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स्मृतिः होशियार कूटनीतिज्ञ

रणनीतिक मामलों और विदेश नीति में जसवंत सिंह की विशेषज्ञता का इस्तेमाल भारत के एटमी सिद्धांत को गढ़े जाने के दौरान किया गया

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जसवंत सिंह 1938-2020 जसवंत सिंह 1938-2020

यशवन्त सिन्हा

जसवंत सिंह के निधन से मुझे गहरा दुख हुआ. वे मेरे बेहद सम्मानित सहकर्मी थे, सरकार में भी और उस पार्टी में भी जिससे हम दोनों ही जुड़े थे और जिसके वे संस्थापक सदस्य थे. बड़े ही शालीन व्यक्ति और निष्ठावान सेना अधिकारी रह चुके जसवंत समझदार राजनयिक और बेहतरीन प्रशासक भी थे. वे उम्दा सांसद भी थे जिन्होंने अलग पहचान बनाई थी.


मेरे सार्वजनिक जीवन में आने से पहले से ही वे राजनीति में थे पर हम दो अलग-अलग पार्टियों में थे. हम दोनों के नाम ध्वनि लिहाज से समान थे जिससे कई बार भ्रम और हास्य की स्थिति पैदा हो जाती है. जिस दिन उनका निधन हुआ, किसी समाचार चैनल के एक पत्रकार ने मुझे फोन करके कहा कि 'जसवंत सिन्हा' का निधन हो गया है और मैं एक शोक संदेश रिकॉर्ड करा दूं. कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने समझा कि मेरी मृत्यु हो गई थी. मुझे याद है, एक बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े ने विपक्षी पार्टियों के नेताओं की बैठक बुलाई. मुझे भी शामिल होने का संदेश मिला जबकि हम दोनों ही जनता पार्टी में थे.

मैं कर्नाटक भवन पहुंचा और जब हेगड़े ने जसवंत सिंह के बारे में पूछा तो पता चला कि नाम के कारण गलतफहमी हो गई थी. 1988 में जब मैं राज्यसभा में पहुंचा तो हम दोनों करीबी सहकर्मी बन गए. एक बार जब जनता पार्टी और भाजपा ने राजस्थान में विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन बनाने का फैसला किया तो हमने साथ मिलकर काम करते हुए रिकॉर्ड समय में सीटों के बंटवारे का फार्मूला तैयार कर लिया था. वे बहुत ईमानदार वार्ताकार थे. राज्यसभा में हम दोनों ही नए-नए आए थे. मैं उन्हें ध्यान से देखता था कि वे कितने स्पष्ट तरीके से अपने विचार रखते थे. हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं पर उनका अधिकार गजब का था. उनका हास्यबोध भी निराला था. एक वित्त विधेयक पर चर्चा के दौरान एक असंगत कर प्रस्ताव पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था: ''यह इस काबिल भी नहीं कि इससे अपने लिए एक बोतल व्हिस्की खरीद सकूं.''


मैं जब भाजपा में शामिल हुआ तब एहसास हुआ कि जसवंत सिंह पार्टी में एक महत्वपूर्ण नेता थे. बैठकों के दौरान वे वाजपेयी, आडवाणी और ग्वालियर की राजमाता सिंधिया के साथ मंच पर बैठा करते थे. उन्हें आम तौर पर राजनैतिक प्रस्ताव तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी जबकि मैं आर्थिक प्रस्ताव तैयार करता था. हम अक्सर आपस में विचारों का आदान-प्रदान किया करते थे. मई 1998 में उनके योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहने के दौरान भारत ने पोकरण में एटमी परीक्षण किया था.

वाजपेयी जी ने मुझे भी भरोसे में लिया था लेकिन परीक्षण की निश्चित तारीख के बारे में मुझे जानकारी नहीं थी. एक दिन जसवंत सिंह ने मुझे फोन किया और पूछा कि क्या मैं एक जरूरी बैठक के लिए 5, रेसकोर्स रोड आ सकता हूं? मैंने तपाक से पूछा, ''तो क्या हो गया.'' उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. यह अत्यंत गोपनीय ऑपरेशन था और किसी को एक भी लफ्ज बोलने की मनाही सी थी. हम मिले. वाजपेयी ने मीडिया के सामने जो नोट पढ़ा था और जो पत्र तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को भेजा गया, उन दोनों को ही इस बैठक में तैयार किया गया था.


अमेरिका समेत ज्यादातर शक्तिशाली देशों ने परीक्षण की इस घटना को पसंद नहीं किया. उन्होंने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए और भारत राजनैतिक रूप से अछूत समझा जाने लगा. दुनिया को अपना पक्ष समझाने का काम जसवंत सिंह को सौंपा गया. तत्कालीन अमेरिकी उप-विदेश मंत्री स्ट्रोब टैलबोट के साथ उनकी मुलाकात अब एक इतिहास है. इस मुलाकात ने एटमी और अन्य विषयों पर अमेरिका के साथ रचनात्मक बातचीत की एक नींव तैयार की और हमारे रिश्तों में नए दौर की शुरुआत हुई.


वर्ष 2000 में जब राष्ट्रपति क्लिंटन भारत के दौरे पर आए तो यह जसवंत सिंह के ही चातुर्य और उनकी कड़ी मेहनत का नतीजा था कि विश्व समुदाय के समक्ष भारत का पक्ष मजबूती से रखा जा सका. उन्होंने जब भारत के एटमी सिद्धांत का मसौदा तैयार किया तो इसमें रणनीतिक मामलों, सुरक्षा के मुद्दों और विदेश नीति पर उनकी विशेषज्ञता का पूरा उपयोग किया गया. यहां तक कि जब हम विपक्ष में थे तो भी उन्होंने एटमी सौदे और नागरिक दायित्व कानून पर भाजपा का पक्ष तैयार किया था.


वर्ष 2014 में लोकसभा के आखिरी सत्र के दौरान सेंट्रल हॉल में उनके और मुरली मनोहर जोशी के साथ कॉफी पीते हुए मैंने कहा कि मैं 'गोलघर' वापस आने के लिए अब कोई चुनाव नहीं लड़ूंगा. दूसरी तरफ जसवंत सिंह ने कहा कि बाड़मेर के लोग चाहते हैं, वे आखिरी बार एक और चुनाव लड़ें लेकिन उन्हें टिकट ही नहीं दिया गया. इससे उन्हें गहरा दुख पहुंचा. 2009 में जिन्ना पर उनकी पुस्तक के बाद उन्हें बड़े ही असम्मानित तरीके से पार्टी से निकाल दिया गया. साल भर बाद उन्होंने लौटने की इच्छा जाहिर की थी. यह बात मैंने आडवाणी जी को बताई, जिसके बाद वे उनसे मिले और रास्ता साफ हुआ. अपनी इस छोटी-सी भूमिका से मुझे खुशी हुई. पर 2014 में उन्हें टिकट न मिलने और उस पार्टी में उपेक्षित कर दिए जाने के दर्द ने उन्हें आहत कर दिया था जिसकी वे धुरी हुआ करते थे.

—अनिलेश एस. महाजन के साथ बातचीत के आधार पर

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