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लव जेहाद कानूनः जब प्यार करना बना जुर्म

कई लोगों का मानना है कि 'लव जिहाद' का हौवा इसलिए खड़ा किया जा रहा है क्योंकि राम मंदिर का मुद्दा अब मतदाताओं को लुभाने केलिए कारगर नहीं रह गया

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भगवा युद्ध दिल्ली केजंतर मंतर पर 8 नवंबर को 'लव जेहाद' के खिलाफ विश्व हिंदू महासंघ का प्रदर्शन भगवा युद्ध दिल्ली केजंतर मंतर पर 8 नवंबर को 'लव जेहाद' के खिलाफ विश्व हिंदू महासंघ का प्रदर्शन

जब देश भर में कोरोना वायरस महामारी का प्रकोप बढ़ रहा है, एक और छूत की बीमारी भाजपा शासित राज्यों में फैलती दिखाई दे रही है. इनमें से कुछ राज्यों ने 'लव जेहाद' के खिलाफ कानून बनाने के अपने इरादे का ऐलान कर दिया है या इसकी प्रक्रिया में हैं. 'लव जेहाद' कट्टर हिंदू धड़ों की शब्दावली है; वे इसका इस्तेमाल मुस्लिम नौजवानों पर धर्मांतरण करवाने की गरज से हिंदू लड़कियों को 'फुसलाकर' उनसे शादी करने की सोची-समझी चाल का आरोप लगाने के लिए करते हैं. 'लव जेहाद' का यह प्रेत पहले भी थोड़े-थोड़े समय बाद उठाया और भरोसेमंद सबूत के अभाव में दफना दिया जाता रहा है, लेकिन अब अचानक भाजपा की सरकारें फिर इस मुद्दे पर संजीदगी से जोर दे रही हैं.

हालांकि केंद्र इस शब्दावली को मान्यता नहीं देता और केंद्रीय गृह मंत्रालय फरवरी में संसद से कह चुका है कि 'लव जेहाद की कोई कानून व्याख्या नहीं है', लेकिन राज्यों की तरफ से जारी दस्तावेजों में इसका जिक्र हुआ है. आठ राज्यों—अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़—में पहले से ही धर्मांतरण के खिलाफ कानून हैं. हिमाचल प्रदेश पहला राज्य था जिसने शादी की खातिर धर्म परिवर्तन करने से निपटने के लिए खास कानूनी प्रावधान किए थे. अन्य राज्य भी अब 'लव जेहाद' के विरुद्ध विशेष कानून लाने पर विचार कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में 'लव जेहाद' को खत्म करने के लिए लंबे वक्त से जुटे मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने इसकी अगुआई की और उनकी सरकार ने जबरन धर्मांतरण पर नकेल कसने के लिए 24 नवंबर को अध्यादेश पारित कर दिया. बीते कुछ वक्त से इसके लिए माहौल बनाया जा रहा था. सितंबर में राज्य सरकार ने कानपुर में 'लव जेहाद' के 14 मामलों की जांच के लिए विशेष जांच दल बनाया था. मुख्यमंत्री ने 30 अक्तूबर में जौनपुर की रैली में शादी की खातिर धर्मांतरण को अवैध ठहराने वाले इलाहाबाद हाइकोर्ट के 23 सितंबर के फैसले (संयोग से यह मामला हिंदू धर्म अपनाने वाली एक मुस्लिम महिला का था) का जिक्र करते हुए धमकी दी थी कि ऐसे कृत्यों में शामिल लोगों का 'राम नाम सत्य' हो जाएगा. 

जब प्यार करना बना जुर्म
जब प्यार करना बना जुर्म

इससे पहले, कथित तौर पर 'लव जेहाद' के एक मामले में, एक युवा छात्रा निकिता तोमर को 23 अक्तूबर को हरियाणा के बल्लभगढ़ में उसके कॉलेज के सामने गोली मार दी गई; इसके लिए दो नौजवानों तौसीफ और रेहान को गिरफ्तार किया गया. इसके कुछ ही वक्त बाद विहिप, बजरंग दल और करणी सेना ने पड़ोसी रघुनाथपुर गांव में, जहां उस लड़की का परिवार रहता है, महापंचायत का आयोजन किया. साथ ही, हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने ऐलान किया कि मुकदमा फास्ट-ट्रैक अदालत में चलाया जाएगा.

जल्द ही कर्नाटक और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकारें भी इस रास्ते पर चल पड़ीं. मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा ने 5 नवंबर को मेंगलुरू में राज्य कार्यकारिणी की बैठक के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी सरकार 'लव जेहाद' के खिलाफ कड़े कानून लेकर आएगी. मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्र ने 17 नवंबर को ऐलान किया कि ''मध्य प्रदेश विधानसभा के अगले सत्र में लव जेहाद विधेयक लाया जाएगा.''

बिहार के भाजपा नेता तथा केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने 20 नवंबर को मांग की कि बिहार में भी ऐसा ही कानून लाया जाए, जहां उनकी पार्टी जद (यू) के साथ सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है. उन्होंने कहा, ''बिहार सरकार को इसे सांप्रदायिक मुद्दे की तरह नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द के लिए जरूरी मुद्दे की तरह देखना चाहिए और 'लव जेहाद' और जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून बनाने पर विचार करना चाहिए.''

'लव जेहाद' के खिलाफ इस नए उभार की क्या वजह है? हिंदुत्व कार्यकर्ता इसका इस्तेमाल मुस्लिम-विरोधी लफ्फाजी को बढ़ाने के मौके के तौर पर कर रहे हैं. अखिल भारतीय संत समाज के प्रमुख तथा गाजियाबाद के डासना देवी मंदिर के महंत नरसिंहानंद सरस्वती ने फेसबुक पर पोस्ट एक वीडियो में जंतर मंतर पर मुस्लिम विरोधी हिंसा का आह्वान किया. निकिता तोमर की हत्या के खिलाफ 23 अक्तूबर को जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने आए एक जमावड़े ने हिंदुओं को नसीहत दी कि वे हिंदू महिलाओं की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ हथियार उठाएं. फिर 1 नवंबर को इंडिया गेट पर 'लव जेहाद' के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया, जो लाइव टेलीविजन पर सुदर्शन टीवी के संपादक सुरेश चव्हाण के एक आह्वान के जवाब में किया गया था.

राजनैतिक जानकार मानते हैं कि 'लव जेहाद' के मुद्दे पर माहौल गरमाने के पीछे एक वजह सांप्रदायिक कड़ाहे में उबाल बनाए रखना है. खासकर तब जब अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा अपनी ताव खो चुका है. पश्चिम बंगाल और असम में अगले साल चुनाव होने हैं और उम्मीद की जा रही है कि 'लव जेहाद' पर आक्रामकरुख लोगों के दिलों को छू सकता है.

भाजपा साथ ही केरल में भी अपनी पैठ बनाने की उम्मीद कर रही है. पार्टी का पहला विधायक 2016 के विधानसभा चुनाव में चुना गया था और भाजपा के शीर्ष नेता दावा करते हैं कि ''बंगाल में आज जो देखा जा रहा है, केरल उससे महज पांच साल दूर है.''

पार्टी की नजर खास तौर पर 'ईसाई चुनाव गलियारे' पर है और वह 'लव जेहाद' को लेकर सीरियाई ईसाई समुदाय की आशंकाओं का फायदा उठा रही है. विहिप के आलोक कुमार कहते हैं, ''लव जेहाद' शब्दावली केरल के इसी समुदाय ने गढ़ी थी, न कि संघ परिवार ने.'' अक्तूबर 2005 में ही, केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल ने आरोप लगाया था कि राज्य में 4,500 लड़कियों को निशाना बनाया गया था. चार साल बाद, तब कांग्रेस के मुख्यमंत्री उम्मन चांडी ने कहा था कि 2006 से राज्य में 2,667 युवा महिलाओं ने धर्म परिवर्तन करके इस्लाम अपनाया है, हालांकि उन्होंने इनके जबरन धर्म परिवर्तन होने से इनकार किया था. इस साल जनवरी में कार्डिनल जॉर्ज एलेंचेरी की अगुआई वाले सायरो-मालाबार चर्च के साइनोड ने कहा कि दो-एक साल पहले इस्लास्मिक स्टेट ने जिन 21 लोगों को भर्ती की थी, उनमें से करीब आधे ईसाई समुदाय से धर्म परिवर्तन करके आए थे. उन्होंने एक बयान में कहा, ''यह हकीकत है कि केरल में ईसाई लड़कियों को निशाना बनाकर योजनाबद्ध ढंग से 'लव जेहाद' चल रहा है. ईसाई लड़कियों को 'लव जेहाद' के नाम पर मारा जा रहा है.''

अलबत्ता भाजपा में हर कोई 'लव जेहाद' पर पार्टी के सख्त होते रुख से इत्तेफाक नहीं रखता. मुस्लिम समुदाय के एक शीर्ष भाजपा नेता सवाल करते हैं, ''तीन तलाक का मुस्लिम महिलाओं पर अच्छा असर पड़ा, राम मंदिर का मुद्दा तय हो गया है, पार्टी अभी-अभी सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) के झंझट से निकली है... हमें एक और विवादास्पद मुद्दा क्यों उभारना चाहिए?''

बिहार में थोड़ी-बहुत भी अहमियत रखने वाले भाजपा का कोई नेता गिरिराज सिंह की 'लव जेहाद' कानून की मांग के समर्थन में आगे नहीं आया. गठबंधन के भागीदार जनता दल (यूनाइटेड) ने भी मुद्दे को नजरअंदाज करने का फैसला किया. जद (यू) के अध्यक्ष वशिष्ट नारायण सिंह कहा, ''अगर कोई बयान देता है तो जरूरी नहीं कि उसकी चर्चा की जाए.'' उन्होंने इंडिया टुडे से यह भी कहा कि इसकी कोई संभावना नहीं है कि अंतर-धार्मिक विवाह के खिलाफ किसी भी कदम का नीतीश समर्थन करेंगे.

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उस कानून के मुखर विरोधी रहे हैं जो कई भाजपा शासित राज्यों में तैयार किया जा रहा है. मुख्यमंत्री ने सिलसिलेवार एक के बाद एक ट्वीट में कहा, ''लव जेहाद' वह मुहावरा है जो भाजपा ने देश को बांटने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे के लिए गढ़ा है. शादी निजी स्वतंत्रता का मामला है. इस पर लगाम कसने के लिए कानून लाना पूरी तरह असंवैधानिक है और यह किसी अदालत में टिकेगा नहीं. वे देश में ऐसा माहौल पैदा कर रहे हैं जिसमें रजामंद वयस्क राज्य सत्ता की दया के मोहताज हो जाएंगे.''

तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां सिंदूर खेला, रथयात्राओं सरीखे हिंदू अनुष्ठानों में हिस्सा लेने, मंगलसूत्र पहनने और देवी दुर्गा का रूप धारण करने के लिए मुस्लिम कठमुल्लों की लानत-मलामत का सामना करती रही हैं. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब उनसे 'लव जेहाद' के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि लव और जेहाद एक साथ नहीं चल सकते. उन्होंने साफ तौर पर कहा, ''प्रेम बहुत निजी होता है. लोग चुनावों से पहले ही ये मुद्दे उठाते हैं. यह निजी पसंद की बात है कि आप किसके साथ रहना चाहते हैं. धर्म को राजनैतिक औजार मत बनाओ.''

ऐसा भी नहीं है कि 'लव जेहाद' के कथित मामले अदालतों की छानबीन में टिक पाए हों. केरल हाइकोर्ट ने 2017 में, राष्ट्रीय जांच एजेंसी की एक रिपोर्ट के आधार पर, अखिला अशोकन से हादिया बनी युवती की शफीन जहां के साथ शादी को रद्द कर दिया था और 'मतारोपण' तथा 'मनोवैज्ञानिक अपहरण' का आरोप लगाया था. अलबत्ता महज 10 महीने बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को उलटकर शादी को बहाल कर दिया. इलाहाबाद हाइकोर्ट की दो जजों की खंडपीठ ने 11 नवंबर को सलामत अंसारी के खिलाफ वह एफआइआर रद्द कर दी, जिसमें उस पर शादी करने के लिए प्रियंका खरवार का जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का आरोप था. जजों ने कहा, ''हम प्रियंका खरवार और सलामत को महज हिंदू और मुसलमान के तौर पर नहीं, बल्कि दो बड़े हो चुके व्यक्तियों के तौर पर देखते हैं जो खुद अपनी स्वतंत्र इच्छा और पसंद से शांतिपूर्वक साथ रह रहे हैं...''

कानपुर में 'लव जेहाद' के 14 मामलों पर एसआइटी ने 23 नवंबर को जो रिपोर्ट दाखिल की, उसमें उसने बताया कि तीन मामले स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन के पाए गए; तीन अन्य में युवाओं ने लड़कियों को प्रभावित करने के लिए कथित तौर पर नकली पहचानों का इस्तेमाल किया. एसआइटी को किसी साजिश या किसी सामाजिक संगठन की तरफ से धन दिए जाने का कोई सबूत नहीं मिला. प्रतिक्रिया मांगे जाने पर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कोई भी अपनी टिप्पणी देने का इच्छुक नहीं था.

इस सबसे अविचलित भाजपा शासित राज्य 'लव जेहाद' के मुद्दे पर जोर देते हुए आगे बढ़ रहे हैं. उत्तर प्रदेश में नए गैर-कानूनी धर्म समपरिवर्तन निषेध अध्यादेश, 2020 के तहत झूठ, जोर-जबरदस्ती, प्रलोभन के जरिए या शादी की गरज से धर्म परिवर्तन अब संज्ञेय, गैर-जमानती अपराध होगा, जिसकी सुनवाई मजिस्ट्रेट की अदालत में होगी. जबरिया या धोखे से धर्म परिवर्तन करवाने पर अब पांच साल की कैद या 15,000 रुपए के जुर्माने की सजा भुगतनी होगी. नाबालिग या हाशिए के समुदायों की महिलाओं का धर्म परिवर्तन करवाने के मामलों में सजा बढ़कर तीन से 10 साल के बीच कैद और जुर्माना 25,000 रुपए तक हो सकता है. सामूहिक धर्म परिवर्तन के लिए भी इतनी ही कैद और 50,000 रुपए के जुर्माने की सख्त सजाएं आयद की गई हैं.

यही नहीं, यह साबित करने की जिम्मेदारी कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से किया जा रहा है और शादी की गरज से नहीं किया जा रहा है, उस व्यक्ति की होगी जो धर्म परिवर्तन कर रहा है. यही नहीं, शादी के बाद धर्म परिवर्तन करने की मंशा दो महीने पहले ही जिला मजिस्ट्रेट को बतानी होगी.

'लव जेहाद' के लिए अलग कानून से आखिर क्या हासिल करने की उम्मीद की जा रही है? अगर मंशा झूठे बहाने से शादी करने वालों को सजा देना है, तो भारतीय दंड संहिता में इसके लिए पहले से ही प्रावधान हैं. आइपीसी की धारा 193 और 205 पहचान छिपाने या झूठा सबूत पेश करने के लिए तीन से पांच साल कैद की सजा मुकर्रर करती हैं. इससे इस बुराई पर, जो शायद मौजूद ही न हो, रोक लगे या न लगे, लेकिन 'लव जेहाद' का कानून जोर-जबरदस्ती का एक और औजार बनने की तरफ जरूर बढ़ता दिखाई दे रहा है. या संभव है, इसका कोई राजनैतिक मकसद हो. जैसी आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं कि यह आगामी चुनावों में सांप्रदायिक जमीन तैयार करने की कोशिश का हिस्सा है. जो भी है, किसी भी हाल में कम से कम कानून तो सही और वाजिब आधार पर ही बनाए जाने चाहिए क्योंकि कानून फौरी नहीं, दीर्घकालिक सामाजिक लक्ष्य केलिए होते हैं, ताकि देश और समाज आगे बढ़े.

—साथ में, रोमिता दत्ता, अमिताभ श्रीवास्तव और रोहित परिहार

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