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पश्चिम बंगालः चुनौती तीसरी ताकत बनने की

लेफ्ट और कांग्रेस को सबसे पहली चुनौती से चुनाव को दो ध्रुवीय बनाने से रोकना है. अगर, ये दोनों ऐसा कर पाए तो न सिर्फ अपने अस्तित्व के संकट से बच सकेंगे

प्रदर्शन यूपी के हाथरस में एक दलित लड़की के बलात्कार और हत्या के खिलाफ माकपा और कांग्रेस का विरोध मार्च प्रदर्शन यूपी के हाथरस में एक दलित लड़की के बलात्कार और हत्या के खिलाफ माकपा और कांग्रेस का विरोध मार्च

जब बीते 19 दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दो दिनों के पश्चिम बंगाल के दौरे पर आए और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ हमलावर रुख अपनाया, तो कांग्रेस और वामपंथी दलों को यह समझते देर नहीं लगी कि शाह इस चुनाव को दो ध्रुवीय बनाने में काफी हद तक सफल हो चुके हैं. यह ऐसा हुआ तो यह चुनाव सिर्फ टीएमसी और भाजपा के बीच की जंग रह जाएगी. इस कड़वी सच्चाई ने हाशिए पर खड़े दोनों—कांग्रेस और माकपा को एक प्लेटफॉर्म पर आने को मजबूर कर दिया है.

कांग्रेस और माकपा के नेता गठबंधन बना कर राज्य में एक तीसरी ताकत के रूप में मैदान में उतरने का मन बना चुके हैं. माकपा के नेता और विधायक सुजान चक्रवर्ती कहते हैं, ''कांग्रेस के साथ चुनाव लडऩे पर सहमति बन चुकी है. वैसे अंतिम फैसला दोनों ही दलों का शीर्ष नेतृत्व लेगा. हम चाहते हैं कि सभी धर्मनिरपेक्ष दल भाजपा और ममता को रोकने के लिए एकजुट होकर चुनाव लड़ें.'' तो क्या ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम भी गठबंधन का हिस्सा होगी? कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ''अभी इस पर कोई चर्चा नहीं हुई है, पर कोई भी धर्मनिरपेक्ष दल गठबंधन में आना चाहेगा तो हम खुले दिल से विचार करेंगे.'' पर माकपा और कांग्रेस, दोनों भाजपा-ममता से मुकाबला करने में सक्षम होंगे, आंकड़े और पिछला गठबंधन इसकी गवाही नहीं देते हैं.

2016 के विधानसभा चुनाव में लेफ्ट और कांग्रेस साथ मिल कर लड़ी थीं, लेकिन ममता अपने वोट शेयर में 6 फीसद का इजाफा करते हुए 2011 के मुकाबले 27 ज्यादा सीट जीतने में सफल रहीं. 2016 के चुनाव में वामपंथी पार्टियां सिर्फ 32 सीट और कांग्रेस सिर्फ 44 सीट ही जीत सकी. इसके बाद राज्य में कांग्रेस और वाम मोर्चे का गठजोड़ टूट गया. वाम मोर्चे ने यह आरोप लगाया कि कांग्रेस के वोट, उनको ट्रांसफर नहीं हुए.

वरिष्ठ पत्रकार और बंगाल की राजनीति के जानकार गौतम लाहिरी कहते हैं, ''पश्चिम बंगाल में शुरू से दो ध्रुवीय चुनाव होते रहे हैं. पिछला विधानसभा चुनाव भी ममता बनाम लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन का था. इस बार भाजपा मजबूती से चुनाव मैदान में है, लेफ्ट के बचे-खुचे कैडर और कांग्रेस कैडर अगर मजबूती से लड़े तो मुकाबला त्रिकोणीय होगा.'' तो क्या त्रिकोणीय मुकाबले में लेफ्ट-कांग्रेस मिलकर ममता और भाजपा को पटखनी दे सकते हैं? राजनीतिक टीकाकार शंखदीप दास कहते हैं, ''दोनों मिलकर पटखनी भले न दे सकें, पर अपनी ताकत बढ़ा कर सीटों की संख्या बढ़ाने में सफल जरूर हो सकते हैं.'' दास कहते हैं, ''2019 के आम चुनाव में लेफ्ट का वोट गिरकर 6 फीसद हो गया.

माकपा 40 सीटों पर लड़ी, सभी सीट हारी और 39 सीटों पर तो जमानत भी नहीं बचा सकी. इसका अर्थ यह कि लेफ्ट के कैडर ने ममता को हराने के लिए भाजपा को वोट दिया जिसके बूते भाजपा 18 सीट जीत गई. 2019 के आम चुनाव को आधार बनाया जाए तो भाजपा लेफ्ट कैडर का वोट लेने के चरम को पहले ही पा चुकी है. ऐसे में भाजपा अगर बढ़ती है तो ममता का वोट ही काटेगी.''

वहीं, बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, ''10 साल के सत्ता-विरोधी रुझान और ममता से नाराज वोटर बटेंगे, पर इसका मतलब यह नहीं कि वह भाजपा को वोट करेंगे. नाराज वोटर लेफ्ट और कांग्रेस की ओर आएंगे.'' इस दावे के बावजूद लेफ्ट-कांग्रेस कोई चमत्कार कर पाएंगे, इसकी उम्मीद कम है. लेफ्ट की प्राथमिकता ममता को सत्ता से हटाने की है जबकि कांग्रेस की प्राथमिकता भाजपा को रोकना है. इस भावी गठबंधन में दोनों दलों के सियासी दुश्मन अलग-अलग हैं, इसलिए यह कमजोर पड़ जाए तो आश्चर्य नहीं.

बहरहाल, लेफ्ट और कांग्रेस को सबसे पहली चुनौती से चुनाव को दो ध्रुवीय बनाने से रोकना है. अगर, ये दोनों ऐसा कर पाए तो न सिर्फ अपने अस्तित्व के संकट से बच सकेंगे, बल्कि राज्य में सियासी भूमिका निभाने लायक भी हो जाएंगे.

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