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उत्तराखंडः हाथी, चुनाव चिह्न समझा है क्या!

हाथियों ने बसपा प्रत्याशी और उनके समर्थकों को काफी देर तक परेशान रखा. बाद में हाथियों ने यू-टर्न लेकर जंगल का रुख किया तभी इन सबकी जान में जान आई.

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काशी सिंह ऐरी काशी सिंह ऐरी

उत्तराखंड

उत्तराखंड के चुनावी रण में राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों को जंगली जानवरों की शांति में खलल डालने की कीमत भी चुकानी पड़ रही है. कहीं पहाड़ों में प्रत्याशी शाम ढलने के बाद प्रचार इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि गुलदार और तेंदुओं के हमले का खतरा रहता है. कहीं हाथी राह रोक रहे हैं.

कालाढूंगी के बसपा प्रत्याशी सुंदरलाल आर्य अपने समर्थकों के साथ शनिवार, 5 फरवरी को कोटाबाग प्रचार के लिए जा रहे थे कि सड़क पर खड़े  हाथियों ने उन्हें समर्थकों के साथ दौड़ा दिया. राहत वाली बात यह रही कि कोई अनहोनी घटना होते-होते बच गई. हाथियों ने बसपा प्रत्याशी और उनके समर्थकों को काफी देर तक परेशान रखा. बाद में हाथियों ने यू-टर्न लेकर जंगल का रुख किया तभी इन सबकी जान में जान आई.

हार का सबक
उत्तराखंड राज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले पृथक राज्य आंदोलन के अगुवा रहे काशी सिंह ऐरी ने इस साल राज्य के पांचवें विधानसभा चुनाव में हथियार डाल दिए हैं. उनके मुताबिक, उन्होंने चुनावी मैदान से हटने का फैसला इसलिए लिया क्योंकि उनके पास न धनबल है न बाहुबल.

उत्तराखंड क्रांति दल के अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी पहली बार 1985 में डीडीहाट सीट से चुनाव जीतकर यूपी विधानसभा पहुंचे थे. इसके बाद अविभाजित यूपी में वे 1989 और 1993 में भी विधायक रहे. 1996 के चुनाव में वे बिशन सिंह चुफाल से हार गए.

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद हुए 2002 के विधानसभा चुनाव में वे कनालीछीना से विधायक चुनकर उत्तराखंड के सदन में पहुंचे थे. इसके बाद राज्य में हुए सीमांकन से उनकी सीट में हुए परिवर्तन के बाद वे लगातार अलग-अलग क्षेत्रों से चुनाव लड़े, लेकिन उन्हें हर बार हार का सामना करना पड़ा.

इस बार तो उन्होंने चुनाव ही न लड़ने की ठान ली. वे एकमात्र ऐसे विधायक रहे हैं जो विधायक रहने के दौरान भी रोडवेज की बसों में सफर करते दिख जाते थे.

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