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पश्चिम बंगालः विरोध का आखिरी किला

भाजपा ने बंगाल में तृणमूल के फैलाए कथित डर को खत्म करने के लिए आक्रामक रुख अपना रखा है. वहीं ममता बनर्जी अब अपनी 2019 की रणनीति बदलते हुए विभिन्न भाषायी पहचान वाले समूहों को भी साधने में जुटी हैं

जंग दक्षिण 24 परगना में भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच झड़प जंग दक्षिण 24 परगना में भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच झड़प

मध्य प्रदेश के इंदौर के पटनीपुरा चौराहे की सड़कों पर चस्पां किए गए ममता बनर्जी के पोस्टरों को बीते साल 13 दिसंबर को भाजपा कार्यकर्ताओं का हुजूम स्कूटरों से रौंद रहा था. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से हर कीमत पर उनकी कुर्सी छीनने के लिए आतुर भाजपा ने इंदौर के रहने वाले पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को ही बंगाल में सेनापति के रूप में तैनात कर रखा है. दरअसल, विजयवर्गीय के नेतृत्व में लगभग 64 महीनों से बंगाल को ममता से हथियाने के लिए भाजपा जो पटकथा लिख रही थी उसका फलसफा यही है कि संख्याबल (बहुमत) को साधने के लिए बाहुबल से डटने का हौसला चाहिए. बंगाल फतह के लिए भाजपा ने अपना आधार स्तंभ इसी को बनाया है और इसी के इर्दगिर्द पार्टी अपनी सभी रणनीतियों को मूर्तरूप दे रही है.

बंगाल भाजपा के सह प्रभारी और पार्टी के राष्ट्रीय सचिव अरविंद मेनन कहते हैं, ''तृणमूल कांग्रेस की राजनीति का मूल मंत्र हिंसा है और हमें हर मोर्चे पर इससे टक्कर लेना पड़ रहा है. राज्य में अभी तक पार्टी के 160 से ज्यादा कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं. लेकिन हम इस गुंडाराज को खत्म करके रहेंगे.'' वैसे, मेनन यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि भाजपा के डटकर मुकाबला करने का मतलब क्या हिंसा का उत्तर हिंसा से देना है? वे कहते हैं, ''भाजपा तो ममता के कुशासन को उजागर कर लोगों के बीच जाकर समर्थन पा रही है.

भाजपा हिंसा में यकीन नहीं करती है.'' हकीकत मेनन के इस दावे के इतर है. राजनैतिक विश्लेषक गौतम लाहिड़ी कहते हैं, ''पश्चिम बंगाल की सियासत पिछले 35 साल से भी ज्यादा वक्त से डर पैदा करने, हिंसक झड़प और हत्या तक की फेहरिस्त से भरा हुई है, बाहुबल के बिना सत्ता से बेदखल करना तो दूर राज्य में मजबूत सियासी ताकत बनना भी मुश्किल है. पहले वामपंथी दल यह करते थे, बाद में तृणमूल यह करने लगी. अब भाजपा को जो समर्थन दे रहे हैं उनमें ज्यादातर लेफ्ट के वे कार्यकर्ता हैं, जो ममता से प्रताड़ित होकर, भाजपा के जरिए तृणमूल को जवाब देना चाहते हैं.'' इससे सहमति जताते हुए सियासी टीकाकार शंखदीप दास कहते हैं, ''पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा 42 में से 18 सीटें जीती थी तो इसकी बड़ी वजह लेफ्ट का वोट बैंक भाजपा में शिफ्ट होना था. वैचारिक रूप से भाजपा की धुर विरोधी लेफ्ट के कार्यकर्ता अगर भाजपा में गए तो उसकी बड़ी वजह यह थी कि वे ममता को हर हाल में हराने के लिए ठान चुके थे.''

भाजपा की रणनीति

भाजपा पिछले लोकसभा चुनाव से पहले तक राज्य में बड़ी ताकत नहीं थी. भाजपा पहली बार 2018 में पंचायत चुनावों में मजबूती से उतरी और दूसरे नंबर की पार्टी बन गई. पंचायत चुनावों में भाजपा-तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच काफी हिंसक झड़प हुई. विजयवर्गीय कहते हैं, ''यह टर्निंग पॉइंट था. लोगों को यकीन हुआ कि तृणमूल की गुंडागर्दी का मुकाबला भाजपा ही कर सकती है और 2019 के लोकसभा चुनाव में जनता ने हमें 18 सीटें दीं.'' भाजपा के एक महासचिव कहते हैं, ''केंद्र में मोदी-शाह की जोड़ी और राज्य में पार्टी के कद्दावर महासचिव और अन्य पदाधिकारियों की मौजूदगी, ममता के एकछत्र राज का विकल्प बनी और पार्टी अपना विस्तार करती गई.''

बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने विकास का मुद्दा पीछे छोड़ते हुए ममता को आक्रामक चुनौती देने की रणनीति बनाई है. सूत्रों के मुताबिक, भाजपा नेताओं से कहा गया है कि वे अपने बयान को इस तरह लोगों के सामने रखें कि ममता के कथित भय के माहौल को दूर करने के लिए भाजपा एकमात्र विकल्प नजर आए. केंद्रीय मंत्री और बंगाल चुनाव के लिए पांच लोकसभा क्षेत्रों के प्रभारी गजेंद्र सिंह शेखावत जब नारा देते हैं कि 'आर नोई अन्याय' (और अन्याय नहीं) तो दरअसल वे उसी डर को उभारने की कोशिश करते हैं जो वाम दलों के समर्थक पिछले दस साल से महसूस कर रहे हैं.

शेखावत कहते हैं, ''यह नारा लेकर हम घर-घर पहुंच रहे हैं और लोगों का बड़ा समर्थन मिल रहा है.'' क्या सिर्फ डर को उभार कर लोगों का समर्थन पाया जा सकता है? मेनन कहते हैं, ''ऐसा नहीं है. भाजपा कार्यकर्ताओं ने यह दिखाया है कि ममता की हिंसा और डर से मुकाबला के लिए भाजपा खड़ी है. राज्य के 78,000 से अधिक बूथों पर हमने बूथ प्रभारी नियुक्त किए हैं. हर बूथ प्रभारी का नेम प्लेट उनके घर पर लगाया गया है. पहले तो ममता के विरोधी अपने घरों पर नेम प्लेट तक नहीं लगाते थे पर भाजपा ने यह कर दिखाया और इससे लोगों का यकीन हमने हासिल किया.''

बंगाल भाजपा के मुताबिक, राज्य के सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों को पार्टी मुख्यालय से हेल्पलाइन नंबर और इंटरनेट से जोड़ा गया है. कार्यकर्ताओं से मिले फीडबैक के आधार पर पार्टी के लोग ऐसे लोगों की मदद के लिए तुरंत पहुंच रहे हैं जहां तृणमूल कार्यकर्ता उन्हें धमकाने की कोशिश करते हैं. इसके अलावा भाजपा ने 3,000-5,000 और 5,000-25,000 की दो श्रेणियों में कार्यकर्ताओं की टोली बनाई है. पहली टोली पार्टी के विभिन्न नेताओं के आने पर उनके स्वागत के लिए आती है, जबकि दूसरी टोली जनसभा के लिए विभिन्न जगहों पर एकत्र होती है. इन टोलियों को तैयार करने की वजह यह है कि विरोधी दलों के कार्यकर्ता किसी अप्रिय घटना को अंजाम देने की हिम्मत न कर सकें.

मेनन स्वीकार करते हैं कि आम लोगों के मन में बसे भय को दूर करने की कोशिश की जा रही है. इसी अभियान के तहत वे 'झोपड़ी-झोपड़ी भाजपा, खोपड़ी-खोपड़ी' के नारे के साथ लोगों के बीच जा रहे हैं. तृणमूल का डर खत्म करने के लिए भाजपा ने फूड हैबिट से लेकर अभिवादन तक के तरीके को बदलने की कोशिश की है. मेनन कहते हैं, ''मंगलवार को उपवास या मांसाहारी खाने से परहेज रखने की नई परिपाटी शुरू हुई है. राज्य के कई हिस्सों में घरों में यह होने लगा है. अभिवादन में भी राम-राम से करते हुए काफी संख्या में लोग दिखेंगे.

अब अभिवादन का एक नया नारा बना है कृष्ण-कृष्ण हरे हरे, पद्म (कमल) फूल घरे घरे.'' बहरहाल, भाजपा कार्यकताओं का हौसला इसलिए उफान पर है क्योंकि मुकुल राय, शुभेंदु अधिकारी जैसे दिग्गज नेता भाजपा के पाले में आ चुके हैं. भाजपा के इस आक्रामक रुख के बावजूद तृणमूल में टिके नेताओं के लिए भी एक फीलर शेखावत ने यह कहते हुए दिया, ''तृणमूल से भाजपा में आने के लिए नेताओं की कतार लगी है और भाजपा अगर अपना दरवाजा खोल दे तो दूसरे दिन ममता सरकार अल्पमत में आ जाएगी.'' शेखावत का यह बयान चुनाव बाद के परिदृश्य के लिए भी अहम है. भाजपा के लिए सत्ता जितनी अहम है उतना ही तृणमूल को तहस-नहस करना भी क्योंकि मोदी के विरुद्ध सबसे मुखर स्वर सिर्फ बंगाल में बचा है.

ममता का 'नरम' पलटवार

तृणमूल ने 28 जनवरी को कोलकाता में 500 हिंदीभाषी लोगों की सभा का आयोजन किया. उसमें बोलते हुए ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को हिंदी पढ़ने की प्रतियोगिता करने की चुनौती दी. मुख्यमंत्री का भाषण बांग्ला में था पर उसमें हिंदी शब्दावली भरी पड़ी थी. दरअसल, ममता का यह रुख उनके जून, 2019 की रणनीति से विपरीत है जब उन्होंने पहली बार स्थानीय भाषा पर जोर दिया था. उस समय उन्होंने कहा था, ''अगर आप बंगाल में रहते हैं तो आपको बांग्ला बोलना ही होगा.''

रामनवमी और हनुमान जयंती के जुलूसों के जरिये आक्रामकता का प्रदर्शन कर रही भाजपा के खिलाफ तब वह ममता की रणनीति थी. लोकसभा चुनावों के बाद नैहाटी जैसी जगहों पर अपने पार्टी कार्यकर्ताओं पर हमले के बाद ममता ने 'बाहरी' का मुद्दा उछाला था और कहा था, ''वे बाहरी हैं और उन्हें बंगाल को गुजरात में बदलने नहीं दूंगी.'' ममता को लगा था कि इस रणनीति के तहत वे मूल बंगाली आबादी को अपने पक्ष में कर लेंगी और भाजपा के हिंदू ध्रुवीकरण को रोकने में सफल होंगी. वहीं, भाजपा ने किसी भी तरह का भाषायी या स्थानीयता के आधार पर ध्रुवीकरण में अपना लाभ ही देखा. दरअसल, राज्य में करीब 10 करोड़ आबादी 'बाहरी' मूल की है जो मुख्य रूप से हिंदी और उर्दू बोलती है.

ममता ने अब इन समूहों को भी साधने की कोशिश की है. हाल में उन्होंने कहा कि जो बंगाल में गुंडागर्दी करने आए हैं वे उन्हें बाहरी कह रही थीं. उन्होंने गैर-बंगाली शख्सियतों और कारोबारियों के साथ बैठकर उन्हें भी आश्वस्त किया है. सरकार ने हिंदी मूल के लोगों के लिए हिंदी सेल गठित किया है. नए बजट में सरकार ने विभिन्न भाषायी पहचान वालों के लिए स्कूल खोलने और शिक्षकों की नियुक्ति करने की घोषणा की है.

राज्य के उत्तरी हिस्से में 400 नए स्कूलों के लिए सरकार 150 करोड़ रु. खर्च कर रही है और 600 पैराटीचर्स की नियुक्ति होगी जो नेपाली, हिंदी, उर्दू, कामतापुरी, राजबंशी आदि पढ़ाएंगे. भाषायी पहचान को लेकर यहां अशांति भी होती रही है, खासकर उत्तरी हिस्से में. गोरखाओं ने गोरखालैंड तो कूच बिहार और अलीपुरद्वार में राजबंशी तथा कामतापुरी लोगों ने अलग राज्य की मांग की थी. इन्हीं क्षेत्रों में 2019 में भाजपा ने सेंध लगाई है. और अब ममता को उम्मीद है कि वे अपनी कोशिशों से इन्हें अपने पाले में कर लेंगी.

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