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सियासत का 'जादूगर'

राज्यसभा चुनाव के दौरान गहलोत ने भाजपा को बेचैन कर दिया और उसे अपने विधायक होटल में रखने पड़े

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सब पर भारी : राज्यसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद जयपुर में अशोक गहलोत सब पर भारी : राज्यसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद जयपुर में अशोक गहलोत

सोमवार, 6 जून की शाम. उदयपुर के एक पांच सितारा होटल में 'बाड़ेबंदी' में रखे गए कांग्रेस विधायकों के मनोरंजन के लिए जादूगर आंचल अपने करतब दिखा रही थीं. विधायकों को मैजिक नंबर का जादू दिखाते हुए आंचल मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पास पहुंचीं तो उनके चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान उभर आई. गहलोत के चेहरे पर यह मुस्कान जादूगर आंचल के खेल को देखकर तो आई होगी, लेकिन उस मुस्कराहट में एक निश्चिंतता इसलिए भी होगी कि तब तक वे चार दिन बाद होने वाले सियासी खेल में अपना 'जादू' दिखाने की तैयारी पूरी कर चुके थे. 

गहलोत के पिता जादू के करतब दिखाते थे. खुद उन्होंने भी कुछ समय के लिए यह पेशा आजमाया था. माली जाति से ताल्लुक रखने वाले अशोक गहलोत का राजस्थान में कोई खास जातिगत आधार नहीं है. बावजूद इसके वे यहां तीसरी बार मुख्यमंत्री की पारी खेल रहे हैं, जाहिर है कि उनके हिस्से यह उपलब्धि बिना करिश्माई राजनीतिक कुशलता के नहीं आई और यही वजह है कि उन्हें राजस्थान की सियासत का 'जादूगर' भी कहा जाता है. खैर, चार दिन बाद यानी दस जून को प्रदेश में राज्य सभा की चार सीटों के लिए चुनाव थे, लेकिन इससे पहले ऐसा लग रहा था कि शायद कांग्रेस राजस्थान से अपने सिर्फ दो उम्मीदवार ही जिता पाएगी.

दरअसल जून की शुरुआत में बसपा से कांग्रेस में आए पांच विधायकों ने जब सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य पहुंचकर अपने तल्ख तेवर दिखाए तो हर कोई यह समझ रहा था कि राज्यसभा के लिए अब कांग्रेस के तीसरे उम्मीदवार प्रमोद तिवारी की जीत मुश्किल है. तब इन विधायकों में शामिल गहलोत सरकार के मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने कहा था, ''सरकार ने हमसे किए वादे नहीं निभाए हैं...'' राजनीतिक विश्लेषकों को इन विधायकों की कांग्रेस से दूर जाने की कोशिश हैरान कर रही थी. जाहिर है कि राजस्थान से कांग्रेस के तीसरे राज्य सभा उम्मीदवार प्रमोद तिवारी भी परेशान हुए होंगे. लेकिन दिलचस्प बात है कि तब भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिख रहे अशोक गहलोत के चेहरे पर तनाव के लक्षण दूर-दूर तक नहीं थे. शायद इसलिए कि उस पूरी समयावधि का कोई भी घटनाक्रम उनकी पटकथा से बाहर का नहीं था.

बताया जाता है कि इन पांच विधायकों के साथ दो निर्दलीय विधायकों के रूठने-मनाने से लेकर धौलपुर से भाजपा विधायक शोभारानी कुशवाहा के क्रॉस वोटिंग तक की पटकथा कई दिन पहले ही लिखी जा चुकी थी. और इस पटकथा के सूत्रधार थे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत. 

पटकथा यह कि सरकार पर वादाखिलाफी के आरोप लगाने वाले विधायक 8-10 घंटे बाद ही बाड़ेबंदी में जाने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ चार्टर प्लेन में सवार थे और हंसते हुए फोटो खिंचवा रहे थे. एक घंटे बाद उदयपुर में प्लेन उतरा तो विधायकों के सुर भी बदल चुके थे. सबसे पहला बयान राजेंद्र सिंह गुढ़ा का ही आया. उन्होंने कहा, ''हमारे गिले-शिकवे दूर हो गए हैं, सरकार से हमारी कोई नाराजगी नहीं है.'' फिर भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के दो और दो अन्य निर्दलीय विधायक भी कांग्रेस के कैंप में शामिल हो गए. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अशोक गहलोत जहां एक तरफ अपने रूठे साथियों को साधने में कामयाब रहे, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने आलाकमान को भी यह संदेश दे दिया कि राजस्थान में वे ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जो हर संकट से पार पा सकते हैं. यही नहीं, विरोधी खेमे में सेंध भी लगा सकते हैं.

इसकी एक बानगी उस वक्त मिली जब राज्य सभा के लिए मतदान में धौलपुर से भाजपा विधायक शोभारानी कुशवाहा ने कांग्रेस के प्रमोद तिवारी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की. हालांकि, उनका वोट खारिज हो गया, लेकिन इसका खमियाजा भाजपा समर्थित उम्मीदवार सुभाष चंद्रा को उठाना पड़ा. इसके अलावा गहलोत ने यहां भाजपा के भीतर भी एक तरह की बेचैनी पैदा कर दी थी, जिसके चलते पार्टी को अपने विधायकों को एक फाइव स्टार होटल में ठहराना पड़ा. 

कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव 2022 में राजस्थान से रणदीप सुरजेवाला, मुकुल वासनिक और प्रमोद तिवारी को उम्मीदवार बनाया था, जबकि भाजपा ने घनश्याम तिवाड़ी को आधिकारिक उम्मीदवार बनाकर, निर्दलीय सुभाष चंद्रा को समर्थन दिया था. 200 विधायकों वाले राजस्थान में तिवाड़ी को 43, रणदीप सुरजेवाला को 43, मुकुल वासनिक को 42 और प्रमोद तिवारी को 41 वोट मिले, जबकि सुभाष चंद्रा सिर्फ 30 वोट ही जुटा सके और इस बार उच्च सदन में जाने से चूक गए.

राजस्थान में इससे पहले भी कई ऐसे मौके आए हैं, जब अशोक गहलोत कांग्रेस आलाकमान को अपनी 'जादूगरी' दिखाने में कामयाब रहे हैं. इस पारी का पहला मौका तो 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ ही आ गया था. तब कांग्रेस को 199 (एक सीट पर उम्मीदवार का निधन होने की वजह से चुनाव टाल दिए गए थे) में से 99 सीटें मिली थीं. तब कांग्रेस को बहुमत जुटाने के लिए एक और विधायक के समर्थन की दरकार थी, और गहलोत ने 120 विधायकों का समर्थन जुटाकर राज्य में अपनी मजबूत सरकार बना ली.

इसके अलावा 2020 में उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के समर्थन में जब कांग्रेस के 19 विधायक सरकार से नाराज होकर गुड़गांव के पास मानेसर के एक होटल में जा बैठे थे, तब भी अशोक गहलोत ने अपनी सरकार को पूरी तरह सुरक्षित रखा. दिलचस्प बात यह रही कि इसके बाद वे और मजबूत बनकर उभरे और उनके प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट को न सिर्फ अपना पद गंवाना पड़ा बल्कि लंबे समय तक पार्टी में हाशिये पर भी रहना पड़ा. 

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन कहते हैं, ''सियासत के जादूगर अशोक गहलोत भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान की चाल चलते हैं. बहुत कम मौके ऐसे आए हैं, जब उन्हें अपनी किसी चाल में मात मिली हो. यही कारण है कि बिना किसी तरह का जातिगत आधार होने के बावजूद राजस्थान की राजनीति में वे इतने लंबे कार्यकाल तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले इकलौते नेता हैं.''

-आनंद चौधरी

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