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मेहमान का पन्नाः भारत को क्यों चिंतित होना चाहिए

यूक्रेन संकट पर भारत के सामने अपने हितों के सर्वाधिक अनुकूल रुख अपनाने की चुनौती है. अमेरिका और यूरोप की तरफ से मूक दर्शक न बने रहने की बात स्व-उत्पन्न दबाव है

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मुकाबला अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन (बाएं) और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मुकाबला अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन (बाएं) और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

मेहमान का पन्ना । कंवल सिब्बल

यूक्रेन संकट शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के पतन के बाद यूरोप में शांति और सुरक्षा का टिकाऊ ढांचा बनाने में पश्चिम की असफलता को प्रदर्शित करता है. हालात बदलने के बाद भी वहां शीत युद्ध की मानसिकता बरकरार है जो पुनरुत्थानशील रूस की आर्थिक कमजोरी के बावजूद उसके आकार, संसाधनों और सैन्य ताकत जैसी वास्तविकताओं के खिलाफ सुरक्षा के रूप में पूरब की ओर नाटो के निरंतर विस्तार में परिलक्षित होती है. रूस के खिलाफ आर्थिक बाधा के रूप में यूरोपीय संघ (ईयू) ने भी पूरब की ओर तेजी से विस्तार किया है.

अतीत में बोरिस येल्तसिन और वर्तमान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ओर से भी रूस के स्वभाव से यूरोपीय होने की पुष्टि करने के प्रयासों को खारिज कर दिया गया था. 'यूरोपीय' भागीदार के रूप में स्वीकार किए जाने के लिए रूस को यूरोपीय शैली का लोकतंत्र बनना पड़ा. विशेष रूप से जॉर्जिया और यूक्रेन के विरोध प्रदर्शनों को बढ़ावा देने का उद्देश्य रूस में इसी तरह के 'लोकतांत्रिक' मंथन को प्रोत्साहित करना था.

जॉर्जिया और यूक्रेन को नाटो सदस्यता की पेशकश को रूस उकसाने के रूप में ही देख सकता था. जॉर्जिया में सैन्य हस्तक्षेप और दक्षिण ओसेतिया तथा अबखाजिया की स्वतंत्रता को मान्यता देकर रूस दिखा चुका है कि उसकी 'लाली' (या लाल दायरे) का अतिक्रमण किया गया था. लेकिन इस संदेश पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, और खुले तौर पर अमेरिका समर्थित प्रदर्शनों के माध्यम से राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच के निष्कासन के बाद क्रीमिया पर काबिज होने का उल्लेख न भी करें तो आज रूस की ओर से दोनेत्स्क और लुहान्स्क गणराज्यों को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दिए जाने के रूप में इसकी कीमत यूक्रेन को चुकानी पड़ी है.

रूस के प्रति नीतियों को सही ठहराने के लिए पश्चिम की तरफ से दिए जाने वाले तर्क विवादास्पद हैं. नाटो में 14 नए सदस्यों को जोड़े जाने का एकमात्र कारण संभावित रूसी खतरे का मुकाबला करना है. यह कहना कि नाटो रक्षात्मक प्रकृति का गठबंधन है और वह रूस के लिए कोई खतरा नहीं है, समझ से परे की बात नहीं है. कोई भी 'रक्षात्मक' गठबंधन बनने का आधार किसी 'आक्रमण' के खतरे का पूर्वाभास करना होता है. विडंबना यह है कि यह गठबंधन रूस को नाटो के लिए खतरा मानता है.

इस कथन से सहमत होना भी कठिन है कि यूक्रेन की सदस्यता वर्तमान में एजेंडे में नहीं है और पुतिन झूठे बहाने बना रहे हैं. नाटो के चरणबद्ध विस्तार को देखने के बाद, पुतिन नाटो के और अधिक विस्तार के खिलाफ बाध्यकारी कानूनी गारंटी चाहते हैं. दूसरा तर्क यह कि किसी गठबंधन में प्रवेश करना देशों का संप्रभु चयन है, सिद्धांत रूप में तो ठीक है लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि इस तरह के 'चयन' को 'प्रोत्साहित' किया जा सकता है, और जैसा कि खास तौर पर इस मामले में है, गठबंधन के भागीदार देशों के पास इसे स्वीकारने या नकारने का विकल्प भी है, क्योंकि इसमें हामी भरने के भू-राजनैतिक निहितार्थ भविष्य के लिए बहुत ही खतरनाक हो सकते हैं.

भारत के लिए यूरोप में इस टकराव के सामरिक, राजनैतिक, आर्थिक तथा सैन्य क्षेत्रों में कई नकारात्मक प्रभाव हैं. यूरेशियाई महाद्वीप के दोनों सिरों पर चुनौतियों का सामना करने के कारण अमेरिकी शक्ति पर जरूरत से ज्यादा दबाव पड़ रहा है. इसके कारण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन पर दबाव कम करना पड़ सकता है क्योंकि यूरोप में तनाव के जल्दी खत्म होने की संभावना नहीं है. अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कथित तौर पर चीन के विदेश मंत्री वांग यी से संपर्क किया है ताकि चीन को इस बात के लिए राजी किया जा सके कि वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों के प्रबंधन में दीर्घकालिक हितों के मद्देनजर रूस के प्रति समर्थन को सीमित रखे. वास्तव में, यूक्रेन संकट से चीन को स्वाभाविक रूप से लाभ है क्योंकि पश्चिमी देशों की तरफ से और अधिक प्रतिबंध लगाए जाने के कारण रूस कमजोर होगा और चीन पर पहले से अधिक निर्भर होगा. ऐसे में अमेरिका का ध्यान यूरोप पर केंद्रित होगा और क्वाड के एशियाई भागीदारों के मन में अमेरिकी विदेश नीति की वर्तमान प्रकृति के बारे में कुछ संदेह पैदा करेगा. 

भारत के सामने यूक्रेन संकट पर ऐसा रुख अपनाने की चुनौती है जो उसके हितों के सर्वाधिक अनुकूल हो. अमेरिका के साथ हमारे व्यापक संबंधों का विस्तार ऐसे विविध रूपों में होने वाला है जिनसे हमारे उत्थान में गति आएगी. रूस विशेष रूप से रक्षा और सामरिक क्षेत्रों में हमारा महत्वपूर्ण भागीदार बना हुआ है. ऐसे में संतुलित विदेश नीति की अपेक्षा यही है कि हम दोनों देशों से घनिष्ठ संबंध रखें. 

रूस के खिलाफ ज्यादा कड़े पश्चिमी प्रतिबंध रूस के साथ सैन्य और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में हमारे व्यवहार को और अधिक जटिल बनाएंगे. हमारी 'तटस्थता' से असंतुष्ट अमेरिकी लॉबी को भारत पर कुछ सीएएटीएसए प्रतिबंध लगाने का दबाव डालने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और रूस के साथ हमारे भविष्य के 'महत्वपूर्ण' रक्षा सौदों को लेकर विवाद पैदा होगा. रूस के तेल और गैस क्षेत्र में और अधिक निवेश तथा रूस के सुदूर पूर्व के विकास की हमारी योजनाएं बाधित होंगी. भुगतान की समस्या और जटिल हो जाएगी. तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं जिनका नकारात्मक प्रभाव तेल और गैस के बड़े आयातक के रूप में हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

यह चर्चा भी अपने आप में दबाव पैदा करती है कि अमेरिका और यूरोप भारत पर इस बात का दबाव डालेंगे कि वह 'मूक दर्शक' रहने के बजाए अपना पक्ष चुने. ब्लिंकन ने मेलबर्न में हुई न्न्वाड बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ 'साफ-साफ' बातचीत की थी जिसके बाद हम 31 जनवरी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सावधान और संतुलित रुख अपनाते हुए अमेरिका के प्रस्ताव पर मतदान से अनुपस्थित रहे थे. 17 फरवरी को मिन्स्क समझौतों के कार्यान्वयन पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ब्रीफिंग में भारत ने शांतिपूर्ण और रचनात्मक कूटनीति, तनाव कम करने तथा सभी देशों के वैध सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए किए जाने वाले समाधान पर जोर दिया था. 

बीती 21 फरवरी को रूस की ओर से दोनेत्स्क और लुहान्स्क गणराज्यों को स्वतंत्र मान्यता देने के बाद हुई सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में एक बार फिर हमने खुद को संयत रखते हुए कोई पक्ष लेने से इनकार कर दिया और घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सभी पक्षों से संयम रखने का आह्वान किया और कहा कि सभी पक्षों के सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए राजनयिक बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने के प्रयास हों. हमने संप्रभुता के मुद्दों का हवाला देकर किसी तरह की निंदा करने से परहेज किया.

भारत का यह रवैया मामले को दूर से देखने वाला नहीं है बल्कि उपमहाद्वीप में भारत के अपने अनुभव के आधार पर संकट की जटिल जड़ों का एक निष्पक्ष मूल्यांकन है. विभाजन ने एक कड़वी विरासत छोड़ी थी जिसमें कमजोर देश के के रूप में पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन में सुरक्षा तलाशने की कोशिश की थी जबकि साझा विरासत के बावजूद उसके अपने राजनैतिक वर्ग में भारत के प्रति गहरी शत्रुता और अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार की भावनाएं व्याप्त रहीं. यूक्रेन में भी इसी तरह की परिस्थितियां दिखती हैं.

महत्वपूर्ण बात है कि यूक्रेन के मामले में शामिल सभी पक्ष भारतीय हितों के मुद्दों पर 'तमाशबीन' बने रहे हैं, चाहे वह पाकिस्तान और चीन के साथ हमारे संप्रभुता के मुद्दे हों, भारत के खिलाफ वर्षों से जारी आतंकवादी हमले हों या फिर अब अफगानिस्तान को तालिबान-पाकिस्तान को सौंपा जाना.

कंवल सिब्बल पूर्व विदेश सचिव हैं

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