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भोपाल का वह बेबाक किस्सागो

संजय को अपनी तारीफ करते मैंने शायद ही कभी सुना हो. दिल्ली में रहते हुए वे सीरियल लिख रहे थे, कुछ में अभिनय भी किया था लेकिन उन्होंने कभी इसका जिक्र तक नहीं किया.

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संजय चौहान
संजय चौहान

संजय चौहान 1962-2023

संजय चौहान चले गए. वे अपनी ही जिंदगी की स्क्रिप्ट की ऐसी एंडिंग लिख जाएंगे, यह तो लीक से हटकर लिखने वाला उनके जैसा कोई स्क्रिप्टराइटर ही कर सकता है. उन्हें जानने वाले इस अप्रत्याशित खबर से हैरान हैं. लेकिन वे होते तो कहते, 'यह चले गए क्या होता है? तुम तो ऐसा कह रहे हो जैसे संजय कोई पहले आदमी हैं जो चले गए या किसी का कुछ लेकर चले गए. भाई, पता कर लो. किसी का कुछ लेकर नहीं गया हूं.’ इसके साथ ही वे जोर का ठहाका लगाते और पूरा माहौल ठहाकों से भर जाता. ऐसा था उनका बेरहम सेंस ऑफ ह्यूमर.

नब्बे के दशक में इंडिया टुडे हिंदी के संपादकीय विभाग में हमने वर्षों तक साथ काम किया. मेरे साथ उनकी कुछ ज्यादा ही ट्यूनिंग थी. उन दिनों के हमारे एक अन्य सहकर्मी और अभी बीबीसी हिंदी के डिजिटल एडिटर राजेश प्रियदर्शी मजाक में कहा करते थे कि संजय भाई के आते ही आप मानो रैकेट लेकर खड़े हो जाते हैं, ऐसे जैसे कि अब बैडमिंटन के दो खिलाड़ियों के बीच दिलचस्प मुकाबला होने जा रहा है. संजय का सेंस ऑफ ह्यूमर गजब का था और मन शीशे की तरह साफ. काम का कितना भी दबाव हो, वे बीच-बीच में हंसी की फुहारें छोड़ते रहते थे.

संजय बात तो वैसे अच्छी तरह से ही करते लेकिन गालियां उनके मुंह से इतनी सहज और आत्मीय होकर निकलतीं कि मैं ताकता रह जाता. एक दिन मैंने उनसे इस मामले में उनके 'आत्मविश्वास’ का राज पूछ ही लिया. उन्होंने लपककर जवाब दिया, ''भई, मैं भोपाली हूं. भोपाल अपनी गालियों के लिए मशहूर है. वहां के लोग नई-नई गालियां ईजाद करने के लिए कुख्यात हैं.’’ गांधी जी के भोपाल प्रवास और वहां गालियों से उनका साबका पड़ने संबंधी चुटकुला वे कुछ इस अंदाज में सुनाते कि आसपास बैठा हर शख्स पेट पकड़कर हंसने लगता.

वे मध्य प्रदेश में ही किसी डिग्री कॉलेज में कुछ समय के लिए हिंदी के प्रवक्ता भी रहे थे. एक दिन संजय और कुछ अध्यापक-प्रिंसिपल के साथ चहलकदमी कर रहे थे. तभी संजय ने जेब से सिगरेट निकालकर सुलगाई. यह देख सारे अध्यापक तो सहम गए और डर के मारे संजय से दूर खिसक लिए, जैसे प्रिंसिपल से कह रहे हों कि मैं इस आदमी के साथ नहीं हूं. लेकिन संजय पर ऐसी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था.

संजय को अपनी तारीफ करते मैंने शायद ही कभी सुना हो. दिल्ली में रहते हुए वे सीरियल लिख रहे थे, कुछ में अभिनय भी किया था लेकिन उन्होंने कभी इसका जिक्र तक नहीं किया. पत्रकारिता करते हुए भी उनके मन में कहीं न कहीं फिल्मों के लिए लिखने का जज्बा दबा हुआ था. यह हिम्मत की ही बात थी कि वे जमी-जमाई नौकरी छोड़कर मुंबई गए, जहां उन्हें पैर जमाने के लिए तमाम कटु अनुभवों का सामना करना पड़ा.

इसके कई किस्से उन्होंने सुनाए थे. महाभारत सीरियल के शीर्ष अभिनेताओं में से एक ने उनसे एक सीरियल के लिए एपिसोड लिखवाया लेकिन पैसे नहीं दिए. एक बार तो कहानी के सिलसिले में उन्हें अपने निर्माता-निर्देशक के साथ कहीं बाहर जाना था. जब वे एयरपोर्ट पहुंचे तो पता चला कि उनका टिकट ही नहीं है, उन्हें मना कर दिया गया है. जवाब में संजय ने भोपाली अंदाज में उनकी खबर ली.

बहरहाल, संजय किसी तरह का समझौता किए बगैर जमे रहे और ज्यादातर अपनी पसंद का स्तरीय काम किया. आइ ऐम कलाम  लीक से हटकर ऐसी ही एक फिल्म थी जिसे फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला. अपनी तरह के लाउड अभिनय के लिए जाने जाते रहे गुलशन ग्रोवर उसमें ढाबा मालिक की भूमिका निभा रहे थे. संजय ने उनसे साफ शब्दों में कह दिया था कि उन्हें इसमें फैलना नहीं है, बल्कि बहुत सहज तरीके से अपनी भूमिका निभानी है.

मैंने फिल्म देखी तो ग्रोवर का काम देखकर चकित रह गया. अपनी जानी-पहचानी छवि से बिल्कुल अलग एक सीधा-सादा और सरल स्वभाव वाला ढाबा मालिक. उनकी ऐसी ही बेबाकी और साफगोई का एक और वाकया है. एक बार सनी देओल की किसी फिल्म के सिलसिले में वे पूरी यूनिट के साथ किसी हिल स्टेशन पर गए थे. वे रात में देर तक काम करते थे और सुबह देर से उठ पाते. लेकिन वहां यूनिट के लोग अलस्सुबह उठकर देओल के साथ मॉर्निंग वॉक किया करते थे.

यूनिट के कुछ लोगों को यह बात अखरी. उन्होंने संजय से कहा कि वे भी सुबह जल्दी उठकर 'सनी सर’ के साथ वॉक पर जाया करें. उनका देर तक सोते रहना अच्छा नहीं लगता. संजय ने तपाक से सवाल किया, ''मैं यहां स्टोरी के लिए आया हूं या मार्निंग वॉक करने?’’

उनकी पत्नी सरिता का स्वभाव भी बहुत कुछ उनके ही जैसा रहा—किसी तरह की औपचारिकता से कोसों दूर. एक बार संजय के घर उनका कोई दोस्त खाने पर आया. खाने के दौरान उसे थोड़ी सब्जी लेनी थी. उसने कहा, ''भाभी जी, थोड़ी सब्जी चाहिए.’’ संजय बोले, ''भाभी जी नहीं, उधर रखी है सब्जी और बगल में रखी है चम्मच. खुद निकालो और खाओ.’’

जिंदगी के सफर में आपको बहुत लोग मिलते हैं, अच्छे भी और बुरे भी. आप उन्हें भूल जाते हैं. लेकिन कुछ लोग इतने अलग होते हैं कि उनकी यादें कभी धूमिल नहीं होतीं. संजय ऐसे ही थे. उन्हें थोड़ा भी जानने वाला कभी उन्हें भुला नहीं सकता. मैं भी उनमें से एक हूं. अलविदा! भाई संजय. 

प्रकाश श्रीवस्तव (प्रकाश श्रीवास्तव इंडिया टुडे (हिंदी) संपादकीय टीम का हिस्सा रहे हैं)

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