरते वक्त की हर मौज ठहर जाएगी

अविनाश दास पटकथा लेखक और निर्देशक हैं

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