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क्यों सुलग उठी रसोई?

महीने के राशन का बिल बिना सामान बढ़ाए भी बढ़ा जा रहा है. एक लीटर सरसों तेल की कीमत 192 रुपए लीटर तक पहुंच गई, जो बीते साल के करीब डेढ़ गुना ज्यादा है.

कीमतों में आग पिछले एक साल के दौरान विभिन्न कारणों से खाद्य तेल की कीमतें बढ़ रही हैं कीमतों में आग पिछले एक साल के दौरान विभिन्न कारणों से खाद्य तेल की कीमतें बढ़ रही हैं

पश्चिम दिल्ली के टैगोर गार्डन में रहने वाले 40 वर्षीय अजय कुमार को इन दिनों कोरोना वायरस के अलावा महंगाई भी डरा रही है. महीने के राशन का बिल बिना सामान बढ़ाए भी बढ़ा जा रहा है. एक लीटर सरसों तेल की कीमत 192 रुपए लीटर तक पहुंच गई, जो बीते साल के करीब डेढ़ गुना ज्यादा है.

बीते साल (25 मई, 2020) भाव 132 रुपए लीटर का था. लेकिन हर स्तर पर खलबली मचाकर रखने वाले मौजूदा समय के कड़ाह में सरसों ही नहीं, खाद्य तेल का पूरा बाजार ही खौल रहा है. वनस्पति, सोया तेल, सूरजमुखी, मूंगफली सभी के भाव चढ़े हैं (देखें ग्राफिक्स). खाद्य तेलों में यह तेजी ठीक उस समय देखने को मिली है, जब देश में एक के बाद एक सामान्य मॉनसून, तिलहन की रिकॉर्ड पैदावार और लॉकडाउन के कारण मांग में नरमी है. यानी कीमतों में इजाफे का कोई भी कारण घरेलू नहीं. महंगाई अंतरराष्ट्रीय है.

तो आंच हम पर क्यों?
भारत में तिलहन की पैदावार बीते पांच वर्षों में 44 फीसद से ज्यादा बढ़ी है. साल 2020-21 में कुल 365.65 लाख टन तिलहन की पैदावार का पूर्वानुमान है. 2015-16 में कुल 252.51 लाख टन तिलहन पैदा हुई थी. हालांकि इस रिकॉर्ड पैदावार के बाद भी हम अपनी जरूरत का आधे से कम खाद्य तेल उपलब्ध करवा पाते हैं.

देश में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 19 किलोग्राम की मौजूदा खपत के आधार पर कुल 2.5 करोड़ टन खाद्य तेल की मांग है, इसमें से 1.05 करोड़ टन की आपूर्ति ही घरेलू स्तर पर हो पाती है. बाकी 60 फीसद खपत आयात पर निर्भर है. विभिन्न कारणों से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तिलहन और खाद्य तेल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं, जिसका असर घरेलू बाजार पर भी देखने को मिल रहा है. 

विश्व बाजार में क्यों लगी है आग?
देश में कुल खाद्य तेल आयात में 86 फीसद हिस्सेदारी पाम और सोयाबीन तेल की है. तो पहले बात पाम ऑयल की. मलेशिया और इंडोनेशिया दुनिया के सबसे बड़े पाम ऑयल निर्यातक देश हैं. यहां पाम ऑयल की कीमतें बीते एक साल में तेजी से बढ़ी हैं. बुर्सा मलेशिया डेरेवेटिव्ज एक्सचेंज पर पाम ऑयल के वायदा ने मई में 4,525 रिंगिट का ऊपरी भाव छुआ.

बीते साल मई में कीमतें 1,939 रिंगिट के निचले स्तर तक गईं थीं. इस हिसाब से कीमतें सालभर में 133 फीसद से ज्यादा बढ़ीं. फिलहाल, भाव 3,910 रिंगिट के करीब हैं. यानी 1 टन पॉम ऑयल की कीमत करीब 67,000 रुपए. (1 जून को) के स्तर पर है.

पाम ऑयल की कीमतों में तेजी का गणित समझाते हुए द सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईएआइ) के एग्जीक्युटिव डायरेक्टर बी.वी. मेहता कहते हैं, ''पाम ऑयल क्षेत्र गहन श्रम वाला क्षेत्र है. यहां बड़ी संख्या में श्रमिकों की जरूरत होती है. दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक देशों में शुमार मलेशिया में पाम ऑयल क्षेत्र की निर्भरता प्रवासी मजदूरों पर है.’’

कोविड के कारण बॉर्डर बंद हुए, जिस वजह से श्रमिकों की कमी हुई और उत्पादन प्रभावित हुआ. वे तेजी का एक और बड़ा कारण खाद्य तेलों की मांग का ईंधन क्षेत्र में बढ़ना भी मानते हैं. इंडोनेशिया के बायोडीजल कार्यक्रम में मिश्रण के लिए 30 फीसद पाम ऑयल का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसकी वजह से मांग में लगातार इजाफा हो रहा है.

अब बात सोयाबीन की. अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोयाबीन की कीमत बीते एक साल में 80 फीसद से ज्यादा बढ़ी है. हालांकि पिछले दो हफ्तों से कुछ नरमी देखने को मिली है. फिलहाल, सोयाबीन का जुलाई में 1,542 डॉलर (1 जून) के करीब वायदा कारोबार कर रहा है, जो 12 मई को 1,667 डॉलर के स्तर पर था. बीते साल 1 जून को भाव 840 डॉलर के करीब थे. ब्राजील और अमेरिका दुनिया के सबसे ज्यादा सोयाबीन पैदा करने वाले देश हैं. 

भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के महामंत्री हेमंत गुप्ता खाद्य तेलों में तेजी की वजहें बताते हुए कहते हैं, ''चीन सोयाबीन की जबरदस्त खरीदारी किए जा रहा है, जो कीमतों में इजाफे का एक बड़ा कारण है.’’ 2021के पहले चार महीनों (जनवरी से अप्रैल) में चीन ने करीब 2.86 करोड़ टन सोयाबीन का आयात किया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले 17 फीसद ज्यादा है.

वे यह भी कहते हैं, ''दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक देश ब्राजील में आई बाढ़ के कारण फसल की कटाई और निर्यात प्रभावित हुआ. इसने सोयाबीन में तेजी की अवधारणा को बल दिया.’’ इसके अलावा अमेरिका और ब्राजील समेत कई देश सोयाबीन तेल का इस्तेमाल अक्षय ऊर्जा (रिन्युएबल एनर्जी) बनाने में भी कर रहे हैं. इस वजह से कोविड के बाद भी वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों की मांग में कोई बड़ा असर नहीं दिखा. 

देश में खाद्य तेल का आयात
देश में खाद्य तेल का आयात

तेजी रहेगी जारी
भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से हाल में जारी वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि साल के दौरान थोक और खुदरा महंगाई के बीच अंतर लगातार आपूर्ति बाधाओं और खुदरा मार्जिन अधिक रहने की ओर इशारा करता है. रिपोर्ट के मुताबिक, ''मांग और आपूर्ति में असंतुलन बने रहने से दलहन और खाद्य तेल जैसे खाद्य पदार्थों की ओर से दबाव बने रहने की संभावना है, जबकि 2020-21 में अनाज की बंपर पैदावार के साथ अनाज की कीमतों में नरमी आ सकती है.’’

केडिया कमोडिटी के प्रबंध निदेशक अजय केडिया कहते हैं, ''पूरी दुनिया में तेजी से वैक्सीन लगने के बाद ही मांग की वापसी होगी. ऐसे में कीमतों में किसी बड़ी गिरावट की उम्मीद नहीं लगानी चाहिए.’’ हालांकि केडिया का मानना है कि नई फसल की आवक के बाद कीमतों में नरमी दिखेगी लेकिन यह पिछले साल के स्तर पर पहुंचेगी, ऐसी संभावना नहीं है. गौरतलब है कि चीन ने कोविड के थमने के बाद मांग की वापसी की उम्मीद के चलते ही बड़ी मात्रा में आयात किया है.

राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य तेलों की औसत कीमत
राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य तेलों की औसत कीमत

द सेंट्रल ऑर्गेनाइजेशन फॉर ऑयल इंडस्ट्री ऐंड ट्रेड में क्रॉप एस्टीमेट कमेटी के चेयरमैन अनिल छतर कहते हैं, ''दीवाली तक खाद्य तेलों में किसी बड़ी गिरावट की उम्मीद नहीं है. नई आवक के बाद भाव में कुछ नरमी जरूर आएगी.’’ 2020-2021 के दौरान जैसी तेजी देखने को मिली, वह अप्रत्याशित थी.

फिलहाल मंडियों में भाव सरकार की ओर से तय न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी ऊपर है. सरकार की ओर से सरसों का तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 4,650 रुपए प्रति क्विंटल का है, जबकि मंडी में भाव 7,800 रुपए के करीब है. वहीं सोयाबीन का एमएसपी 3,880 रुपए प्रति क्विंटल है. मंडी में भाव 7,500 रुपए के करीब है. अनिल बताते हैं कि बीते 15 दिनों में भाव 10 से 12 फीसद कम हुए हैं.

फिर कैसे मिले राहत?
खाद्य तेलों की कीमतों में यह इजाफा उस समय देखने को मिल रहा है, जब कोविड के कारण बड़ी संख्या में लोगों की आय और रोजगार प्रभावित हुए हैं. एसईएआइ का मानना है कि सरकार वायदा बाजार में सटोरिया गतिविधियों पर अंकुश लगाकर कीमतों पर काबू पा सकती है.

वायदा बाजार में खाद्य तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं के वायदे में डिलिवरी को अनिवार्य किया जा सकता है. इससे बाजार में केवल असली खरीदारों की ही भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी. इसके अलावा, 4 फीसद के अपर सर्किट को घटाकर 2 फीसद किया जा सकता है. ऐसा करने से वे लोग वायदा बाजार से दूर हो जाएंगे जो केवल पैसा कमाने के लिए बाजार का रुख करते हैं. 

सुझाव यह भी है कि नीति निर्माताओं को स्पष्ट रखना होगा कि खाद्य तेलों में कितनी गिरावट अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी है और उसी के हिसाब से रणनीति तैयार करनी होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि जब एक तरफ उपभोक्ता महंगा तेल खरीदने पर मजबूर है, ठीक उसी समय किसानों को घरेलू मंडियों में उसकी उपज के बेहतर दाम भी मिल रहे हैं. 

आमतौर पर आयात पर निर्भर वस्तुओं की कीमतों में तत्काल राहत देने के लिए आयात शुल्क में कटौती को एक विकल्प के रूप में देखा जाता है, लेकिन उद्योग संगठन की राय इस मोर्चे पर अलग है. मेहता कहते हैं, ''वैश्विक बाजार में अगर कीमतों में तेजी का सिलसिला जारी रहता है तो आयात शुल्क में कटौती का कोई खास फायदा उपभोक्ता को नहीं मिल पाएगा.’’ साथ ही सरकार को भी राजस्व का नुक्सान उठाना पड़ेगा. बेहतर है कि सरकार पीडीएस के रास्ते तेल पर सब्सिडी देकर उपभोक्ता को सीधा फायदा पहुंचाए.

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