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फिर से क्यों रूठ गए हार्दिक पटेल

हार्दिक गुजरात में कांग्रेस का चेहरा बनना चाहते हैं लेकिन पार्टी इस विचार से सहमत नहीं दिखती

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सियासी ताकत :15 अप्रैल को शिकायती लहजे में मीडिया से मुखातिब हार्दिक पटेल सियासी ताकत :15 अप्रैल को शिकायती लहजे में मीडिया से मुखातिब हार्दिक पटेल

पाटीदार आरक्षण आंदोलन का चेहरा रहे हार्दिक पटेल ने कांग्रेस के साथ अपने तीन साल के जुड़ाव में सीख लिया है कि चीजों को कैसे पूरा कराया जाता है. यह अप्रैल के मध्य में शुरू हुआ जब उन्होंने त्वरित फैसला लेने में पार्टी की असमर्थता पर खुले तौर पर नाखुशी जाहिर की. उसके एक पखवाड़े के भीतर राज्य के नेता उन्हें शांत करने की कोशिश करने लगे थे.

हार्दिक ने पिता भरतभाई की पुण्यतिथि पर 28 अप्रैल को ऐलान किया कि वे कांग्रेस नहीं छोड़ेंगे. लेकिन इससे पहले प्रदेश अध्यक्ष जगदीश ठाकोर और प्रदेश प्रभारी रघु शर्मा (जो श्रद्धांजलि देने आए थे) को यह ऐलान करने के लिए मजबूर होना पड़ा कि कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक दिसंबर में गुजरात चुनाव के अभियान में ''महत्वपूर्ण भूमिका'' निभाएंगे. 

हाल ही में हार्दिक ने सोशल मीडिया पर अपनी हिंदुत्व की साख को भी प्रदर्शित किया. पिछले महीने ही उन्होंने खुद को ''भगवान राम को मानने वाला'' और ''हिंदू होने पर गर्व करने वाला'' बताया. उन्होंने भगवा शॉल ओढ़े अपनी एक तस्वीर पोस्ट की और भाजपा की ''फैसला लेने की क्षमता'' की तारीफ की. अपने सोशल मीडिया हैंडल से कांग्रेस का जिक्र हटाकर उन्होंने इन अटकलों को भी हवा दी कि वे भाजपा में शामिल हो सकते हैं.

सूत्रों का कहना है कि हार्दिक का मुख्य मसला सौराष्ट्र क्षेत्र के प्रभावशाली लेउवा पाटीदार समुदाय के नेता नरेश पटेल को पार्टी में शामिल करना है. चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के जरिये नरेश कांग्रेस नेतृत्व के साथ बातचीत कर रहे थे. अगर वे पार्टी में शामिल होते तो हार्दिक को पाटीदार समुदाय में अपने आधार के लिए होड़ करते हुए एक प्रतिस्पर्धी का सामना करना पड़ता. लेकिन अब किशोर ने खुद कांग्रेस में शामिल होने से इनकार कर दिया है, तो पार्टी में नरेश का आना भी अनिश्चित लग रहा है. इस बीच, गुजरात में पहली बार चुनावी दांव खेलने की योजना बनी रही आम आदमी पार्टी ने हार्दिक को खुला आमंत्रण दिया है. इससे हार्दिक कांग्रेस में और वजन बढ़ा सकते हैं.

मई 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हार्दिक जब कांग्रेस में शामिल हुए थे, तो उन्हें एक ताकत के रूप में देखा जा रहा था. उन्होंने 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ पाटीदार वोटों को लामबंद किया था, जिससे भाजपा 99 सीटों पर सिमट गई थी. राज्य में विधानसभा की कुल 182 सीटें हैं और यह 1995 के बाद पार्टी का सबसे खराब प्रदर्शन था. हार्दिक को उम्मीद थी कि उन्हें गुजरात में पार्टी का नेतृत्व करने का मौका मिलेगा, लेकिन 2019 के चुनावों में पार्टी के खाली हाथ रहने के बाद उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर ही राजी होना पड़ा.

किसानों और चक्रवात ताउते के पीडि़तों के प्रति राज्य की उदासीनता के खिलाफ मार्च निकालकर हार्दिक ने प्रभाव पैदा करने की कोशिश की. लेकिन उनकी कवायद बेकार गई क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व ने दिसंबर 2021 में अनुभवी ठाकोर को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया. हार्दिक अपनी निराशा को छिपा नहीं सके और उसके तुरंत बाद उन्होंने पार्टी की बैठकों में शामिल होना बंद कर दिया.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''हार्दिक भाई को लगता है कि उनके प्रति अभी भी लोगों में आकर्षण है, यही उनकी कथित निराशा का मूल कारण है. वे 2015 में (पाटीदार आंदोलन के दौरान) बहुत प्रभावशाली शख्स थे. लेकिन वह समय अब बीत चुका है और उनका प्रभाव कम हो गया है. उन्हें इस तथ्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि वे हमेशा नायक नहीं हो सकते.''

राज्य के कांग्रेस नेताओं की ओर से मनाने के बाद हार्दिक ने अपना रुख नरम कर 29 अप्रैल को पत्रकारों से कहा कि कुछ मतभेद थे जिन्हें सुलझा लिया जाएगा. उन्होंने गृहनगर वीरमगाम में कहा, ''पार्टी के नेता मुझसे बातचीत कर रहे हैं. यह अच्छी बात है. जो लोग नाराज हैं उनसे संपर्क किया जाना चाहिए और उनकी समस्याओं पर बातचीत होनी चाहिए.''

लेकिन निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी के चुनाव के पहले औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल होने की संभावना से बात फिर से बिगड़ सकती है. इससे हार्दिक के इकलौते युवा तुर्क होने का ताज छिन सकता है और इसके उनकी नाराजगी का दूसरा सबब बनने की संभावना है. 

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