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टेलीकॉम टावरों से सेहत को कैसा खतरा

टावरों के विकिरण के दुष्प्रभाव पर कोई निर्णायक अध्ययन अब तक नहीं, लेकिन लोगों में भारी डर.

भारत में फिलहाल चार लाख टेलिकॉम टावर हैं लेकिन इनकी वृद्धि की दर सालाना सिर्फ 3 फीसदी है जो इस उद्योग के साथ हर साल जुड़े रहे 1.2 करोड़ ग्राहकों की तुलना में बहुत ही कम है. दूरसंचार सेवा प्रदाताओं का कहना है कि लोगों में इससे “सेहत पर होने वाले दुष्प्रभाव से भय” का माहौल है. लिहाजा, अधिक संख्या में अतिरिक्त टावर नहीं लगाए जा सकते. आखिर इस मामले की असलियत क्या है?

बॉयो-एनिशिएटिव की 2012 की एक रिपोर्ट में इस ओर संकेत किया गया था कि सेलफोन टावरों से होने वाले विकिरण से सेहत को खतरा है. इनमें सबसे आम दुष्प्रभाव हैं नींद न आना, सिरदर्द, खीझ, एकाग्रता में दिक्कत, स्मृतिलोप, अवसाद, सुनने में दिक्कत और जोड़ों की समस्या. इनमें ज्यादा गंभीर बीमारियों में दौरे पडऩा, लकवा, गर्भपात, स्थायी नपुंसकता और कैंसर वगैरह के खतरे बताए जाते हैं. आइआइटी बॉम्बे के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर गिरीश कुमार बताते हैं कि अधिकतर देशों में विकिरण के मानक बहुत निम्न हैं. मसलन, ऑस्ट्रिया में विकिरण की सीमा 1 मिलिवॉट प्रति वर्ग मीटर है. रूस, चीन, इटली और पोलैंड जैसे देशों में इसकी स्वीकृत सीमा 100 मिलिवॉट प्रति वर्ग मीटर है. कुमार कहते हैं, “इन देशों में मोबाइल की कवरेज मुमकिन है तो कोई वजह नहीं हम अपने देश में विकिरण के स्तर को कम नहीं रख सकते.”

मुंबई में सेलफोन टावरों से होने वाले विकिरण के दुष्प्रभावों के खिलाफ  विरोध प्रदर्शनों का एक सिलसिला चला था. ये प्रदर्शन तब भड़के थे जब फिल्म अभिनेत्री जुही चावला ने मुंबई के मालाबार हिल स्थित अपने मकान के ठीक सामने लगे मोबाइल टावर को हटवाने का कदम उठाया और इसे लेकर उन्हें लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ जिसके बाद राजनैतिक कार्यकर्ताओं की मदद से सेलफोन टावरों के दुष्प्रभावों के खिलाफ एक आंदोलन ही उठ खड़ा हुआ. उनकी मांग थी कि दूरसंचार कंपनियां रिहाइशी इलाकों के निकट विकिरण के स्तर को कम रखें, एंटीना की संख्या की एक सीमा तय करें और टावरों को इमारतों से दूर लगाएं. इसी दौरान विकिरण के दुष्प्रभावों पर एक रिपोर्ट आ गई. मसलन, दादर की पारसी कॉलोनी स्थित श्री समर्थ बिल्डिंग के निवासियों ने दावा किया कि उन्होंने सिर्फ तीन साल के भीतर वहां कैंसर के छह मामले देखे हैं जो कथित तौर पर उस इलाके में लगे दूरसंचार टावरों के विकिरण से पैदा हुए थे.

किसी भी मामले में कैंसर और टावर के बीच के रिश्ते को स्थापित नहीं किया जा सका था लेकिन इससे सरकारी हलकों में अचानक सनसनी फैल गई. दूरसंचार विभाग ने 2014 में मुंबई स्थित अपने दूरसंचार प्रवर्तन संसाधन और निगरानी प्रकोष्ठ के माध्यम से विकिरण के स्तर पर एक अध्ययन करवाया. इसने जनता की शिकायतों को संबोधित किया और उसे आश्वस्त किया कि टेलीकॉम ऑपरेटर वास्तव में विकिरण पर प्रस्तावित मानकों का पालन कर रहे हैं. केंद्रीय दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी इंडिया टुडे को बताया कि ऐसे कोई निर्णायक अध्ययन मौजूद नहीं हैं जो साबित कर सकें कि इन टावरों से होने वाले विकिरण से सेहत को खतरा होता है.

एक गैर-मुनाफा संगठन अमेरिकन कैंसर सोसायटी का कहना है कि सेलफोन टावरों से होने वाले विकिरण का स्तर कम होता है क्योंकि टावर जमीन से काफी ऊंचाई पर लगाए जाते हैं और इनसे निकलने वाले सिग्नल आवधिक तरीके से संप्रेषित होते हैं. सोसायटी का कहना है कि जब तक कोई सीधे एंटीना के सामने न आ जाए, उस पर विकिरण का दुष्प्रभाव बहुत सीमित होगा.

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