scorecardresearch
 

महंगाईः आखिर सब कुछ इतना महंगा क्यों हो गया?

तेल के दाम कम हों तो कीमतों में गिरावट आ सकती है. सरकार को फिक्र इस बात की होनी चाहिए कि महंगाई लगातार बढ़ते रहने की आशंका पुख्ता हो सकती है

महंगाई में लगातार उछाल से जंग जारी है महंगाई में लगातार उछाल से जंग जारी है

भारत धीरे-धीरे महामारी से हुए आर्थिक नुक्सान से उबर रहा है लेकिन महंगाई में लगातार उछाल से जंग जारी है. सीपीआइ (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक जिसमें खाने-पीने की चीजें, आवास, कपड़े, परिवहन, इलाज, शिक्षा और ऐसे दूसरे खर्च शामिल हैं) पर आधारित महंगाई जून 2019 में 3.8 फीसद से करीब दोगुनी बढ़कर जून 2021 में 6.26 फीसद हो गई. यह लगातार दूसरा महीना था जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की 6 फीसद की सीमा से ऊपर थी. हालांकि यह जुलाई में कुछ कम होकर तीन माह के निचले स्तर 5.59 फीसद पर आ गई.

खाने-पीने की चीजों (खासकर दलहन और तेल) से लेकर ईंधन और बिजली तक सभी चीजों के दाम बढ़े. खाद्य महंगाई जून में 5.15 फीसद थी जो जुलाई में घटकर 3.96 फीसद पर आ गई, जबकि खाद्य तेलों और वसा की मंहगाई जून में 34.78 फीसद और जुलाई में 32.53 फीसद रही. (इस वर्ग की चीजें अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उतार-चढ़ाव से खासी प्रभावित होती हैं क्योंकि भारत खाद्य तेल की अपनी आधी जरूरत आयात से पूरी करता है.) ईंधन और बिजली की महंगाई जून में 12.68 फीसद से बहुत मामूली घटकर जुलाई में 12.38  फीसद पर आ गई. थोक महंगाई सूचकांक (डब्ल्यूपीआइ) पर आधारित महंगाई जुलाई में कुछ घटकर 11.16 फीसद रही, जो जुलाई 2020 में -0.25 फीसद थी.

भारत में महंगाई तेज मांग या बढ़ते वेतनों की वजह से नहीं बढ़ी. केंद्रीय उद्योग और वाणिज्य मंत्रालय के बयान में कहा गया कि जुलाई 2021 में महंगाई की ऊंची दर मुख्यत: निचले आधार प्रभाव और कच्चे तेल तथा प्राकृतिक गैस के साथ खनिज तेल, बुनियादी धातुओं, खाद्य उत्पादों, कपड़ों, रसायनों और रासायनिक उत्पादों सहित दूसरी चीजों के दाम में बढ़ोतरी की वजह से थी.

आखिर सब कुछ इतना महंगा क्यों हो गया
आखिर सब कुछ इतना महंगा क्यों हो गया

ईवाइ इंडिया के मुख्य नीति सलाहकार डी.के. श्रीवास्तव कहते हैं कि महंगाई को आग कई वजहों से लगी है. एक वजह आपूर्ति पक्ष की मुश्किलें हैं. दूसरी है कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें. भारत के भारी-भरकम अप्रत्यक्ष कर ढांचे ने इसे और पेचीदा बना दिया है. कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें बीते डेढ़ साल में करीब दोगुनी हो गईं, हालांकि कच्चा तेल करीब 70 डॉलर प्रति बैरल से अगस्त 2020 तक 63.20 डॉलर पर आ गया था. उधर, केंद्र सरकार ने मार्च 2020 और मई 2020 के बीच पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 65 फीसद और डीजल पर 101 फीसद बढ़ा दिया.

बढ़ती कीमतों का दोहरा बोझ पड़ता है. उपभोक्ता अपनी खरीद क्षमता गंवा बैठता है जबकि निर्माता के लिए लागतें बढ़ जाती हैं. नतीजा फिर वही, और ज्यादा महंगाई. तेल की कीमतें बढ़ने से भंडारण और ढुलाई की लागत भी बढ़ जाती है. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोटर्स ऑर्गेनाइजेशन (एफआइईओ) के डायरेक्टर जनरल और सीईओ डॉ. अजय सहाय कहते हैं कि निर्यात क्षेत्र में काम करने वाले कई एमएसएमई पहले ही कह चुके हैं कि प्रतिस्पर्धी बने रहना मुश्किल हो गया है. वे कहते हैं, ''हमने टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और प्लास्टिक के उत्पादों में लगने वाली चीजों के आयात की कीमतों में भारी बढ़ोतरी देखी है. इससे प्रतिस्पर्धा की क्षमता पर असर पड़ा है. कई सारी कंपनियों की आमदनी पर दबाव आ गया है.''

मसलन, टेक्सटाइल की घरेलू औद्योगिक इकाइयों को इन दिनों चीनी कपास के निर्यात पर पाबंदी के चलते महंगा कपास खरीदना पड़ रहा है. कपास और सूत की कीमतों में इस साल क्रमश: 100 फीसद और 63 फीसद का उछाल आया. जिंसों की कीमतें दुनिया भर में बढ़ रही हैं. ऊर्जा जिंसों की कीमतें बीते छह महीने में 55.4 फीसद बढ़ी बताई जाती हैं जबकि गैर-ऊर्जा जिंसों के दाम 19.3 फीसद बढ़े. कृषि जिंसों के दाम 16 फीसद, उर्वरकों के 3.02 फीसद और धातुओं तथा खनिजों के 25.1 फीसद बढ़े. अनेक धातुओं की कीमतों में इजाफा हुआ. तांबा, एल्युमिनियम, टिन, निकल और जिंक के दाम क्रमश: 26.3 फीसद, 19.2 फीसद, 46.6 फीसद, 25.1 फीसद और 12.4 फीसद बढ़े. आगत लागतों में उछाल के चलते, खासकर जब ईंधन की कीमतों में तेजी से ढुलाई की लागत बढ़ गई हो, निर्माता को मांग में ठहराव के बावजूद कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं.

बड़ी एफएमसीजी फर्मों ने लागतें बढऩे की वजह से सितंबर की तिमाही के लिए कीमतें पहले ही बढ़ा दी हैं. साबुन, औद्योगिक बेकिंग और कॉस्मेटिक्स में काम आने वाले पाम ऑयल की कीमतें इस साल नई ऊंचाई पर पहुंच गईं, जिसकी वजह से ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज और गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड सहित कई कंपनियों को कीमतें बढ़ानी पड़ीं. सूत्रों का कहना है कि आगत लागतों में 25 फीसद का इजाफा हुआ है जबकि कंपनियों ने कीमतें औसतन 5 से 10 फीसद के बीच बढ़ाई हैं. घरेलू ढुलाई की लागत 8-9 फीसद बढ़ी जबकि वैश्विक ढुलाई के शुल्कों में करीब 20-30 फीसद इजाफा हुआ. इसी तरह स्टील, एल्युमिनियम, रबड़ और तांबे सरीखी प्रमुख आगत लागतें बढ़ने के चलते वाहन निर्माताओं को कीमतें बढ़ाने का सहारा लेना पड़ा.

आरबीआइ के एक हालिया सर्वे के मुताबिक, कंपनियां जब कीमतें बढ़ाने को मजबूर थीं, भारत के उपभोक्ता विश्वास में रिकॉर्ड कमी आई. सूचकांक मार्च के 53.1 से गिरकर मई में 48.5 पर आ गया. इसमें 100 आशा और निराशा को बांटने वाला स्तर है. सर्वे के मुताबिक, परिवार की खर्च की क्षमता कमजोर हुई और साथ ही अनिवार्य खर्चों में ''संयम के संकेत, जबकि गैर-जरूरी खर्चों में झिझक'' दिख रही थी.

आरबीआइ का अनुमान है कि महंगाई में एक फीसद कमी की कीमत करीब 1.5 से 2 फीसद जीडीपी वृद्धि से चुकानी पड़ती है. श्रीवास्तव कहते हैं, ''सरकार मंहगाई से चिंतित है और इस पर नजर रखे है ताकि पक्का कर सके कि यह 5-5.5 फीसद से ऊपर न जाए. मगर महंगाई से कर राजस्व भी बढ़ रहा है जिससे उसकी राजकोषीय ताकत बढ़ रही है. सरकार की राजस्व की स्थिति बहुत बुरी हालत में थी.''

महंगाई पर नियंत्रण के छोटे वक्त के उपाय के तौर पर सरकार ने जुलाई में मसूर दाल के आयात पर बुनियादी सीमा शुल्क घटाकर शून्य किया और कृषि बुनियादी ढांचे के विकास पर लगने वाला सेस या उपकर भी इस पर आधा घटाकर 10 फीसद कर दिया. खाद्य तेलों की कीमतों में कमी लाने के लिए कच्चे पाम ऑयल पर सीमा शुल्क 35.75 फीसद से घटाकर 30.25 फीसद और रिफाइंड पाम ऑयल पर 49.5 फीसद से घटाकर 41.25 फीसद कर दिया. मगर ईंधन पर करों के मामले में केंद्र और राज्य दोनों ही जरा टस से मस नहीं हुए, जिससे ईंधन के दाम महंगाई को आग लगा रहे हैं. तेल के दाम कम हों तो कीमतों में गिरावट आ सकती है. सरकार को फिक्र इस बात की होनी चाहिए कि महंगाई लगातार बढ़ते रहने की आशंका पुख्ता हो सकती है और इससे समग्रत: खर्च की सांस घुट सकती है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें